नई दिल्ली: उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े अमेरिकी कानूनी मामले में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी न्याय विभाग (Department of Justice – DoJ) ने अदालत में स्पष्ट किया है कि उसने गौतम अडानी और अन्य सात आरोपियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला कई कानूनी और व्यावहारिक कारणों के आधार पर वापस लिया है। विभाग ने अदालत के समक्ष 10 पन्नों का विस्तृत हलफनामा दाखिल करते हुए बताया कि इस मामले में न तो निवेशकों को प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान हुआ और न ही अभियोजन को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त परिस्थितियां मौजूद थीं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नवंबर 2024 में आरोप सामने आने के बाद अडानी समूह के शेयरों में तेज गिरावट आई थी। वहीं मामला वापस लेने के बाद निवेशकों का भरोसा लौटता दिखाई दिया और समूह की कई योजनाओं को नई गति मिली।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी न्याय विभाग ने पहले गौतम अडानी समेत आठ लोगों पर आरोप लगाए थे कि उन्होंने कुछ कारोबारी गतिविधियों के दौरान अमेरिकी कानूनों का उल्लंघन किया। हालांकि बाद में विस्तृत समीक्षा, दस्तावेजों की जांच और बचाव पक्ष की दलीलों पर विचार करने के बाद DoJ ने अदालत से मामला वापस लेने की अनुमति मांगी।
अमेरिकी जिला जज निकोलस गराउफिस ने न्याय विभाग से पूछा कि यदि मामला वापस लिया जा रहा है तो इसे स्थायी रूप से समाप्त क्यों किया जाए। इसके जवाब में DoJ ने विस्तृत हलफनामा दाखिल कर अपने फैसले का आधार स्पष्ट किया।
DoJ ने बताए केस वापस लेने के 6 बड़े कारण
1. कथित घटनाएं पूरी तरह भारत में हुईं
न्याय विभाग के अनुसार, जिन घटनाओं के आधार पर मामला दर्ज किया गया था, वे मुख्य रूप से भारत में हुई थीं। इसलिए अमेरिकी अदालत के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का प्रश्न जटिल हो गया।
2. भारतीय एजेंसियों को कोई गंभीर अनियमितता नहीं मिली
DoJ ने अदालत को बताया कि भारतीय जांच एजेंसियों की ओर से ऐसी कोई पुष्टि नहीं हुई जिससे गंभीर आपराधिक कार्रवाई का आधार मजबूत हो सके। इससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर माना गया।
3. निवेशकों को वित्तीय नुकसान नहीं हुआ
यह सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक रहा। न्याय विभाग ने कहा कि जांच के दौरान ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे साबित हो कि निवेशकों को प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान हुआ है।
यदि किसी निवेशक को नुकसान ही नहीं हुआ तो अदालत में मुआवजे का सवाल भी कमजोर पड़ जाता है।
4. गवाह और सबूत जुटाना बेहद कठिन
DoJ ने कहा कि अधिकांश गवाह, दस्तावेज और अन्य साक्ष्य भारत सहित दूसरे देशों में मौजूद थे। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साक्ष्य जुटाना लंबी, जटिल और महंगी प्रक्रिया बन सकती थी।
5. आरोपियों के अमेरिकी अदालत में पेश होने की संभावना कम
विभाग का कहना था कि जिन लोगों पर आरोप लगाए गए थे, उनके अमेरिकी अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की संभावना बेहद कम थी। इससे मुकदमे को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता था।
6. अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं
DoJ ने स्वीकार किया कि यह मामला अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र की आवश्यक शर्तों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता था। इसलिए मुकदमा लंबे समय तक चलाने का औचित्य नहीं बनता था।
पिछली अमेरिकी सरकार पर भी उठाए सवाल
हलफनामे में न्याय विभाग ने यह भी संकेत दिया कि मामला पिछली अमेरिकी सरकार के अंतिम दौर में जल्दबाजी में दर्ज किया गया था।
विभाग के अनुसार, आरोप लगाए जाने के बाद मुकदमे को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने की संभावना सीमित थी। इसलिए विस्तृत कानूनी समीक्षा के बाद इसे वापस लेने का फैसला लिया गया।
हालांकि यह न्याय विभाग का कानूनी पक्ष है और इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपों के तथ्यों पर अंतिम निर्णय दिया है।
SEC के साथ 170 करोड़ रुपये का समझौता
आपराधिक मामले से अलग, अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (SEC) से जुड़े एक सिविल मामले में गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी ने समझौते पर सहमति जताई।
इस समझौते के तहत लगभग 1.8 करोड़ डॉलर (करीब 170 करोड़ रुपये) का भुगतान करने पर सहमति बनी। यह मामला अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड से जुड़े कुछ कथित भ्रामक बयानों से संबंधित था।
ध्यान देने वाली बात यह है कि सिविल मामला और आपराधिक मामला दोनों अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं होती हैं।
किन लोगों के नाम शामिल थे?
इस मामले में निम्नलिखित लोगों के नाम सामने आए थे—
- गौतम अडानी
- सागर अडानी
- विनीत जैन
- रंजीत गुप्ता
- सिरिल कैबनेस
- सौरभ अग्रवाल
- दीपक मल्होत्रा
- रूपेश अग्रवाल
शेयर बाजार पर क्या पड़ा असर?
नवंबर 2024 में आरोप सामने आने के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। निवेशकों की चिंता के चलते समूह के बाजार पूंजीकरण (Market Capitalization) में भी बड़ी कमी आई।
लेकिन जब मई 2025 में DoJ ने मामला वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की, तब बाजार की धारणा में सुधार देखने को मिला।
इसके बाद—
- अडानी समूह के कई शेयरों में तेजी लौटी।
- अडानी एंटरप्राइजेज ने 15,000 करोड़ रुपये की शेयर बिक्री सफलतापूर्वक पूरी की।
- लगभग 11.5 अरब डॉलर की लागत वाले बड़े एल्युमिनियम प्लांट प्रोजेक्ट पर भी आगे बढ़ने की दिशा में समझौता हुआ।
क्या केस पूरी तरह खत्म हो गया?
DoJ द्वारा आपराधिक मामला वापस लेने का अर्थ यह है कि अमेरिकी न्याय विभाग अब इस विशेष आपराधिक मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। हालांकि इससे जुड़े अन्य नियामकीय या सिविल मामलों की कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से अडानी समूह को अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन बड़े कॉर्पोरेट मामलों में नियामकीय निगरानी आगे भी जारी रह सकती है।
निष्कर्ष
गौतम अडानी से जुड़े इस मामले में अमेरिकी न्याय विभाग का रुख बदलना एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम है। विभाग ने अदालत में स्पष्ट किया कि अधिकार क्षेत्र, पर्याप्त साक्ष्यों की कमी, निवेशकों को प्रत्यक्ष नुकसान न होना और अंतरराष्ट्रीय जांच की व्यावहारिक कठिनाइयों जैसे कई कारणों से आपराधिक मामला आगे बढ़ाना उचित नहीं था।
हालांकि यह फैसला अडानी समूह के लिए राहत लेकर आया है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि आपराधिक और सिविल मामलों की कानूनी प्रकृति अलग होती है। आने वाले समय में निवेशक और बाजार दोनों इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मामलों पर करीबी नजर बनाए रखेंगे।


