कोलंबो, 20 अप्रैल 2026: भारत के उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan की श्रीलंका यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं रही, बल्कि इसने दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और रणनीतिक रिश्तों को फिर से केंद्र में ला दिया है। कोलंबो में प्रमुख धार्मिक स्थलों पर दर्शन से लेकर बड़े विकास सहयोग प्रोजेक्ट्स तक—यह यात्रा भारत की “Neighbourhood First” नीति का एक मजबूत उदाहरण बनकर सामने आई है।
इस यात्रा का सबसे खास पहलू यह रहा कि इसमें सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि सभ्यतागत जुड़ाव (civilisational connect) को भी बराबर महत्व दिया गया। यही वह तत्व है जो भारत-श्रीलंका संबंधों को अन्य द्विपक्षीय रिश्तों से अलग बनाता है।
मंदिरों में दर्शन: सिर्फ धार्मिक नहीं, कूटनीतिक संदेश भी
अपने दौरे के दौरान उपराष्ट्रपति ने कोलंबो के प्रसिद्ध Kathiresan Temple और Gangaramaya Temple में पूजा-अर्चना की। यह कदम केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि दोनों देशों के बीच साझा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का एक प्रतीकात्मक संकेत भी था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने बताया कि उपराष्ट्रपति ने इन मंदिरों में भारत और श्रीलंका की साझा समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
यहां एक दिलचस्प संदर्भ भी सामने आया—गुजरात के देवनीमोरी से भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों का हाल ही में गंगारामाया मंदिर में प्रदर्शन। यह घटना दिखाती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध आज भी दोनों देशों के बीच मजबूत पुल का काम कर रहे हैं।
ऐतिहासिक यात्रा: पहली बार किसी भारतीय उपराष्ट्रपति का द्विपक्षीय दौरा
यह यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक रही क्योंकि यह पहली बार था जब कोई भारतीय उपराष्ट्रपति आधिकारिक द्विपक्षीय यात्रा पर श्रीलंका पहुंचे।
श्रीलंका के राष्ट्रपति Anura Kumara Dissanayake ने इस दौरे का स्वागत करते हुए कहा कि यह संबंधों को और मजबूत करने का अवसर है।
यह संकेत देता है कि दोनों देश अब सिर्फ परंपरागत सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी में हैं।
विकास सहयोग: भारत का सबसे बड़ा ग्रांट प्रोजेक्ट
इस यात्रा के दौरान भारत-श्रीलंका विकास सहयोग पर भी बड़ा फोकस रहा। विदेश सचिव Vikram Misri ने जानकारी दी कि:
- भारत द्वारा श्रीलंका में 50,000 घरों का निर्माण पूरा हो चुका है
- तीसरे चरण के अंतिम 145 घर भी सौंप दिए गए
- चौथे चरण में 10,000 नए घरों पर काम जारी है
यह प्रोजेक्ट भारत के सबसे बड़े विदेशी ग्रांट प्रोजेक्ट्स में से एक है, जिसकी कुल लागत लगभग ₹1,835 करोड़ है।
यह सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि भारत की “people-first diplomacy” का उदाहरण है—जहां आम लोगों के जीवन स्तर को सुधारना प्राथमिकता होती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी: रणनीतिक महत्व
उपराष्ट्रपति की यात्रा के दौरान कई अहम घोषणाएं भी हुईं:
- उत्तरी रेलवे लाइन पर ट्रेन सेवाओं की बहाली
- Cyclone Dithwa से प्रभावित क्षेत्रों में Bailey Bridges का निर्माण
- पूर्वी प्रांत में बहु-क्षेत्रीय विकास परियोजनाएं
इन परियोजनाओं का उद्देश्य सिर्फ विकास नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना है।
स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और शिक्षा पर फोकस
भारत और श्रीलंका के बीच हुए समझौतों (MoUs) में सामाजिक क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया गया:
- महिलाओं के लिए batik training centres
- अस्पतालों में premature baby units
- eye, ENT और mental health units का निर्माण
- Mullaitivu में चार मंजिला मेडिकल वार्ड कॉम्प्लेक्स
ये पहल दिखाती हैं कि भारत अब सिर्फ रणनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव विकास (human development) पर भी बराबर जोर दे रहा है।
भारत की रणनीति: SAGAR और Neighbourhood First
विदेश सचिव ने स्पष्ट किया कि श्रीलंका, भारत की SAGAR नीति और “Neighbourhood First” रणनीति का अहम हिस्सा है।
इसका मतलब है:
- हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता
- पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक सहयोग
- क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करना
श्रीलंका का भौगोलिक स्थान इसे इस रणनीति में बेहद महत्वपूर्ण बनाता है।
जियोपॉलिटिकल संदर्भ: क्यों अहम है यह दौरा?
आज के समय में जब हिंद महासागर क्षेत्र में चीन, अमेरिका और अन्य शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा है, भारत-श्रीलंका संबंधों का मजबूत होना बेहद जरूरी है।
इस यात्रा के जरिए भारत ने यह संदेश दिया है कि:
- वह अपने पड़ोस में विश्वसनीय साझेदार बना रहेगा
- विकास और सहयोग के जरिए दीर्घकालिक संबंध बनाएगा
- सांस्कृतिक जुड़ाव को कूटनीति का हिस्सा बनाए रखेगा
निष्कर्ष: परंपरा और रणनीति का संतुलन
उपराष्ट्रपति की यह यात्रा एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे धर्म, संस्कृति और रणनीति—तीनों को एक साथ जोड़कर कूटनीति को मजबूत किया जा सकता है।
मंदिरों में दर्शन से लेकर हजारों घरों के निर्माण तक, यह दौरा बताता है कि भारत-श्रीलंका संबंध सिर्फ सरकारी समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह लोगों, परंपराओं और साझा इतिहास पर आधारित हैं।
आने वाले समय में यह साझेदारी न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरे हिंद महासागर क्षेत्र के लिए स्थिरता और विकास का आधार बन सकती है।
Also Read:


