मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच दुनिया की सबसे अहम ऊर्जा लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट पर खतरा बढ़ गया है। ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने इस समुद्री मार्ग को बेहद संवेदनशील बना दिया है। इसके बावजूद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देश तेल और गैस की सप्लाई रोकने के बजाय नई रणनीतियों के जरिए निर्यात जारी रखे हुए हैं।
अब इस पूरे खेल में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है — ‘डार्क ट्रांजिट’। यह ऐसी रणनीति है जिसमें जहाज ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके समुद्र में आगे बढ़ते हैं ताकि उनकी वास्तविक लोकेशन को सार्वजनिक तौर पर ट्रैक न किया जा सके। ब्लूमबर्ग की जहाज ट्रैकिंग रिपोर्ट और शिपिंग इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यूएई की सरकारी तेल कंपनी एडनॉक (ADNOC) और कतर की LNG कंपनियां इसी मॉडल का इस्तेमाल कर रही हैं।
क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में गिना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह रास्ता वैश्विक ऊर्जा व्यापार की रीढ़ माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के मुताबिक दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। खाड़ी के प्रमुख तेल उत्पादक देश — सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत और इराक — अपने निर्यात के लिए इसी रूट पर निर्भर हैं।
यही वजह है कि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ते ही सबसे पहले कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर असर दिखाई देता है। अगर होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह बाधित हो जाए तो दुनिया भर में ऊर्जा संकट और महंगाई बढ़ सकती है।
क्या है ‘डार्क ट्रांजिट’?
डार्क ट्रांजिट ऐसी समुद्री यात्रा को कहा जाता है जिसमें जहाज अपना AIS (Automatic Identification System) या ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं। सामान्य स्थिति में हर बड़े जहाज की लोकेशन, गति और दिशा सार्वजनिक समुद्री ट्रैकिंग सिस्टम पर दिखाई देती है। लेकिन जब जहाज सिग्नल बंद कर देता है तो वह कुछ समय के लिए ट्रैकिंग मैप से गायब हो जाता है। यही कारण है कि इसे ‘अंधेरे में यात्रा’ या ‘डार्क ट्रांजिट’ कहा जा रहा है।
इस रणनीति का मकसद कई तरह के जोखिमों को कम करना होता है संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में निगरानी से बचना, संभावित हमलों या ड्रोन ट्रैकिंग का खतरा कम करना, सैन्य तनाव के दौरान जहाजों की मूवमेंट छिपाना, ऊर्जा सप्लाई को बिना रुकावट जारी रखना विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में यह रणनीति खाड़ी देशों के लिए अस्थायी सुरक्षा कवच की तरह काम कर रही है।
ADNOC कैसे चला रही है अपना ऑपरेशन?
यूएई की सरकारी ऊर्जा कंपनी ADNOC इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने किराए के जहाजों पर निर्भर रहने के बजाय अपने खुद के जहाजी बेड़े का इस्तेमाल बढ़ा दिया है। इस बेड़े में कच्चे तेल के टैंकर, रिफाइंड प्रोडक्ट कैरियर, LNG जहाज, Navig8 के जरिए संचालित शिप्स, वानहुआ केमिकल ग्रुप के साथ जॉइंट वेंचर वाले जहाज शामिल हैं। इस मॉडल का फायदा यह है कि कंपनी को बाहरी जहाज मालिकों पर कम निर्भर रहना पड़ता है। तनाव बढ़ने पर कई निजी जहाज मालिक जोखिम के कारण खाड़ी क्षेत्र में प्रवेश से बचते हैं। लेकिन ADNOC अपने कंट्रोल वाले जहाजों के जरिए निर्यात जारी रख पा रही है।
‘शटल रन’ रणनीति क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार ADNOC ने ‘शटल रन’ नाम की रणनीति भी अपनाई है। इसमें जहाज छोटी दूरी के लगातार चक्कर लगाते हैं। उदाहरण के तौर पर जहाज टर्मिनल से तेल लेकर बाहर निकलता है, सुरक्षित क्षेत्र तक पहुंचकर कार्गो ट्रांसफर करता है फिर तुरंत वापस लौट जाता है दोबारा माल भरकर अगली खेप रवाना की जाती है इससे जिरकू द्वीप और रुवैस रिफाइनरी जैसे प्रमुख टर्मिनलों से सप्लाई की गति बनी रहती है।
जहाजों के बीच समुद्र में ट्रांसफर
ऊर्जा कंपनियां अब ‘शिप-टू-शिप ट्रांसफर’ का इस्तेमाल भी बढ़ा रही हैं। इसमें एक जहाज से दूसरे जहाज में समुद्र के बीच तेल या गैस ट्रांसफर की जाती है। ऐसे ट्रांसफर फुजैरा के पास, ओमान के सोहर क्षेत्र में, भारत के पश्चिमी समुद्री मार्गों के आसपास किए जा रहे हैं। इससे असली कार्गो रूट को छिपाने और जोखिम कम करने में मदद मिलती है।
कतर भी अपना LNG एक्सपोर्ट जारी रखे हुए है
दुनिया के सबसे बड़े LNG निर्यातकों में शामिल कतर ने भी होर्मुज के रास्ते अपनी गैस सप्लाई बंद नहीं की है। जहाज ट्रैकिंग डेटा के अनुसार हाल ही में ‘अल रयान’ नाम का LNG टैंकर होर्मुज स्ट्रेट पार करने के बाद ओमान के पास देखा गया। यह चीन की ओर जा रहा था। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया कि जहाज ने रास लफान LNG टर्मिनल के पास कुछ समय के लिए अपने सिग्नल बंद कर दिए थे। विशेषज्ञों के अनुसार अब इस तरह का ‘स्टेल्थ नेविगेशन’ आम होता जा रहा है।
LNG ऑपरेशन में भी छिपी आवाजाही
ADNOC के LNG ऑपरेशन में भी इसी तरह की रणनीति अपनाई जा रही है। जहाज फुजैराह के पास स्ट्रेट में प्रवेश करने के बाद ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर देते हैं और दास द्वीप की ओर बढ़ते हैं। दास द्वीप यूएई का प्रमुख LNG एक्सपोर्ट हब माना जाता है। सैटेलाइट तस्वीरों से यह संकेत मिला है कि सीमित ट्रैकिंग डेटा के बावजूद वहां गतिविधियां लगातार जारी हैं।
दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव और बढ़ता है तो:
- कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं
- LNG सप्लाई महंगी हो सकती है
- एशियाई देशों की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है
- भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर दबाव बढ़ सकता है
- पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है
- महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में होर्मुज क्षेत्र में किसी भी बड़ी रुकावट का असर सीधे भारतीय बाजार और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
अभी भी संघर्ष-पूर्व स्तर से कम है सप्लाई
हालांकि सप्लाई पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा निर्यात अभी भी संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर तक नहीं पहुंचा है। खासतौर पर LNG व्यापार में सामान्य दिनों की तुलना में कम जहाज मूवमेंट दर्ज की गई है।
कम विजिबिलिटी वाले नेविगेशन के कारण यह पता लगाना भी मुश्किल हो गया है कि कौन सा जहाज किस रूट से जा रहा है। कुछ जहाज वैकल्पिक समुद्री गलियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि कुछ ईरानी प्रभाव वाले समुद्री क्षेत्रों से होकर गुजर रहे हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा मामला?
होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे अहम केंद्र बन चुका है। UAE और कतर की ‘डार्क ट्रांजिट’ रणनीति यह दिखाती है कि खाड़ी देश किसी भी हालत में तेल और गैस निर्यात रोकना नहीं चाहते। लेकिन अगर क्षेत्रीय संघर्ष और बढ़ा तो यह मॉडल लंबे समय तक टिक पाना मुश्किल हो सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें इसी बात पर टिकी हैं कि मिडिल ईस्ट में तनाव कितना बढ़ता है और क्या होर्मुज स्ट्रेट आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा संकट बन सकता है।
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