भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) आने वाले वर्षों में अपने हवाई युद्ध की रणनीति को पूरी तरह बदलने की तैयारी में है। लड़ाकू विमानों की कमी और आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों के बीच एयरफोर्स अब एक ऐसा मॉडल अपनाने जा रही है, जिसे भविष्य की एयर कॉम्बैट टेक्नोलॉजी माना जा रहा है।
इस योजना का केंद्र है भारत का स्वदेशी स्टेल्थ अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल व्हीकल (UCAV) — ‘घातक’।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह ड्रोन फाइटर जेट्स के साथ मिलकर “लॉयल विंगमैन” की भूमिका निभाएगा, यानी यह पायलट वाले विमान के साथ उड़ान भरकर दुश्मन पर हमला करने और सुरक्षा देने का काम करेगा।
‘घातक’ UCAV क्या है और क्यों खास है?

‘घातक’ को भारत की रक्षा अनुसंधान प्रणाली DRDO द्वारा विकसित किया जा रहा है और इसका निर्माण HAL (Hindustan Aeronautics Limited) कर रही है।
यह लगभग 13 टन वर्ग का स्टेल्थ कॉम्बैट ड्रोन है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आता। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका लो-ऑब्ज़र्वेबिलिटी स्टेल्थ डिजाइन, जो इसे आधुनिक युद्ध में बेहद प्रभावी बनाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह भारत के भविष्य के एयर कॉम्बैट सिस्टम का एक अहम हिस्सा बन सकता है, खासकर तब जब मानव पायलट वाले विमानों के साथ ड्रोन की टीम बनाकर मिशन चलाए जाएंगे।
रक्षा परिषद की मंजूरी और प्रोजेक्ट का दायरा

डिफेंस अधिग्रहण परिषद (DAC) ने ‘घातक’ UCAV के करीब 60 यूनिट्स की खरीद को मंजूरी दे दी है।
यह कदम सिर्फ एक हथियार प्रणाली की खरीद नहीं है, बल्कि भारत की “नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर” रणनीति की तरफ बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
इस योजना के तहत ‘घातक’ को सुखोई, राफेल और मिराज जैसे फाइटर जेट्स के साथ जोड़ा जाएगा, ताकि ये मिलकर एक कॉम्बैट टीम की तरह काम कर सकें।
‘घातक’ की तकनीकी ताकत: स्टेल्थ से लेकर ऑटोनॉमी तक

‘घातक’ UCAV को आधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है:
- यह कार्बन-फाइबर कंपोजिट से बना है, जिससे इसकी रडार विजिबिलिटी कम हो जाती है
- यह अर्ध-स्वायत्त (semi-autonomous) और पूरी तरह स्वायत्त (fully autonomous) दोनों मोड में काम कर सकता है
- इसमें मिशन प्लानिंग से लेकर टारगेट अटैक तक कई प्रक्रियाएं खुद से करने की क्षमता होगी
- यह कावेरी जेट इंजन पर आधारित होगा, जो इसे उच्च गति और लंबी रेंज देने में मदद करेगा
यह तकनीक इसे सिर्फ एक ड्रोन नहीं बल्कि एक “एयर कॉम्बैट प्लेटफॉर्म” बनाती है।
लॉयल विंगमैन की भूमिका: फाइटर जेट्स के साथ नई साझेदारी

भविष्य के युद्धों में ‘घातक’ का सबसे महत्वपूर्ण रोल होगा “लॉयल विंगमैन”।
इसका मतलब है कि यह ड्रोन फाइटर जेट के साथ उड़ान भरकर:
- दुश्मन की डिफेंस सिस्टम की पहचान करेगा
- पहले हमला करके खतरे को कम करेगा
- पायलट को सुरक्षित स्थिति में रखेगा
- और जटिल मिशनों में सपोर्ट देगा
यह प्रणाली खासकर उन पुराने फाइटर जेट्स जैसे मिराज और जगुआर की क्षमता बढ़ाने में मदद करेगी, जिनमें आधुनिक नेटवर्किंग सिस्टम सीमित है।
पुराने विमानों की ताकत बढ़ाने में मदद
भारतीय वायुसेना के पास अभी भी कई पुराने लेकिन महत्वपूर्ण फाइटर जेट्स हैं, जैसे:
- मिराज 2000
- जगुआर
इन विमानों को अब “घातक” ड्रोन की मदद से आधुनिक बनाया जा सकता है।
ड्रोन इन जेट्स के साथ मिलकर सेंसर, टारगेट डिटेक्शन और स्ट्राइक क्षमता को बढ़ाएगा, जिससे बिना नए फाइटर खरीदे भी वायुसेना की ताकत बढ़ जाएगी।
तेजस Mk2 के साथ भविष्य की जोड़ी
भारत के स्वदेशी फाइटर जेट HAL Tejas Mk2 के साथ भी ‘घातक’ को जोड़ने की योजना है।
Tejas Mk2 में आधुनिक डेटा लिंक और MUMT (Manned-Unmanned Teaming) तकनीक दी जा रही है, जिससे यह ड्रोन के साथ रियल-टाइम कम्युनिकेशन कर सकेगा।
इस कॉम्बिनेशन का लक्ष्य है:
- पायलट और ड्रोन की टीमवर्क बढ़ाना
- युद्ध के दौरान तेज निर्णय क्षमता
- और दुश्मन पर मल्टी-लेयर अटैक
‘घातक’ का इस्तेमाल कैसे होगा?
वायुसेना की योजना के अनुसार ‘घातक’ को कई भूमिकाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है:
- दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करना
- अग्रिम पंक्ति से हमला करना
- हाई-रिस्क मिशनों में मानव पायलट को बचाना
- और रियल-टाइम सर्विलांस देना
यह ड्रोन फ्रंटलाइन एयरबेस से भी लॉन्च किया जा सकता है, जिससे तेजी से प्रतिक्रिया संभव होगी।
भविष्य की युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव
‘घातक’ सिर्फ एक ड्रोन नहीं है, बल्कि यह भारत की एयर डिफेंस रणनीति में एक बड़ा बदलाव है।
यह बदलाव तीन स्तरों पर दिखता है:
1. टेक्नोलॉजी आधारित युद्ध
अब युद्ध सिर्फ पायलटों पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि AI और ऑटोनॉमस सिस्टम भी हिस्सा होंगे।
2. लागत और क्षमता संतुलन
कम लागत में ज्यादा ऑपरेशनल क्षमता हासिल की जा सकेगी।
3. मानव + मशीन टीमवर्क
पायलट और ड्रोन मिलकर एक यूनिट की तरह काम करेंगे।
निष्कर्ष: भारत की एयर पावर का नया युग
‘घातक’ UCAV प्रोजेक्ट भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आधुनिकता का प्रतीक बनता जा रहा है।
अगर यह योजना सफल होती है, तो भारतीय वायुसेना दुनिया की उन चुनिंदा एयरफोर्स में शामिल हो जाएगी, जो मानव और बिना मानव वाले विमानों को एक साथ कॉम्बैट मिशन में इस्तेमाल करती हैं।
यह न सिर्फ तकनीकी उन्नति है, बल्कि भारत की भविष्य की युद्ध नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव भी है।
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