पेट्रोल-डीजल और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब सिर्फ वाहनों के खर्च तक सीमित नहीं रहने वाला है। आने वाले महीनों में आटा, दाल, बिस्किट, साबुन, शैंपू, पैक्ड फूड और रोजमर्रा के घरेलू सामान भी महंगे हो सकते हैं। FMCG कंपनियां बढ़ती लागत की भरपाई के लिए कीमतें बढ़ाने, पैकेट का वजन कम करने और सप्लाई खर्च में कटौती जैसे विकल्पों पर विचार कर रही हैं।
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की रसोई तक पहुंचने लगा है। पिछले कुछ हफ्तों में ईंधन कीमतों में हुए बदलाव ने FMCG कंपनियों की लागत बढ़ा दी है। कंपनियों का कहना है कि माल ढुलाई, पैकेजिंग, उत्पादन और सप्लाई चेन की लागत लगातार बढ़ रही है, जिससे मुनाफे पर दबाव बढ़ गया है।
इसी वजह से अब कई बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने या “श्रिंकफ्लेशन” यानी पैकेट का वजन कम करने की तैयारी कर रही हैं। इसका सीधा असर आम लोगों के मासिक बजट पर पड़ सकता है।
क्यों बढ़ रही है FMCG कंपनियों की लागत?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो उसका असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता।
FMCG कंपनियों के लिए ईंधन बेहद महत्वपूर्ण लागत घटक होता है क्योंकि:
- फैक्ट्री से गोदाम तक माल ढुलाई डीजल पर निर्भर होती है
- पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक पेट्रोकेमिकल आधारित होता है
- सप्लाई चेन का पूरा नेटवर्क ट्रांसपोर्ट लागत पर चलता है
- ग्रामीण और छोटे शहरों तक डिलीवरी खर्च बढ़ जाता है
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो कंपनियों के पास कीमतें बढ़ाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचेंगे।
कौन-कौन सी चीजें हो सकती हैं महंगी?
सबसे ज्यादा असर रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं पर पड़ सकता है। इनमें शामिल हैं:
- आटा और पैक्ड अनाज
- दाल और खाद्य तेल
- बिस्किट, नमकीन और स्नैक्स
- साबुन, शैंपू और डिटर्जेंट
- टूथपेस्ट और पर्सनल केयर प्रोडक्ट
- दूध आधारित पैक्ड फूड
- इंस्टेंट फूड और रेडी-टू-कुक उत्पाद
कई कंपनियां पहले ही चुनिंदा उत्पादों में 2% से 5% तक कीमतें बढ़ा चुकी हैं। अब आगे और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।
HUL, डाबर और मैरिको जैसी कंपनियों पर बढ़ा दबाव
देश की बड़ी FMCG कंपनियों ने हालिया अर्निंग कॉल में बढ़ती लागत को लेकर चिंता जाहिर की है। Hindustan Unilever, Dabur India और Marico जैसी कंपनियां पहले ही कीमतों में सीमित बढ़ोतरी कर चुकी हैं। डाबर इंडिया के ग्लोबल CEO Mohit Malhotra ने कहा कि कंपनी विभिन्न उत्पाद श्रेणियों में करीब 4% तक कीमत बढ़ा चुकी है और आने वाले समय में एक और दौर की मूल्य वृद्धि पर विचार किया जा सकता है।
उनके मुताबिक, इस वित्त वर्ष में लगभग 10% महंगाई का दबाव कंपनियों के मार्जिन को प्रभावित कर रहा है। कंपनी लागत नियंत्रण और सप्लाई ऑप्टिमाइजेशन जैसे कदम भी उठा रही है।
कंपनियां “श्रिंकफ्लेशन” का रास्ता भी अपना सकती हैं
कीमत सीधे बढ़ाने से ग्राहकों पर तुरंत असर पड़ता है, इसलिए कई कंपनियां “श्रिंकफ्लेशन” का रास्ता चुन सकती हैं।
इसका मतलब है पैकेट की कीमत वही रहेगी लेकिन उसमें मौजूद सामान की मात्रा कम कर दी जाएगी उदाहरण के लिए:
- 1 किलो पैक 900 ग्राम हो सकता है
- 100 ग्राम स्नैक पैक 85-90 ग्राम में बदल सकता है
भारत में FMCG सेक्टर पहले भी इस रणनीति का इस्तेमाल कर चुका है, खासकर तब जब कच्चे माल और ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं।
ग्रामीण बाजारों पर सबसे ज्यादा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण बाजार इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। Grant Thornton Bharat के पार्टनर नवीन मल्पानी के मुताबिक अगर ईंधन कीमतें कई तिमाहियों तक ऊंची रहती हैं, तो कंपनियों को नियंत्रित तरीके से कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
इससे ग्रामीण उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है क्योंकि वहां कीमतों को लेकर संवेदनशीलता ज्यादा होती है। ग्रामीण मांग पिछले कुछ महीनों में धीरे-धीरे सुधर रही थी, लेकिन नई महंगाई इस रिकवरी को धीमा कर सकती है।
आम आदमी के महीने का बजट कितना बढ़ सकता है?
अगर FMCG कंपनियां 3% से 7% तक कीमतें बढ़ाती हैं, तो एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार का मासिक खर्च कई सौ रुपये तक बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक किराना बिल बढ़ेगा, पैक्ड फूड महंगा होगा, बाहर खाना और ऑनलाइन फूड डिलीवरी भी महंगी हो सकती है, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने से सब्जियों और दूध पर भी असर पड़ेगा यानी महंगाई का असर धीरे-धीरे हर घरेलू जरूरत पर दिखाई दे सकता है।
क्या सरकार के पास राहत देने का विकल्प है?
सरकार फिलहाल वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए है। यदि कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आती है, तो टैक्स कटौती, तेल कंपनियों को राहत, सप्लाई मैनेजमेंट, आयात रणनीति में बदलाव जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो घरेलू बाजार में महंगाई दबाव पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा।
कंपनियां फिलहाल क्या रणनीति अपना रही हैं?
अधिकांश FMCG कंपनियां अभी सीधे बड़ी मूल्य वृद्धि से बचना चाहती हैं। कंपनियों की रणनीति फिलहाल तीन हिस्सों में बंटी हुई है:
- सीमित मूल्य वृद्धि
- पैकेट साइज कम करना
- लागत में कटौती और सप्लाई ऑप्टिमाइजेशन
Nestlé India के CMD Manish Tiwary ने कहा कि कंपनी हालात पर लगातार नजर रख रही है और कीमत बढ़ाना हमेशा अंतिम विकल्प होता है।
आने वाले महीनों में क्या हो सकता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, डीजल कीमतों में और बढ़ोतरी होती है, सप्लाई चेन लागत बढ़ती रहती है तो FMCG सेक्टर में व्यापक स्तर पर कीमतों में वृद्धि देखने को मिल सकती है। इसका असर सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक भी पहुंचेगा। आने वाले महीनों में किराना और घरेलू जरूरतों का बजट पहले के मुकाबले ज्यादा भारी पड़ सकता है।
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