Corporate India Boardroom: भारतीय कॉरपोरेट जगत के बोर्डरूम में धीरे-धीरे पीढ़ीगत बदलाव देखने को मिल रहा है। कंपनियों के निदेशक मंडल में अब युवा चेहरों की मौजूदगी पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई है। खास तौर पर 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की संख्या में पिछले करीब एक दशक के दौरान बड़ा इजाफा हुआ है। हालांकि, देश की बड़ी और पुरानी लिस्टेड कंपनियों के बोर्ड में अभी भी अनुभवी और वरिष्ठ सदस्यों का दबदबा कायम है।
Primeinfobase.com के आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE में लिस्टेड कंपनियों के डायरेक्टरों की औसत उम्र 4 अगस्त 2026 तक घटकर 56.54 साल रह गई है। करीब एक दशक पहले 31 मार्च 2017 तक NSE की लिस्टेड कंपनियों के डायरेक्टरों की औसत उम्र 58.92 साल थी। यानी इस अवधि में औसत उम्र में करीब 2.38 साल की कमी आई है।
यह बदलाव केवल औसत उम्र तक सीमित नहीं है। बोर्ड में 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की हिस्सेदारी और संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियों के बोर्ड अब नई पीढ़ी के नेतृत्व, तकनीकी समझ और डिजिटल बिजनेस की जरूरतों को भी पहले से ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की सीटें तीन गुना बढ़ीं
NSE में लिस्टेड कुल 3,003 कंपनियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 4 अगस्त 2026 तक 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों के पास 2,261 सीटें थीं। वहीं 31 मार्च 2017 को 1,577 कंपनियों में इस उम्र वर्ग के डायरेक्टरों की सीटों की संख्या केवल 750 थी।
इस तरह करीब एक दशक में 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की सीटों की संख्या में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि कंपनियों के निदेशक मंडल में युवा नेतृत्व के लिए जगह लगातार बढ़ रही है।
बोर्ड में युवा सदस्यों की बढ़ती संख्या का एक कारण कारोबार का बदलता स्वरूप भी माना जा सकता है। आज कंपनियों के सामने डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया और नई तकनीकों से जुड़े कई अवसर और चुनौतियां हैं। ऐसे में कम उम्र के प्रोफेशनल्स की आधुनिक तकनीक और नए बिजनेस मॉडल को लेकर समझ कंपनियों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों में भी युवाओं की बढ़ी हिस्सेदारी
बदलाव सबसे ज्यादा इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों के मामले में दिखाई देता है। NSE की कंपनियों में 40 साल से कम उम्र के इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों की संख्या 31 मार्च 2017 में सिर्फ 230 थी। 4 अगस्त 2026 तक यह संख्या बढ़कर 1,040 हो गई।
यानी इस अवधि में 40 साल से कम उम्र के इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों की संख्या चार गुना से भी ज्यादा बढ़ी है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इंडिपेंडेंट डायरेक्टर कंपनियों के बोर्ड में स्वतंत्र राय, निगरानी और कॉरपोरेट गवर्नेंस की भूमिका निभाते हैं।
युवा इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों के आने से बोर्डरूम में नए विचारों और बदलते कारोबारी माहौल की समझ को जगह मिल सकती है। हालांकि, उनके लिए इंडस्ट्री अनुभव और कॉरपोरेट गवर्नेंस की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहती है।
40 साल से कम उम्र वालों की हिस्सेदारी 10% के पार
NSE की लिस्टेड कंपनियों के बोर्ड में 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की कुल हिस्सेदारी अब 10% से ज्यादा हो गई है। करीब एक दशक पहले यह हिस्सेदारी लगभग 6% थी।
इसी तरह 45 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। 2017 में यह करीब 11% थी, जो अब बढ़कर लगभग 17% हो गई है।
इसका अर्थ है कि बोर्डरूम में केवल बेहद वरिष्ठ सदस्यों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है और अलग-अलग उम्र वर्गों के लोगों को शामिल करने का चलन बढ़ रहा है।
हालांकि, युवा डायरेक्टरों की हिस्सेदारी बढ़ने के बावजूद बोर्डरूम में वरिष्ठ लोगों की भूमिका अभी भी काफी मजबूत है। खासकर बड़ी कंपनियों में अनुभव को प्राथमिकता देने का चलन बना हुआ है।
Nifty 100 कंपनियों में स्थिति क्यों अलग है?
अगर देश की बड़ी कंपनियों की बात करें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई देती है। Nifty 100 कंपनियों के बोर्ड सदस्यों की औसत उम्र 4 अगस्त 2026 तक 61.28 साल रही। वहीं Nifty 500 कंपनियों में बोर्ड सदस्यों की औसत उम्र 60.5 साल थी।
इससे साफ है कि बड़ी और स्थापित कंपनियां अभी भी बोर्ड के लिए ज्यादा अनुभवी लोगों को प्राथमिकता देती हैं। इन कंपनियों के कारोबार का आकार बड़ा होने के साथ-साथ उनके सामने रेगुलेटरी, ग्लोबल ऑपरेशन, निवेशक संबंध और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़ी जटिलताएं भी अधिक होती हैं।
इसलिए इन कंपनियों में लंबे अनुभव वाले बोर्ड सदस्यों की मांग बनी हुई है। दूसरी ओर, नई और तेजी से बढ़ने वाली कंपनियों को डिजिटल बिजनेस, टेक्नोलॉजी और नए उपभोक्ता व्यवहार की समझ रखने वाले युवा प्रोफेशनल्स की जरूरत अधिक महसूस हो सकती है।
Nifty 100 में 40 साल से कम उम्र के सिर्फ 19 डायरेक्टर
Nifty 100 कंपनियों में युवा डायरेक्टरों की मौजूदगी अभी भी काफी सीमित है। इन कंपनियों में 4 अगस्त 2026 तक 40 साल से कम उम्र के सिर्फ 19 डायरेक्टर थे। यह कुल 959 बोर्ड सीटों का लगभग 2% है।
करीब एक दशक पहले 31 मार्च 2017 तक Nifty 100 कंपनियों में 1,082 बोर्ड सीटों में से केवल 12 सीटों पर 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टर थे। तब उनकी हिस्सेदारी करीब 1.1% थी।
यानी यहां भी युवा सदस्यों की संख्या बढ़ी है, लेकिन कुल बोर्ड सीटों के मुकाबले उनकी हिस्सेदारी अभी काफी कम है।
यह अंतर बताता है कि भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में बोर्ड की उम्र को लेकर एक समान ट्रेंड नहीं है। छोटी, नई और तेजी से बदलते क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियां युवा विशेषज्ञों को ज्यादा अवसर दे सकती हैं, जबकि बड़ी और स्थापित कंपनियां अनुभव को अधिक महत्व देती हैं।
AI और टेक्नोलॉजी ने बदली बोर्डरूम की जरूरत
कॉरपोरेट बोर्डरूम में युवा चेहरों की बढ़ती संख्या के पीछे बदलती कारोबारी जरूरतों को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। आज कंपनियों के लिए केवल पारंपरिक वित्तीय और कारोबारी अनुभव पर्याप्त नहीं रह गया है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मार्केटिंग, डेटा, साइबर सिक्योरिटी, ई-कॉमर्स और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र तेजी से कंपनियों के कारोबार का हिस्सा बन रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले युवा प्रोफेशनल्स बोर्ड को नई तकनीकों और बदलते उपभोक्ता व्यवहार की बेहतर समझ दे सकते हैं।
यही वजह है कि कंपनियां ऐसे बोर्ड सदस्यों की तलाश कर रही हैं जो पारंपरिक कॉरपोरेट अनुभव के साथ-साथ आधुनिक तकनीक और डिजिटल बिजनेस को भी समझते हों।
बड़ी कंपनियों में अनुभव और नई कंपनियों में नई सोच का संतुलन
कॉरपोरेट बोर्ड में उम्र का यह बदलाव यह नहीं बताता कि कंपनियां अब अनुभव को महत्व नहीं दे रही हैं। बल्कि तस्वीर इससे ज्यादा संतुलित है।
बड़ी कंपनियों के लिए वर्षों का इंडस्ट्री अनुभव, रेगुलेटरी समझ, जोखिम प्रबंधन और कॉरपोरेट गवर्नेंस महत्वपूर्ण है। वहीं नई पीढ़ी के डायरेक्टर टेक्नोलॉजी, डिजिटल प्लेटफॉर्म और बदलते बाजार की जरूरतों को समझने में योगदान दे सकते हैं।
ग्लोबल कंसल्टेंसी फील्डहॉव की चेयरपर्सन और इंडिया हेड मोनिका अग्रवाल के मुताबिक, Nifty 100 और Nifty 500 जैसी कंपनियां अपेक्षाकृत पुरानी और स्थापित कंपनियां हैं, इसलिए उनके बोर्ड में अनुभवी सदस्यों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक है। वहीं नए जमाने की कंपनियों में AI, टेक्नोलॉजी, मार्केटिंग और डिजिटल जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले युवा बोर्ड सदस्यों की जरूरत बढ़ रही है।
प्राइम डेटाबेस ग्रुप के एमडी प्रणव हल्दिया के अनुसार, बोर्ड की उम्र में यह अंतर काफी हद तक कंपनियों की संरचना और उनके कारोबार की प्रकृति से जुड़ा हुआ है।
आने वाले समय में और बढ़ सकती है युवाओं की भूमिका
भारतीय अर्थव्यवस्था में टेक्नोलॉजी और डिजिटल बिजनेस की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आने वाले वर्षों में बोर्डरूम में अलग-अलग उम्र और विशेषज्ञता वाले लोगों का मिश्रण और मजबूत हो सकता है।
युवा डायरेक्टर कंपनियों को नई तकनीकों, डिजिटल उपभोक्ताओं और बदलते कारोबारी मॉडल को समझने में मदद कर सकते हैं। वहीं वरिष्ठ डायरेक्टर अपने लंबे अनुभव के आधार पर रणनीतिक फैसलों, जोखिम प्रबंधन और कॉरपोरेट गवर्नेंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसलिए भारतीय कॉरपोरेट बोर्डरूम में हो रहा बदलाव केवल ‘बोर्ड जवान हो रहा है’ तक सीमित नहीं है। यह कंपनियों की बदलती जरूरतों और नई अर्थव्यवस्था के अनुरूप नेतृत्व के स्वरूप में आ रहे बदलाव का संकेत भी है।
कुल मिलाकर, NSE की लिस्टेड कंपनियों में डायरेक्टरों की औसत उम्र का कम होना और 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की संख्या में तेज वृद्धि बताती है कि कॉरपोरेट इंडिया धीरे-धीरे नई पीढ़ी को बोर्डरूम में ज्यादा जगह दे रहा है। हालांकि, Nifty 100 और Nifty 500 जैसी बड़ी कंपनियों में अनुभव की अहमियत अभी भी बरकरार है। आने वाले वर्षों में सबसे सफल बोर्ड वही हो सकते हैं जहां युवा सोच और अनुभवी नेतृत्व के बीच सही संतुलन बनाया जा सके।


