IDBI Bank के निजीकरण में सरकार ने नई रणनीति अपनाई है: OFS के जरिए पब्लिक हिस्सेदारी बढ़ाने का विचार। जानें कैसे यह कदम भारत की प्राइवेटाइजेशन रणनीति को प्रभावित करेगा और बाजार पर क्या असर पड़ेगा।
भारत की प्रमुख वित्तीय खबरों में IDBI Bank का निजीकरण और शेयर डाइवेस्टमेंट एक बार फिर चर्चा में है। केंद्र सरकार ने बैंक की हिस्सेदारी बेचने के लिए ऑफर‑फॉर‑सेल (OFS) रास्ता अपनाने का विचार किया है — खासकर पिछले प्रयासों के विफल रहने के बाद।
🇮🇳 सरकार किस योजना पर काम कर रही है?
लगातार सुर्खियों में बनी आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) की निजीकरण योजना अब थोड़ी बदलती नजर आ रही है। सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) दोनों पहले मिलकर बैंक में लगभग 60.72 % हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में थे और निवेशकों से बोली भी मांगी गई थी। लेकिन रिज़र्व प्राइस के मुकाबले बोली कम मिलने पर यह प्रक्रिया रोक दी गई।
अब केंद्र सरकार OFS (Offer For Sale) के माध्यम से बाज़ार में सिर्फ़ अतिरिक्त शेयर उतारने पर विचार कर रही है, ताकि IDBI Bank की वैल्यूएशन और पब्लिक फ्लोट को बेहतर बनाया जा सके।
📉 क्या पुराना IPO/डाइवेस्टमेंट फेल हुआ था?
पहले डाइवेस्टमेंट प्रयास के दौरान दुनिया भर के बड़े बैंक और आर्थिक समूहों ने बोलियां जमा की, लेकिन वे सभी सरकार द्वारा तय न्यूनतम मूल्य से कम थीं। इसके परिणामस्वरूप यह बोली प्रक्रिया रद्द हो गई।
इस विफल प्रदर्शन को अर्थशास्त्रियों ने भारत की प्राइवेटाइजेशन ड्राइव में बड़ी बाधा बताया है, क्योंकि निवेशकों की रुचि कम रहने के कारण सरकार की व्यापक विनिवेश रणनीति प्रभावित हुई है।
📊 OFS क्यों लाया जा रहा है?
📌 मौजूदा समय में IDBI Bank में पब्लिक फ्लोट लगभग 5.29 % ही है, जो बहुत कम माना जाता है। और इतने कम पैमाने पर शेयर उपलब्ध होने से बैंक की मूल्यांकन और बाजार सहभागिता कमजोर रहती है।
📌 सरकार का तर्क है कि यदि OFS के ज़रिए बाजार में 10‑15 % अतिरिक्त शेयर उतारे जाते हैं, तो बैंक की वैल्यूएशन और निवेशकों की धारणा बेहतर होगी।
🏛️ IDBI Bank का इतिहास और स्टेकहोल्डिंग
IDBI Bank एक प्रमुख भारतीय बैंकरिंग संस्थान है, जिसकी स्थापना 1964 में हुई थी और इसके पास बड़े पैमाने पर LIC और सरकार की हिस्सेदारी है। सरकार पहले इस बैंक को पूरी तरह निजीकरण करने का लक्ष्य रखती थी।
हालांकि 2019 में LIC ने बैंक में भारी निवेश किया और लगभग 49.24 % हिस्सेदारी हासिल कर ली, जबकि सरकार के पास करीब 45.48 % शेर हैं। सरकारी शासित बैंक होने के बावजूद इसे रेज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के मानकों के अनुसार प्राइवेट सेक्टर बैंक के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया है।
📉 बाज़ार पर असर और विशेषज्ञ प्रतिक्रियाएँ
पिछले कुछ हफ्तों में IDBI Bank का शेयर बाज़ार में ज्यादा अच्छा प्रदर्शन नहीं दिखा। डाइवेस्टमेंट को लेकर अनिश्चितता के कारण निवेशकों ने शेयर बेच दिया, जिससे बैंक के शेयर मूल्य में गिरावट आई। यह गिरावट लगभग 17‑19 % से भी ऊपर थी।
विश्लेषक मानते हैं कि OFS द्वारा कुछ हिस्सेदारी बाजार में लाने से निवेशक विश्वास तो बढ़ा सकता है, पर यह सुनिश्चित नहीं है कि इससे पूरा निजीकरण योजना आगे बढ़ेगी या नहीं।
📌 क्या IDBI Bank निजीकरण में सफल होगा?
✔️ सरकार OFS के ज़रिए बाज़ार में पब्लिक हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास कर रही है।
✔️ इससे बैंक की वैल्यूएशन अधिक पारदर्शी और बाज़ार‑अनुकूल हो सकती है।
✔️ हालांकि, असली निजीकरण (majority stake sale) अभी पूरी तरह बाधाओं के कारण नहीं हो पाया है।
यह स्थिति भारत की व्यापक प्राइवेटाइजेशन रणनीति की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण है, जहां सरकार को निवेशक रूचि, वैल्यूएशन और बाज़ार स्थितियों के संतुलन को साधने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
🧠 निष्कर्ष
IDBI Bank का निजीकरण भारत की सबसे लंबी चलने वाली डाइवेस्टमेंट कहानियों में से एक रहा है। नई रणनीति के तहत OFS का रास्ता अपनाने का निर्णय पब्लिक फ्लोट बढ़ाने और मूल्यांकन को सुधारने की दिशा में है — लेकिन यह देखना बाकी है कि इससे पूरी तरह प्राइवेटाइजेशन प्रक्रिया कब और कैसे आगे बढ़ पाएगी।
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Author: Namam Sharma
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Namam Sharma NewsJagran में बिज़नेस और फाइनेंस खबरों को कवर करते हैं।
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