मध्य पूर्व में जारी ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल भारत ने कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बड़ा विकल्प तैयार कर लिया है। मई महीने में भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट अप्रैल के मुकाबले 8 फीसदी बढ़ गया है, जिससे पेट्रोल-डीजल की संभावित किल्लत का खतरा काफी हद तक कम होता दिख रहा है।
सबसे अहम बात यह है कि फरवरी के मुकाबले अब सप्लाई में केवल 5 फीसदी की कमी रह गई है। यानी युद्ध और वैश्विक संकट के बावजूद भारत ने तेजी से वैकल्पिक सप्लाई चैन तैयार कर ली है। रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है, जबकि यूएई दूसरे और वेनेजुएला तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। सऊदी अरब और अमेरिका जैसे पारंपरिक सप्लायर पीछे खिसकते दिखाई दे रहे हैं।

वेनेजुएला बना भारत का नया मजबूत तेल पार्टनर
ईटी की रिपोर्ट में एनर्जी कार्गो ट्रैकर Kpler के हवाले से कहा गया है कि मई में भारत ने वेनेजुएला से रोजाना करीब 4.17 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया। अप्रैल में यह आंकड़ा केवल 2.83 लाख बैरल प्रतिदिन था। यानी सिर्फ एक महीने में इसमें लगभग 47 फीसदी की तेजी दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि वेनेजुएला का हेवी ग्रेड क्रूड भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी कम कीमत और भारतीय रिफाइनरियों के साथ इसकी बेहतर अनुकूलता है। खासतौर पर Reliance Industries की गुजरात स्थित एडवांस्ड रिफाइनरी इस तेल को प्रोसेस करने में सक्षम मानी जाती है।
Kpler के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे के मुताबिक भारतीय कंपनियां लंबे समय से वेनेजुएला के तेल में दिलचस्पी दिखाती रही हैं क्योंकि यह सस्ता पड़ता है और बड़ी रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है। हालांकि भारत की कई सामान्य रिफाइनरियां हाई-सल्फर हेवी ऑयल को सीमित मात्रा में ही प्रोसेस कर सकती हैं।
होर्मुज संकट के बीच भारत की रणनीति सफल
28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई थी। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में गिना जाता है क्योंकि वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 20 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
विशेषज्ञों को डर था कि अगर यह संकट लंबा चला तो दुनिया में बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है। भारत जैसे देशों के सामने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज उछाल और सप्लाई संकट का खतरा था। लेकिन भारत ने रूस, यूएई और वेनेजुएला जैसे देशों से आयात बढ़ाकर स्थिति को काफी हद तक संभाल लिया है।
मई में भारत का कुल तेल आयात बढ़कर 4.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जबकि फरवरी में यह 5.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। यानी अब सप्लाई गैप केवल 5 फीसदी तक सीमित रह गया है।
रूस अब भी सबसे बड़ा सप्लायर
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद रूस भारत को भारी मात्रा में डिस्काउंटेड क्रूड ऑयल बेच रहा है। यही वजह है कि रूस लगातार भारत का नंबर-1 सप्लायर बना हुआ है।
भारत की सरकारी और निजी रिफाइनरियां रूसी तेल खरीदकर लागत कम करने की कोशिश कर रही हैं। इससे घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिल रही है।
यूएई भी तेजी से भारत के लिए अहम ऊर्जा साझेदार बनकर उभरा है। मध्य पूर्व में अस्थिरता के बावजूद यूएई से सप्लाई अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है।
सऊदी अरब से आयात में भारी गिरावट
ईरान युद्ध से पहले सऊदी अरब भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर था, लेकिन अब वहां से आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। मई में सऊदी अरब से भारत को केवल 3.4 लाख बैरल प्रतिदिन तेल मिला, जबकि अप्रैल में यह आंकड़ा करीब 6.7 लाख बैरल प्रतिदिन था। यानी सिर्फ एक महीने में सप्लाई लगभग आधी रह गई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी मुख्य वजह सऊदी तेल की बढ़ती कीमतें हैं। युद्ध और सप्लाई संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जिससे भारतीय कंपनियां सस्ते विकल्प तलाश रही हैं।
ईरान से फिर रुकी सप्लाई
भारत ने अप्रैल में करीब सात साल बाद ईरान से तेल आयात दोबारा शुरू किया था। लेकिन अब वहां से सप्लाई फिर बंद हो गई है। अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी के कारण इस महीने अब तक कोई भी जहाज भारत नहीं पहुंचा है।
हालांकि इराक से कुछ सप्लाई दोबारा शुरू हुई है। मई में भारत को इराक से रोजाना 51,000 बैरल तेल मिला है, जबकि अप्रैल में वहां से कोई सप्लाई नहीं आई थी। हालांकि फरवरी के मुकाबले यह आंकड़ा अब भी काफी कम है।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी
वैश्विक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 1.45 फीसदी बढ़कर 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। वहीं इंडियन बास्केट में कुछ नरमी देखने को मिली और यह 3 फीसदी से ज्यादा गिरकर 108.9 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई।
अगर आने वाले दिनों में मध्य पूर्व का तनाव और बढ़ता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल भारत की वैकल्पिक आयात रणनीति से घरेलू बाजार को बड़ी राहत मिलती दिखाई दे रही है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
अगर भारत इसी तरह वैकल्पिक सप्लाई बनाए रखने में सफल रहता है तो:
- पेट्रोल-डीजल की भारी किल्लत से बचाव हो सकता है
- अचानक बड़े दाम बढ़ने का खतरा कम होगा
- ट्रांसपोर्ट और महंगाई पर दबाव कुछ कम रह सकता है
- रिफाइनरियों को लगातार कच्चा तेल मिलता रहेगा
हालांकि वैश्विक हालात पूरी तरह स्थिर नहीं हैं। इसलिए आने वाले हफ्तों में कच्चे तेल के बाजार पर निवेशकों और सरकार दोनों की नजर बनी रहेगी।
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