पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारतीय परिवारों की जेब पर दिखाई देने लगा है। मई महीने में तीसरी बार पेट्रोल, डीजल और CNG की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। ट्रांसपोर्ट से लेकर किचन तक हर स्तर पर खर्च बढ़ने की आशंका गहरा गई है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर मिडिल ईस्ट संकट और लंबा खिंचता है, तो आने वाले दिनों में LPG, PNG और रोजमर्रा की कई जरूरी चीजें भी महंगी हो सकती हैं।
भारत जैसे देश के लिए यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर उतार-चढ़ाव सीधे घरेलू महंगाई और आम लोगों के बजट को प्रभावित करता है।
मई में तीसरी बार बढ़े ईंधन के दाम
सरकारी तेल कंपनियों ने इस महीने लगातार तीसरी बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा किया है। इससे पहले भी इस हफ्ते की शुरुआत में पेट्रोल और डीजल करीब 90 पैसे प्रति लीटर महंगे हुए थे, जबकि कुछ दिन पहले ही 3 रुपये प्रति लीटर तक की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
दिल्ली-NCR समेत कई शहरों में CNG की कीमतें भी बढ़ाई गई हैं। इंड्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (IGL) ने CNG की कीमतों में 1 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि की है। इसका सीधा असर ऑटो, टैक्सी, कैब सर्विस और छोटे व्यवसायों पर पड़ने वाला है।
चार साल बाद इस तरह लगातार कीमतों में वृद्धि ने लोगों को 2022 के बाद पहली बार बड़े ईंधन संकट की याद दिला दी है। अप्रैल 2022 के बाद तेल कंपनियों ने लंबे समय तक दैनिक मूल्य संशोधन रोक दिया था ताकि वैश्विक संकट का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर न पड़े। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
आखिर क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
इस पूरी समस्या की जड़ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की तेजी है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने तेल बाजार को झकझोर दिया है।
ब्रेंट क्रूड की कीमत 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड करीब 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है। कुछ महीने पहले तक यही कीमत 70-72 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में थी। यानी बेहद कम समय में तेल करीब 50% तक महंगा हो चुका है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई रूट्स में से एक है। दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से तेल सप्लाई करता है। अगर यहां तनाव बढ़ता है या सप्लाई बाधित होती है तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में विस्फोटक तेजी देखने को मिल सकती है।
तेल कंपनियों को कितना नुकसान हो रहा है?
सरकारी तेल कंपनियों का कहना है कि लंबे समय तक कीमतें स्थिर रखने के कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। बीपीसीएल (BPCL) के मुताबिक कंपनी फिलहाल डीजल पर प्रति लीटर 25-30 रुपये और पेट्रोल पर 10-14 रुपये तक का घाटा सहकर बिक्री कर रही है।
वहीं ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार निजी कंपनी शेल इंडिया कुछ इलाकों में पेट्रोल 115 रुपये प्रति लीटर और डीजल 126 रुपये प्रति लीटर से अधिक कीमत पर बेच रही है।
इससे साफ है कि वैश्विक तेल संकट का दबाव अब भारतीय तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
मिडिल क्लास पर कैसे बढ़ेगा बोझ?
ईंधन की कीमतें सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं रहतीं। भारत की पूरी सप्लाई चेन बड़े स्तर पर डीजल और परिवहन पर निर्भर है। जैसे ही ईंधन महंगा होता है, उसका असर धीरे-धीरे हर सेक्टर पर दिखाई देने लगता है।
1. दूध-सब्जी और राशन महंगा हो सकता है
ट्रकों और मालवाहक वाहनों का परिचालन खर्च बढ़ने से फल, सब्जी, दूध और किराना सामान की ढुलाई महंगी हो जाती है। इसका असर सीधे खुदरा कीमतों पर दिखाई देता है।
2. ऑटो और टैक्सी किराया बढ़ सकता है
दिल्ली-NCR समेत कई शहरों में CNG से चलने वाले ऑटो और टैक्सी की संख्या बहुत ज्यादा है। CNG महंगी होने के बाद किराया बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
3. ऑनलाइन डिलीवरी महंगी हो सकती है
ई-कॉमर्स कंपनियां, फूड डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेक्टर भी ईंधन लागत बढ़ने से प्रभावित होते हैं। आने वाले समय में डिलीवरी चार्ज बढ़ सकते हैं।
4. एयर टिकट और पर्यटन पर असर
एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) महंगा होने से एयरलाइंस कंपनियों की लागत बढ़ती है। इससे हवाई टिकट महंगे हो सकते हैं और पर्यटन उद्योग प्रभावित हो सकता है।
5. उद्योगों की लागत बढ़ेगी
इस्पात, सीमेंट, FMCG और कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ईंधन का इस्तेमाल होता है। ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ने का असर पूरे बाजार पर दिखाई देगा।
रूस और वेनेजुएला क्यों बने भारत के लिए अहम?
भारत पिछले दो वर्षों से रियायती रूसी तेल खरीदकर अपनी आयात लागत को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन अब वैश्विक स्तर पर कीमतें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि रूस से मिलने वाला डिस्काउंट भी पर्याप्त साबित नहीं हो रहा।
इसी बीच भारत ने वेनेजुएला से भी तेल खरीद बढ़ा दी है। एनर्जी ट्रैकर Kpler के आंकड़ों के मुताबिक मई महीने में वेनेजुएला भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया।
वेनेजुएला से भारत को मई में करीब 4.17 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल की सप्लाई हुई, जो अप्रैल के मुकाबले काफी ज्यादा है। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर लगी कुछ पाबंदियों में ढील दिए जाने के बाद भारतीय कंपनियों ने वहां से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया है।
भारत के पास कितना तेल स्टॉक है?
सरकारी अनुमानों के मुताबिक भारत के पास रणनीतिक भंडार सहित करीब 60 दिनों का पेट्रोलियम स्टॉक मौजूद है। हालांकि अगर पश्चिम एशिया में संकट और गहरा होता है तो यह स्थिति लंबे समय तक राहत नहीं दे पाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में भारत को रूस, यूएई और वेनेजुएला जैसे देशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
क्या 200 डॉलर तक पहुंच सकता है कच्चा तेल?
एनर्जी कंसल्टेंसी फर्म वुड मैकेन्जी (Wood Mackenzie) ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बाधित रहता है, तो वैश्विक कच्चा तेल 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।
अगर ऐसा होता है तो पूरी दुनिया में महंगाई का नया संकट खड़ा हो सकता है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर साबित हो सकती है।
RBI और सरकार के सामने बड़ी चुनौती
ईंधन महंगाई का असर सिर्फ उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहता। इससे खुदरा महंगाई (CPI Inflation), व्यापार घाटा, रुपया और ब्याज दरों पर भी दबाव बढ़ता है।
अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो:
- रुपये पर दबाव बढ़ सकता है
- आयात बिल बढ़ सकता है
- महंगाई नियंत्रण मुश्किल हो सकता है
- RBI ब्याज दरों में कटौती टाल सकता है
- सरकार पर टैक्स कम करने का दबाव बढ़ सकता है
यानी यह सिर्फ पेट्रोल-डीजल का मुद्दा नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था से जुड़ा संकट बन सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
जानकारों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो जून महीने में भी ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। खासकर LPG और PNG की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि लगातार बढ़ती ईंधन कीमतें आम आदमी की मासिक बचत और खर्च के संतुलन को बिगाड़ रही हैं। मिडिल क्लास परिवारों के लिए स्कूल फीस, किराया, EMI और रोजमर्रा के खर्च पहले ही भारी पड़ रहे थे, ऐसे में ईंधन महंगाई ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है।
ऐसे में आने वाले कुछ हफ्ते सिर्फ तेल बाजार ही नहीं बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों के घरेलू बजट के लिए भी बेहद अहम रहने वाले हैं।
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