बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत के डिफेंस सेक्टर में निजी कंपनियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने रणनीतिक हथियार प्रणालियों के विकास और उत्पादन में निजी क्षेत्र को शामिल करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। DRDO ने पहली बार अपनी मिसाइल और रणनीतिक प्रणालियों से जुड़ी यूनिट द्वारा विकसित हथियार प्रणालियों के उत्पादन के लिए निजी कंपनियों से Expression of Interest (EOI) मांगा है।
इस कदम के बाद Tata Advanced Systems Limited जैसी बड़ी निजी कंपनियों के लिए रणनीतिक रक्षा परियोजनाओं में प्रवेश का रास्ता और मजबूत हो सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत योग्य भारतीय कंपनियों को भविष्य की DRDO परियोजनाओं में विकास और उत्पादन भागीदार बनने का अवसर मिल सकता है।
डिफेंस सेक्टर के लिए क्यों है यह बड़ा कदम?
अब तक रणनीतिक हथियार प्रणालियों के उत्पादन में सरकारी रक्षा कंपनियों की प्रमुख भूमिका रही है। DRDO की नई पहल इस व्यवस्था में निजी उद्योग की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव मानी जा रही है।
DRDO की मिसाइल एवं रणनीतिक प्रणालियों से जुड़ी इकाई द्वारा विकसित प्रणालियों में अग्नि सीरीज जैसी रणनीतिक मिसाइलें शामिल हैं। संगठन को रणनीतिक और परमाणु क्षमता से जुड़े भविष्य के सिस्टम विकसित करने की जिम्मेदारी भी मिली हुई है, जिसमें पनडुब्बी से लॉन्च होने वाली प्रणालियां भी शामिल हैं।
पहली बार निजी कंपनियों से मांगा गया EOI
DRDO की ओर से जारी EOI का उद्देश्य ऐसी भारतीय कंपनियों की पहचान करना है, जिनके पास रणनीतिक रक्षा प्रणालियों के विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए आवश्यक तकनीकी, वित्तीय और औद्योगिक क्षमता हो।
कंपनियों को उनकी योग्यता के आधार पर शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। इसके बाद अलग-अलग परियोजनाओं के लिए योग्य कंपनियों को विशिष्ट टेंडर जारी किए जा सकते हैं।
इसका मतलब यह है कि निजी कंपनियों को केवल सामान्य रक्षा उपकरणों के निर्माण तक सीमित रहने के बजाय भविष्य में अधिक जटिल रणनीतिक प्रणालियों की सप्लाई चेन में भी भूमिका मिल सकती है।
अभी कौन सी कंपनी बनाती है रणनीतिक हथियार?
भारत में रणनीतिक हथियार प्रणालियों के उत्पादन में सरकारी कंपनियों की अहम भूमिका रही है। Bharat Dynamics Limited जैसी कंपनियां मिसाइलों और संबंधित रक्षा प्रणालियों के निर्माण में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं।
अब DRDO निजी क्षेत्र की तकनीकी और उत्पादन क्षमता का भी इस्तेमाल करना चाहता है। इससे देश में रक्षा उत्पादन का आधार व्यापक होने के साथ-साथ बड़े ऑर्डर को तेजी से पूरा करने की क्षमता बढ़ सकती है।
टाटा जैसी कंपनियों के लिए खुल सकता है बड़ा बाजार
निजी क्षेत्र में पहले से रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों को इस पहल से फायदा मिल सकता है। Tata Advanced Systems Limited और Solar Aerospace & Defence जैसी कंपनियों के पास रक्षा उत्पादन से जुड़ा अनुभव और औद्योगिक क्षमता है।
हालांकि किसी कंपनी को केवल बड़ा नाम होने के आधार पर जिम्मेदारी नहीं मिलेगी। उसे DRDO की निर्धारित तकनीकी, वित्तीय और औद्योगिक योग्यता पूरी करनी होगी।
Development-cum-Production Partner मॉडल क्या है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित व्यवस्था में Development-cum-Production Partner (DcPP) मॉडल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके तहत किसी परियोजना के लिए कम से कम दो कंपनियों का चयन किया जा सकता है।
चयनित कंपनियां DRDO के साथ मिलकर परियोजना के लिए आवश्यक प्रोटोटाइप तैयार करेंगी। इसके बाद इन प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा। यदि रणनीतिक बलों की जरूरत के मुताबिक सिस्टम सफल रहता है और बड़े पैमाने पर ऑर्डर दिए जाते हैं, तो चयनित कंपनियां उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इस मॉडल से एक ही कंपनी पर पूरी तरह निर्भरता कम करने और प्रतिस्पर्धी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
कंपनियों को पूरी करनी होंगी कड़ी शर्तें
रणनीतिक हथियार प्रणालियों के निर्माण में शामिल होने के लिए कंपनियों को कई शर्तों को पूरा करना होगा। इनमें प्रमुख रूप से कंपनी की वित्तीय स्थिति, तकनीकी क्षमता और परियोजना प्रबंधन का अनुभव शामिल है।
रिपोर्ट्स के अनुसार कंपनी की नेटवर्थ अनुमानित परियोजना लागत के कम से कम 5 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए। इसके अलावा कंपनी के पास बड़े प्रोजेक्ट संभालने का प्रमाणित अनुभव और आवश्यक स्तर के उत्पादन ऑर्डर पूरे करने का ट्रैक रिकॉर्ड भी होना चाहिए।
बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता भी जरूरी
रणनीतिक रक्षा प्रणालियों के लिए केवल प्रोटोटाइप बनाना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों की बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता का भी आकलन किया जाएगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों के इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी क्षमता को यह देखते हुए परखा जाएगा कि वे 50 या 100 से अधिक यूनिट्स के बड़े उत्पादन ऑर्डर को संभाल सकती हैं या नहीं।
इसके लिए कंपनी के पास पर्याप्त मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी विशेषज्ञता और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था होना जरूरी होगा।
DRDO की टीम करेगी कंपनियों के प्लांट का निरीक्षण
शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया में केवल दस्तावेजों की जांच नहीं होगी। DRDO द्वारा गठित विशेषज्ञों की एक समिति कंपनियों की वास्तविक क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए उनके परिसर का दौरा भी कर सकती है।
इस दौरान कंपनी के उत्पादन संयंत्र, तकनीकी सुविधाओं, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट क्षमता, मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े ऑर्डर को पूरा करने की क्षमता का आकलन किया जाएगा।
लाइसेंस और सुरक्षा से जुड़ी शर्तें भी अहम
इस प्रक्रिया में शामिल होने वाली कंपनियों के पास आवश्यक कानूनी और औद्योगिक मंजूरियां होना जरूरी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों के पास डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का इंडस्ट्रियल लाइसेंस और विस्फोटक पदार्थों को संभालने तथा स्टोर करने के लिए आवश्यक PESO लाइसेंस होना चाहिए।
इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रणनीतिक हथियार प्रणालियों के निर्माण में केवल वे कंपनियां शामिल हों, जिनके पास जरूरी सुरक्षा व्यवस्था और नियामकीय अनुपालन की क्षमता है।
भारत के डिफेंस सेक्टर के लिए क्या बदलेगा?
DRDO की यह पहल भारत के रक्षा उत्पादन को निजी क्षेत्र के लिए और खोलने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। इससे देश में रणनीतिक हथियारों के उत्पादन के लिए ज्यादा औद्योगिक क्षमता विकसित हो सकती है।
निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, सप्लाई चेन, तकनीकी निवेश और उत्पादन की गति को बढ़ावा मिलने की संभावना है। साथ ही सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने के लक्ष्य को भी मजबूती मिल सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पहल निजी कंपनियों को सामान्य रक्षा उपकरणों से आगे बढ़कर रणनीतिक प्रणालियों के उत्पादन में भूमिका निभाने का अवसर दे सकती है। हालांकि अंतिम जिम्मेदारी किन कंपनियों को मिलेगी, यह उनकी योग्यता और संबंधित परियोजनाओं के लिए जारी होने वाली आगे की निविदा प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।


