Fertilizer Black Marketing: सरकार ने ई-वे बिल के डेटा का इस्तेमाल कर सब्सिडी वाले उर्वरकों की सप्लाई में हो रही कथित हेराफेरी का पता लगाया है। जांच में सामने आया कि किसानों के लिए भारी सब्सिडी पर उपलब्ध कराए जाने वाले उर्वरकों की कुछ खेपों को तय आपूर्ति व्यवस्था से हटाकर औद्योगिक इस्तेमाल की ओर मोड़े जाने के संकेत मिले हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और पंजाब समेत कई राज्यों में ऐसी गतिविधियों की पहचान की गई है।
Highlights
- ई-वे बिल डेटा के विश्लेषण से सब्सिडी वाले उर्वरकों की आवाजाही में गड़बड़ी के संकेत मिले।
- कुछ उर्वरकों को कृषि के बजाय औद्योगिक उपयोग की ओर मोड़े जाने की जानकारी सामने आई।
- राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और पंजाब में अवैध सप्लाई के मामले सामने आए।
- सरकार उर्वरकों की सप्लाई और वितरण की निगरानी के लिए डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। किसानों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार उर्वरकों पर बड़ी मात्रा में सब्सिडी देती है। ऐसे में इन उर्वरकों की सप्लाई में किसी भी तरह की हेराफेरी का सीधा असर किसानों की उपलब्धता और बाजार व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसी बीच सरकार ने ई-वे बिल के डेटा का विश्लेषण कर सब्सिडी वाले उर्वरकों की आवाजाही में गड़बड़ी के कुछ मामलों की पहचान की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की उपलब्धता और सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ीं। इसी दौरान केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में सब्सिडी वाले उर्वरकों की आवाजाही और उपलब्धता पर ज्यादा बारीकी से नजर रखी। वित्त मंत्रालय की ओर से किए गए डेटा एनालिसिस में ई-वे बिल से जुड़ी जानकारियों का इस्तेमाल किया गया, जिसके बाद उर्वरक विभाग को कुछ संदिग्ध गतिविधियों के बारे में सतर्क किया गया।
सब्सिडी वाली खाद की सप्लाई में क्या गड़बड़ी मिली?
ई-वे बिल डेटा के विश्लेषण में कुछ ऐसी खेपों की आवाजाही सामने आई, जिनके रूट और निर्धारित डेस्टिनेशन में अंतर पाया गया। कुछ मामलों में रास्ते में माल उतारने और निर्धारित स्थान तक खेप के पहुंचने में देरी जैसे संकेत भी मिले।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सब्सिडी वाले उर्वरक किसानों के लिए निर्धारित व्यवस्था के तहत वितरित किए जाते हैं। यदि इन्हें बीच रास्ते में किसी अन्य उपयोग के लिए मोड़ा जाता है तो इससे संबंधित क्षेत्र में किसानों के लिए उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
नीम कोटेड यूरिया का भी गलत इस्तेमाल
रिपोर्ट के मुताबिक, नीम कोटेड यूरिया की औद्योगिक उपयोगकर्ताओं तक कथित अवैध सप्लाई को लेकर भी चिंता सामने आई है। इसमें प्लाईवुड और रेजिन बनाने वाली इकाइयों के साथ-साथ डीजल एग्जॉस्ट फ्लूइड (DEF) और पशु आहार से जुड़े कुछ उपयोगकर्ताओं का उल्लेख किया गया है।
उर्वरकों की ऐसी डायवर्जन गतिविधियों का पता लगाना इसलिए चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि सप्लाई चेन में कई स्तर शामिल होते हैं। ई-वे बिल जैसे डिजिटल रिकॉर्ड इन गतिविधियों की जांच में महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध करा सकते हैं।
राजस्थान से उत्तर प्रदेश तक इन राज्यों में जांच
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और पंजाब उन राज्यों में शामिल हैं जहां सब्सिडी वाले उर्वरकों की कथित अवैध सप्लाई या डायवर्जन से जुड़े मामले सामने आए हैं।
इसके अलावा एक संसदीय स्थायी समिति ने भी उर्वरकों की ढुलाई के दौरान रूट में बदलाव और कुछ स्थानों पर अनलोडिंग से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया है। खासतौर पर दूरदराज के क्षेत्रों तक उर्वरक पहुंचाने में आने वाली चुनौतियों पर भी ध्यान दिया गया है।
जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में रेक पॉइंट से दूर स्थित जिलों तक खाद पहुंचाने के दौरान कुछ मात्रा में अनलोडिंग और मार्ग परिवर्तन की शिकायतों का उल्लेख किया गया है। मध्य प्रदेश में भी वैध दस्तावेजों के बिना माल की आवाजाही और निर्धारित डेस्टिनेशन पर माल पहुंचने की सूचना में देरी जैसे मुद्दे सामने आए हैं।
E-Way Bill से कैसे पकड़ी गई गड़बड़ी?
ई-वे बिल यानी Electronic Way Bill GST व्यवस्था के तहत माल की आवाजाही से जुड़ा इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज है। सामान्य तौर पर ₹50,000 से अधिक मूल्य की कई तरह की वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने पर नियमों के अनुसार ई-वे बिल की जरूरत होती है।
सरकार के पास इस सिस्टम के जरिए माल की आवाजाही से जुड़ा डिजिटल डेटा उपलब्ध होता है। इसी डेटा का विश्लेषण करके यह देखा जा सकता है कि कोई खेप कहां से चली, उसका निर्धारित गंतव्य क्या था और रास्ते में उसकी आवाजाही नियमों के अनुरूप हुई या नहीं।
उर्वरक मामले में इसी डेटा के विश्लेषण से कुछ ट्रकों के रूट में बदलाव और कथित अनलोडिंग जैसी गतिविधियों की पहचान हुई। इस तरह ई-वे बिल सिर्फ टैक्स अनुपालन का दस्तावेज नहीं रहा, बल्कि सप्लाई चेन की निगरानी और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए भी उपयोगी साबित हो रहा है।
IFMS से भी होती है उर्वरकों की निगरानी
उर्वरक विभाग सब्सिडी वाले उर्वरकों की उपलब्धता और वितरण पर नजर रखने के लिए Integrated Fertilizer Management System (IFMS) का इस्तेमाल करता है। यह व्यवस्था उर्वरक सप्लाई चेन से जुड़ी जानकारी को ट्रैक करने में मदद करती है।
ई-वे बिल से प्राप्त लॉजिस्टिक्स डेटा और उर्वरक विभाग के रिकॉर्ड को मिलाकर देखने से सप्लाई में संभावित अंतर की पहचान करना आसान हो सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कागजों में दिखाई गई सप्लाई और वास्तविक आवाजाही में कोई अंतर तो नहीं है।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
सरकार किसानों को उर्वरक अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी देती है। इसलिए सब्सिडी वाला उर्वरक यदि तय कृषि उपयोग के बजाय किसी दूसरे क्षेत्र में पहुंचता है तो इसका असर सिर्फ सरकारी सब्सिडी पर नहीं, बल्कि किसानों की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
खासकर बुवाई के महत्वपूर्ण सीजन में किसी इलाके में खाद की कमी होने पर किसानों को अधिक कीमत, लंबी कतार या दूसरे बाजारों पर निर्भर होना पड़ सकता है। ऐसे में डिजिटल डेटा के जरिए सप्लाई चेन की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकार की ओर से डेटा आधारित निगरानी बढ़ाए जाने के साथ उर्वरकों की उपलब्धता में सुधार और स्टॉक बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। हालांकि, कथित अवैध डायवर्जन के मामलों में आगे की जांच और कार्रवाई के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।
Source: मीडिया रिपोर्ट्स और उपलब्ध सरकारी/संसदीय दस्तावेजों में सामने आई जानकारी पर आधारित।
डिस्क्लेमर: इस खबर में उर्वरक सप्लाई और कथित अवैध डायवर्जन से जुड़ी जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आए तथ्यों पर आधारित है। संबंधित मामलों में जांच और आधिकारिक कार्रवाई की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।


