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India Forex Challenge: पीएम की अपील के बाद बदला माहौल, ईरान युद्ध के बाद से भारत ने खर्च किए इतने डॉलर, चुनौती के पीछे की कहानी

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 10:40 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब सिर्फ भू-राजनीतिक संकट नहीं रह गया है। इसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये की मजबूती और विदेशी मुद्रा भंडार पर दिखाई देने लगा है। ईरान युद्ध के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा है और भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

Contents
ईरान युद्ध के बाद कितना घटा भारत का फॉरेक्स रिजर्व?आखिर विदेशी मुद्रा भंडार होता क्या है?असली चिंता कहां है?रुपये की कमजोरी क्यों बढ़ रही है?इसके पीछे कई बड़े कारण हैं:1. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें2. विदेशी निवेशकों की बिकवाली3. सुरक्षित निवेश की ओर झुकाव4. आयात बिल में तेजीआरबीआई ने आखिर 38 अरब डॉलर क्यों खर्च किए?पीएम मोदी की अपील का क्या असर हुआ?क्या भारत किसी बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है?भारत की स्थिति अभी भी मजबूत क्यों मानी जा रही है?आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ सकता है?संभावित असर:आगे क्या देखना होगा?

इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील ने भी पूरे देश का ध्यान ऊर्जा बचत और गैर-जरूरी विदेशी मुद्रा खर्चों की ओर खींचा है। पीएम ने नागरिकों से ईंधन की बचत करने और सोना-चांदी जैसी गैर-जरूरी खरीदारी को टालने की अपील की। इसका असर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी दिखाई देने लगा है। कई नेताओं ने छोटे काफिलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है जबकि कुछ बीजेपी नेता ट्रेन और साइकिल से सफर करते नजर आए हैं।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर इतना दबाव क्यों बढ़ गया है? क्या स्थिति चिंताजनक है? और आखिर आरबीआई को रुपये को संभालने के लिए अरबों डॉलर क्यों खर्च करने पड़े? आइए विस्तार से समझते हैं।

ईरान युद्ध के बाद कितना घटा भारत का फॉरेक्स रिजर्व?

28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। फरवरी 2026 में भारत का फॉरेक्स रिजर्व रिकॉर्ड 728.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से इसमें लगभग 38 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई।

हालांकि, हालिया सप्ताह में इसमें कुछ सुधार भी देखने को मिला। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार 8 मई को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 6.295 अरब डॉलर बढ़कर 696.988 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इससे पहले वाले सप्ताह में इसमें 7.794 अरब डॉलर की गिरावट आई थी और कुल भंडार 690.693 अरब डॉलर रह गया था।

यह आंकड़े दिखाते हैं कि बाजार में अस्थिरता लगातार बनी हुई है और आरबीआई को सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।

आखिर विदेशी मुद्रा भंडार होता क्या है?

विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश की आर्थिक सुरक्षा ढाल की तरह होता है। इसमें डॉलर, यूरो, पाउंड, येन जैसी विदेशी मुद्राएं, सोना और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के विशेष आहरण अधिकार (SDR) शामिल होते हैं।

भारत इस भंडार का इस्तेमाल कई अहम जरूरतों के लिए करता है कच्चे तेल और जरूरी सामानों का आयात, रुपये को स्थिर रखने, विदेशी निवेशकों का भरोसा बनाए रखने, बाहरी आर्थिक झटकों से बचाव, अंतरराष्ट्रीय भुगतान भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ते ही डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है।

असली चिंता कहां है?

पहली नजर में करीब 690 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार काफी मजबूत दिखाई देता है। लेकिन अर्थशास्त्री इसके भीतर की वास्तविक स्थिति पर भी ध्यान दे रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार कुल रिजर्व में सोने का बड़ा हिस्सा शामिल है

  • SDR और अन्य संपत्तियां तुरंत नकदी में इस्तेमाल नहीं की जा सकतीं
  • आरबीआई की फॉरवर्ड पोजिशन को समायोजित करने पर वास्तविक उपयोग योग्य रिजर्व काफी कम हो जाता है

रिपोर्ट्स के मुताबिक सोना और SDR समायोजित करने पर उपयोगी रिजर्व लगभग 560 अरब डॉलर रह जाता है, फॉरवर्ड देनदारियां जोड़ने पर यह करीब 460 अरब डॉलर तक आ सकता है हालांकि, CareEdge Ratings का मानना है कि स्थिति अभी नियंत्रण में है। एजेंसी के अनुसार भारत के पास लगभग 115 अरब डॉलर मूल्य का लिक्विड गोल्ड रिजर्व मौजूद है, जिसे जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

रुपये की कमजोरी क्यों बढ़ रही है?

भारत का रुपया हाल के महीनों में लगातार दबाव में रहा है। पहली बार रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर से नीचे फिसल गया। इंट्राडे ट्रेडिंग में यह 96.14 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया।

यह सिर्फ डॉलर की मजबूती की कहानी नहीं है। चिंता की बात यह है कि रुपया जापानी येन, यूरो और ब्रिटिश पाउंड जैसी मुद्राओं के मुकाबले भी ज्यादा कमजोर हुआ है।

इसके पीछे कई बड़े कारण हैं:

1. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने का मतलब ज्यादा डॉलर खर्च करना।

2. विदेशी निवेशकों की बिकवाली

वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं। इससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है।

3. सुरक्षित निवेश की ओर झुकाव

युद्ध और वैश्विक तनाव के समय निवेशक अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड जैसे सुरक्षित विकल्पों में पैसा लगाते हैं।

4. आयात बिल में तेजी

तेल के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रक्षा उपकरणों के आयात में भी डॉलर की जरूरत बढ़ी है।

आरबीआई ने आखिर 38 अरब डॉलर क्यों खर्च किए?

जब रुपया बहुत तेजी से कमजोर होने लगता है तो आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। इसका सबसे बड़ा तरीका होता है डॉलर बेचना।

आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचता है ताकि बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़े और रुपये पर दबाव कम हो। यही वजह है कि युद्ध शुरू होने के बाद से भारत को लगभग 38 अरब डॉलर खर्च करने पड़े।

अगर आरबीआई हस्तक्षेप नहीं करता तो रुपया और तेजी से गिर सकता था, पेट्रोल-डीजल और महंगे हो सकते थे, महंगाई बढ़ सकती थी, विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता था

पीएम मोदी की अपील का क्या असर हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील को सिर्फ प्रतीकात्मक कदम नहीं माना जा रहा है। इसका मकसद देश में ऊर्जा खपत और गैर-जरूरी डॉलर खर्चों को सीमित करना है।

भारत में सोने का आयात विदेशी मुद्रा पर बड़ा दबाव डालता है। हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात किया जाता है। ऐसे समय में जब तेल आयात बिल पहले ही बढ़ चुका है, सरकार गैर-जरूरी आयातों को कम करना चाहती है।

यही वजह है कि ऊर्जा बचत अभियान तेज हुआ, सरकारी स्तर पर ईंधन बचत के संकेत दिए गए, VIP काफिलों में कटौती की चर्चा शुरू हुई, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के संदेश दिए गए

क्या भारत किसी बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है?

फिलहाल विशेषज्ञ ऐसा नहीं मानते। इसकी कई वजहें हैं।

भारत की स्थिति अभी भी मजबूत क्यों मानी जा रही है?

  • भारत के पास अभी भी दुनिया के बड़े विदेशी मुद्रा भंडारों में से एक है
  • बैंकिंग सिस्टम स्थिर है
  • निर्यात में सुधार की उम्मीद है
  • सेवा क्षेत्र से डॉलर कमाई मजबूत बनी हुई है
  • RBI के पास बाजार में हस्तक्षेप की पर्याप्त क्षमता है

हालांकि, अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तेल 120-130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, विदेशी निवेश लगातार निकलता रहता है तो दबाव और बढ़ सकता है।

आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

विदेशी मुद्रा संकट और कमजोर रुपये का असर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचता है।

संभावित असर:

पेट्रोल-डीजल महंगा, हवाई यात्रा खर्च बढ़ना, इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल महंगे होना, सोना-चांदी की कीमतों में तेजी, विदेश में पढ़ाई और यात्रा महंगी, महंगाई बढ़ने का खतरा यानी फॉरेक्स रिजर्व की यह कहानी सिर्फ आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसका असर सीधे लोगों की जेब पर पड़ सकता है।

आगे क्या देखना होगा?

अब बाजार की नजर तीन बड़ी चीजों पर रहेगी:

  1. पश्चिम एशिया का तनाव कितना बढ़ता है
  2. कच्चे तेल की कीमतें कहां तक जाती हैं
  3. आरबीआई रुपये को स्थिर रखने में कितना सफल रहता है

अगर हालात जल्दी सामान्य होते हैं तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत हो सकता है। लेकिन अगर युद्ध लंबा चला तो भारत सहित पूरे एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव और बढ़ सकता है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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