नई दिल्ली: पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण वैश्विक ईंधन आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। कई देशों में डीजल, जेट फ्यूल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की जरूरत बढ़ने के बीच भारत और अमेरिका की रिफाइनरियों को इसका बड़ा फायदा मिल रहा है। इन दोनों देशों की रिफाइनरियां उन बाजारों में ईंधन पहुंचा रही हैं, जहां पहले रूस और पश्चिम एशिया से सप्लाई पर ज्यादा निर्भरता थी।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सप्लाई में आई बाधाओं ने अंतरराष्ट्रीय ईंधन बाजार में कीमतों और रिफाइनिंग मार्जिन को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में भारत और अमेरिका के रिफाइनरों को मजबूत मांग और बेहतर मार्जिन का फायदा मिल रहा है।
भारत बना एशिया के लिए अहम ईंधन सप्लायर
Rystad Energy के विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी क्षेत्रीय बाजार में ईंधन की कमी होती है तो भारत एशिया के लिए महत्वपूर्ण वैकल्पिक सप्लायर के रूप में उभरता है। भारत की बड़ी रिफाइनिंग क्षमता और ऊंची क्षमता उपयोग दर इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी जैसी प्रमुख रिफाइनरियां घरेलू जरूरत पूरी करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति कर रही हैं। पश्चिम एशिया और रूस से आने वाली सप्लाई में व्यवधान के कारण भारत से निर्यात की मांग और बढ़ी है।
दुनिया की रिफाइनिंग क्षमता पर बढ़ा दबाव
वैश्विक ईंधन बाजार की समस्या केवल कच्चे तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। रिफाइनिंग क्षमता पर भी दबाव बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता का उपयोग करीब 89 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा। यह पिछले साल की तुलना में लगभग 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम है। दूसरी तरफ, दुनिया में तेल की मांग 100 मिलियन बैरल प्रतिदिन से ऊपर बनी हुई है।
इस अंतर के कारण तैयार ईंधन की सप्लाई पर दबाव बढ़ रहा है और जिन देशों के पास अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता है, उन्हें इसका फायदा मिल रहा है।
अमेरिका ने भी बढ़ाया ईंधन निर्यात
अमेरिकी रिफाइनरियों को भी वैश्विक सप्लाई संकट का फायदा मिला है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 7 अगस्त को समाप्त सप्ताह में अमेरिका से डीजल और हीटिंग ऑयल जैसे डिस्टिलेट ईंधनों का निर्यात रिकॉर्ड करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया।
जेट फ्यूल के निर्यात में भी तेजी देखने को मिली। इस अवधि में अमेरिका से जेट फ्यूल का निर्यात करीब 4.43 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। यह मई में दर्ज लगभग 4.55 लाख बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड के काफी करीब है।
इससे संकेत मिलता है कि अमेरिकी रिफाइनरियां घरेलू मांग के साथ-साथ विदेशों में पैदा हुई कमी को पूरा करने के लिए भी अपनी सप्लाई बढ़ा रही हैं।
इंडोनेशिया और ब्राजील से बढ़ी मांग
ईंधन की अतिरिक्त मांग भारत और अमेरिका के लिए नए बाजार तैयार कर रही है। एशिया के प्रमुख पेट्रोल आयातकों में शामिल इंडोनेशिया भारत समेत अन्य देशों से खरीदारी जारी रखे हुए है।
वहीं रूस की ओर से ईंधन निर्यात पर प्रतिबंध बढ़ाए जाने के बाद ब्राजील ने अमेरिका से डीजल की खरीद बढ़ाई है। रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील का अमेरिका से डीजल आयात दोगुना हुआ है।
इस तरह रूस और पश्चिम एशिया से सप्लाई में कमी का असर वैश्विक व्यापार के रास्तों को बदल रहा है। आयातक देश अब वैकल्पिक सप्लायरों की ओर रुख कर रहे हैं।
चीन बढ़ा सकता है भारत-अमेरिका की चुनौती
भारत और अमेरिका के रिफाइनरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन से आ सकती है। चीन लंबे समय से एशिया के प्रमुख ईंधन निर्यातकों में शामिल रहा है।
चीन ने जुलाई से ईंधन निर्यात पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है। LSEG Research के अनुसार, जुलाई में चीन का ईंधन निर्यात बढ़कर करीब 11 लाख टन हो गया, जबकि जून में यह लगभग 2.41 लाख टन था।
अगर चीन आने वाले महीनों में निर्यात और बढ़ाता है तो एशियाई बाजार में उपलब्ध ईंधन की मात्रा बढ़ सकती है। इससे भारत की रिफाइनरियों को मिलने वाले निर्यात मार्जिन पर दबाव पड़ने की संभावना है।
दक्षिण कोरिया से सीमित रह सकती है अतिरिक्त सप्लाई
दक्षिण कोरिया समेत एशिया के अन्य प्रमुख ईंधन निर्यातकों से भी अतिरिक्त सप्लाई की उम्मीद है, लेकिन इसकी सीमा फिलहाल कम रह सकती है।
कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता के कारण कुछ एशियाई रिफाइनरियां उत्पादन बढ़ाने में सावधानी बरत रही हैं। ऐसे में भारत और अमेरिका जैसी बड़ी रिफाइनिंग क्षमताओं वाले देशों की भूमिका फिलहाल महत्वपूर्ण बनी हुई है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह स्थिति?
वैश्विक ईंधन संकट भारत के लिए दो तरह का असर पैदा कर सकता है। एक तरफ भारतीय रिफाइनरियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत मांग और बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन का फायदा मिल सकता है। दूसरी तरफ, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है तो भारत की आयात लागत बढ़ सकती है।
इसलिए भारत के लिए फायदा केवल ज्यादा ईंधन निर्यात करने तक सीमित नहीं है। असली फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमत, घरेलू ईंधन मांग और अंतरराष्ट्रीय रिफाइनिंग मार्जिन आने वाले दिनों में किस दिशा में जाते हैं।
फिलहाल पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने वैश्विक ईंधन व्यापार का समीकरण बदल दिया है। रूस और पश्चिम एशिया की सप्लाई में आई बाधाओं के बीच भारत और अमेरिका की रिफाइनरियां खाली जगह भर रही हैं। यही वजह है कि दोनों देशों के रिफाइनरों के लिए मौजूदा संकट कमाई का बड़ा अवसर बन गया है।


