नई दिल्ली: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) लगातार दूसरे सप्ताह बड़ी गिरावट के साथ घटा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 22 मई को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 7.51 अरब डॉलर घटकर 681.38 अरब डॉलर रह गया। इससे एक सप्ताह पहले भी इसमें 8.09 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई थी।
दिलचस्प बात यह है कि फरवरी के अंत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.49 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन उसके बाद से इसमें करीब 47 अरब डॉलर की गिरावट आ चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपये पर दबाव के कारण RBI को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, जिसका असर भंडार पर दिखाई दे रहा है।
आखिर विदेशी मुद्रा भंडार क्यों घट रहा है?
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ती है और स्थानीय मुद्रा पर दबाव आता है, तब केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके अपनी मुद्रा को अत्यधिक कमजोर होने से बचाने की कोशिश करता है। हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव बनता है। रुपये में अत्यधिक कमजोरी रोकने के लिए RBI बाजार में डॉलर बेचता है। यही कारण है कि विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
विदेशी मुद्रा भंडार के कौन-कौन से हिस्से घटे?
RBI के आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार के लगभग सभी प्रमुख घटकों में गिरावट देखने को मिली।
1. विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां (FCA)
विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां होती हैं। 22 मई को समाप्त सप्ताह में यह 2.87 अरब डॉलर घटकर 543.03 अरब डॉलर रह गईं। इसमें अमेरिकी डॉलर के अलावा यूरो, पाउंड स्टर्लिंग और जापानी येन जैसी मुद्राओं में रखी गई संपत्तियां भी शामिल होती हैं। इन मुद्राओं के मूल्य में उतार-चढ़ाव का असर भी FCA पर पड़ता है।
2. स्वर्ण भंडार
भारत के गोल्ड रिजर्व में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। RBI के अनुसार स्वर्ण भंडार का मूल्य 4.53 अरब डॉलर घटकर 114.79 अरब डॉलर रह गया। सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और मूल्यांकन में बदलाव का असर इस हिस्से पर दिखाई देता है।
3. SDR और IMF रिजर्व
विशेष आहरण अधिकार (SDR) 7.7 करोड़ डॉलर घटकर 18.75 अरब डॉलर रह गया। वहीं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत की आरक्षित स्थिति भी 3.3 करोड़ डॉलर घटकर 4.82 अरब डॉलर रह गई।
क्या 681 अरब डॉलर का भंडार चिंता की बात है?
हालांकि लगातार गिरावट चिंता का विषय हो सकती है, लेकिन वर्तमान स्तर पर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी दुनिया के सबसे बड़े रिजर्व में शामिल है। 681 अरब डॉलर का भंडार भारत को कई महीनों के आयात भुगतान को पूरा करने की क्षमता देता है। यही कारण है कि अधिकांश अर्थशास्त्री फिलहाल इसे संकट की स्थिति नहीं मान रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक चिंता तब बढ़ेगी जब गिरावट कई महीनों तक लगातार जारी रहे और भंडार 600 अरब डॉलर के आसपास पहुंचने लगे।
रुपये पर क्या असर पड़ सकता है?
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का सीधा संबंध रुपये की स्थिरता से होता है। यदि RBI हस्तक्षेप नहीं करे तो डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपया और तेजी से कमजोर हो सकता है। लेकिन केंद्रीय बैंक बाजार में डॉलर बेचकर इस दबाव को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में यदि पश्चिम एशिया का तनाव कम नहीं हुआ और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।
आम लोगों पर इसका क्या असर होगा?
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का असर केवल वित्तीय बाजार तक सीमित नहीं रहता। यदि रुपया कमजोर होता है तो: पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं। LPG और CNG की लागत बढ़ सकती है। इलेक्ट्रॉनिक सामान के आयात पर असर पड़ सकता है। विदेश यात्रा महंगी हो सकती है। विदेशी शिक्षा का खर्च बढ़ सकता है। महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। यही कारण है कि सरकार और RBI दोनों रुपये की स्थिरता बनाए रखने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
पीएम मोदी ने विदेशी मुद्रा बचाने की अपील क्यों की?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भी कई मौकों पर विदेशी मुद्रा बचाने के महत्व पर जोर दे चुके हैं। उन्होंने नागरिकों से अनावश्यक विदेशी यात्राएं कम करने, ईंधन की खपत घटाने और सोने की खरीदारी सीमित करने की अपील की थी। सरकार का मानना है कि आयात पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा पर दबाव घट सकता है और देश की आर्थिक स्थिरता मजबूत रह सकती है।
आगे क्या देखना होगा?
अगले कुछ सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये दोनों के लिए महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। बाजार की नजर तीन प्रमुख कारकों पर रहेगी: पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें। RBI की बाजार हस्तक्षेप नीति। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और तेल की कीमतों में नरमी आती है तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी कम हो सकता है। फिलहाल भारत के पास पर्याप्त रिजर्व मौजूद है, लेकिन लगातार हो रही गिरावट पर सरकार और RBI दोनों की करीबी नजर बनी हुई है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से है। इसमें दी गई जानकारी निवेश सलाह नहीं है। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।
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