Gold Monetisation Scheme Update 2026: भारत सरकार घरों में वर्षों से निष्क्रिय पड़े करीब 30,000 टन सोने को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (Gold Monetisation Scheme) में बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। सबसे अहम बदलाव यह होगा कि पहली बार ज्वैलर्स को भी इस योजना का हिस्सा बनाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि इससे लोग अपनी तिजोरियों और लॉकरों में रखे सोने को बैंकिंग सिस्टम तक लाने के लिए अधिक प्रेरित होंगे।
Highlights
- घरों में पड़े लगभग 30,000 टन निष्क्रिय सोने को बाजार में लाने की तैयारी।
- Gold Monetisation Scheme में पहली बार ज्वैलर्स को शामिल करने की योजना।
- अगस्त तक नई नीति की घोषणा संभव।
- सोने के आयात पर निर्भरता कम करना सरकार का मुख्य लक्ष्य।
- घरेलू सोने का उपयोग बढ़ाकर विदेशी मुद्रा की बचत की जाएगी।
सरकार की नई तैयारी क्या है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर साल भारी मात्रा में सोने का आयात किया जाता है, जबकि अनुमान है कि भारतीय परिवारों के पास लगभग 30,000 टन सोना घरों और लॉकरों में बिना किसी आर्थिक उपयोग के रखा हुआ है।
अब सरकार इसी निष्क्रिय संपत्ति को सक्रिय आर्थिक संसाधन में बदलना चाहती है। इसके लिए Gold Monetisation Scheme (GMS) को नए स्वरूप में लाने पर काम चल रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार अगस्त तक संशोधित योजना की घोषणा कर सकती है। इस बार योजना को अधिक व्यावहारिक और लोगों के लिए सुविधाजनक बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
क्या है Gold Monetisation Scheme?
भारत सरकार ने 2015 में Gold Monetisation Scheme की शुरुआत की थी।
इस योजना का उद्देश्य था कि लोग अपने घरों में पड़े सोने को बैंक में जमा करें और उस पर ब्याज प्राप्त करें।
इस स्कीम के तहत—
- सोने की शुद्धता की जांच होती है।
- सोना बैंक के माध्यम से जमा किया जाता है।
- जमा अवधि के अनुसार ब्याज मिलता है।
- मैच्योरिटी पर सोना या उसके बराबर राशि वापस मिल सकती है।
सरकार इस सोने का उपयोग ज्वैलरी उद्योग और अन्य आवश्यकताओं के लिए करती है, जिससे नए सोने के आयात की जरूरत कम होती है।
पहले यह योजना सफल क्यों नहीं हो सकी?
हालांकि Gold Monetisation Scheme की शुरुआत बड़े उद्देश्य के साथ हुई थी, लेकिन इसे उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली।
इसके पीछे कई प्रमुख कारण रहे—
1. भावनात्मक जुड़ाव
भारत में सोना केवल निवेश नहीं बल्कि पारिवारिक विरासत और भावनाओं से भी जुड़ा होता है। लोग अपने गहने बैंक में जमा कराने से हिचकिचाते हैं।
2. प्रक्रिया जटिल होना
सोने की जांच, शुद्धता परीक्षण और जमा प्रक्रिया कई लोगों को कठिन लगी।
3. कम जागरूकता
ग्रामीण और छोटे शहरों में बड़ी संख्या में लोगों को इस योजना की पूरी जानकारी ही नहीं मिल सकी।
4. सीमित पहुंच
स्कीम में केवल बैंक और अधिकृत संस्थानों की भागीदारी होने के कारण इसकी पहुंच सीमित रही।
अब ज्वैलर्स को शामिल करने की तैयारी क्यों?
सरकार मानती है कि भारतीय उपभोक्ताओं का सबसे अधिक भरोसा स्थानीय ज्वैलर्स पर होता है।
यही कारण है कि नई योजना में ज्वैलर्स को महत्वपूर्ण भूमिका देने पर विचार किया जा रहा है।
यदि ऐसा होता है तो—
- ग्राहक अपने भरोसेमंद ज्वैलर्स के माध्यम से योजना की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
- जमा प्रक्रिया आसान हो सकती है।
- लोगों का विश्वास बढ़ेगा।
- स्कीम में भागीदारी पहले की तुलना में अधिक हो सकती है।
सरकार का मानना है कि ज्वैलर्स लोगों को समझा सकते हैं कि घर में रखा निष्क्रिय सोना आय का स्रोत भी बन सकता है।
30,000 टन सोना कितना बड़ा आंकड़ा है?
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के परिवारों के पास मौजूद लगभग 30,000 टन सोना दुनिया के सबसे बड़े निजी गोल्ड स्टॉक में से एक माना जाता है।
यदि इसका केवल एक छोटा हिस्सा भी बैंकिंग सिस्टम में आ जाए तो—
- सोने का आयात कम होगा।
- ज्वैलरी उद्योग को घरेलू स्तर पर सोना उपलब्ध होगा।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
सरकार को इससे क्या फायदा होगा?
नई योजना से सरकार कई आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है।
विदेशी मुद्रा की बचत
भारत हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। यदि घरेलू सोना उपलब्ध होगा तो आयात कम करना संभव होगा।
आयात बिल में कमी
सोने का आयात कम होने से देश का Import Bill घट सकता है।
आर्थिक गतिविधियों में तेजी
घरों में निष्क्रिय पड़ा सोना बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली का हिस्सा बनेगा, जिससे आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी।
ज्वैलरी उद्योग को लाभ
घरेलू बाजार में अधिक सोना उपलब्ध होने से ज्वैलरी उद्योग की लागत कम हो सकती है।
आम लोगों को क्या फायदा मिलेगा?
यदि संशोधित योजना लागू होती है तो निवेशकों को कई संभावित लाभ मिल सकते हैं।
- घर में रखे सोने पर ब्याज कमाने का अवसर।
- सुरक्षित बैंकिंग व्यवस्था।
- निष्क्रिय संपत्ति से अतिरिक्त आय।
- भविष्य में अधिक सरल और सुविधाजनक प्रक्रिया।
- भरोसेमंद ज्वैलर्स के माध्यम से आसान भागीदारी।
क्या आपके गहने पिघलाए जाएंगे?
Gold Monetisation Scheme में जमा किए गए सोने की शुद्धता जांचने के बाद उसे रिफाइनिंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए पारंपरिक आभूषण उसी रूप में वापस नहीं मिलते।
यही कारण है कि कई लोग पारिवारिक और भावनात्मक महत्व वाले गहनों को इस योजना में शामिल करने से बचते हैं।
संभावना है कि नई नीति में इस चिंता को कम करने के लिए कुछ नए विकल्पों पर भी विचार किया जाए, हालांकि अभी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
प्रधानमंत्री की अपील भी रही चर्चा में
हाल ही में प्रधानमंत्री ने भी गैर-जरूरी सोने की खरीद को कुछ समय के लिए टालने की अपील की थी। इसके पीछे उद्देश्य देश के आयात खर्च को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा की बचत करना बताया गया था।
नई Gold Monetisation Scheme को भी इसी व्यापक आर्थिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
क्या अगस्त में हो सकता है बड़ा ऐलान?
रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार अगस्त 2026 तक संशोधित Gold Monetisation Scheme की घोषणा कर सकती है।
हालांकि अभी तक वित्त मंत्रालय की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है। इसलिए अंतिम नियम, ब्याज दर, पात्रता और ज्वैलर्स की भूमिका जैसी जानकारियां सरकारी घोषणा के बाद ही स्पष्ट होंगी।
निष्कर्ष
भारत सरकार घरों में वर्षों से निष्क्रिय पड़े लगभग 30,000 टन सोने को आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा बनाने के लिए Gold Monetisation Scheme में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रही है। इस बार योजना की सबसे बड़ी खासियत ज्वैलर्स की संभावित भागीदारी होगी, जिससे लोगों का भरोसा बढ़ने और योजना की पहुंच विस्तृत होने की उम्मीद है।
यदि यह योजना सफल होती है तो न केवल आम नागरिक अपने निष्क्रिय सोने से आय अर्जित कर सकेंगे, बल्कि देश का सोना आयात बिल भी कम होगा और विदेशी मुद्रा की बचत के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।


