दुनिया के बाजारों में चीन के सस्ते सामान की मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है। चीन लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश है और उसका व्यापार अधिशेष अब ऐसे स्तर पर पहुंच गया है, जिसने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। चीन का विशाल एक्सपोर्ट बेस दूसरे देशों के घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, रोजगार और व्यापार संतुलन के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
भारत के लिए भी यह चिंता कम नहीं है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पिछले वित्त वर्ष में करीब 112 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। खास बात यह है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक तनाव के बावजूद व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत बने हुए हैं।
अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने भी चीन के विशाल निर्यात और कमजोर घरेलू मांग के बीच असंतुलन को लेकर चिंता जताई है। IMF की प्रमुख क्रिस्टलीना जियॉर्जिएवा ने चीन से घरेलू मांग बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने की अपील की है। उनका संकेत साफ है कि अगर वैश्विक बाजार में चीनी सामान का प्रवाह इसी तरह बढ़ता रहा, तो दूसरे देश ट्रेड बैरियर्स और ऊंचे टैरिफ का सहारा लेने को मजबूर हो सकते हैं।
चीन के बढ़ते निर्यात से क्यों बढ़ी चिंता?
चीन की अर्थव्यवस्था लंबे समय से मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट पर निर्भर रही है। कम लागत, विशाल औद्योगिक क्षमता, मजबूत सप्लाई चेन और सरकारी समर्थन ने चीनी कंपनियों को वैश्विक बाजार में बेहद प्रतिस्पर्धी बनाया है।
चीन का निर्यात करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है। इस आंकड़े की विशालता को समझने के लिए इसे भारत की अर्थव्यवस्था के आकार से जोड़कर देखा जा सकता है। चीन की निर्यात क्षमता इतनी बड़ी है कि वह अकेले ही दुनिया के कई बड़े बाजारों में भारी मात्रा में सामान पहुंचा सकता है।
समस्या तब पैदा होती है जब किसी देश का निर्यात लगातार तेजी से बढ़ता है, लेकिन उसकी घरेलू मांग उसी अनुपात में नहीं बढ़ती। ऐसी स्थिति में अतिरिक्त उत्पादन विदेशी बाजारों की तरफ जाने लगता है। यही वजह है कि चीन के बढ़ते निर्यात को लेकर अमेरिका, यूरोप और दूसरे औद्योगिक देशों में चिंता बढ़ रही है।
भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर
भारत और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं। गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। इसके बावजूद व्यापार में गिरावट नहीं आई।
पिछले वित्त वर्ष में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यानी भारत चीन से जितना सामान खरीदता है, उसके मुकाबले वहां कम सामान निर्यात करता है।
यह भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशें चल रही हैं और कुछ सीमावर्ती व्यापार मार्गों पर भी गतिविधियां दोबारा शुरू हुई हैं। लेकिन व्यापार असंतुलन अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भारत की समस्या सिर्फ तैयार माल के आयात तक सीमित नहीं है। देश के कई महत्वपूर्ण उद्योगों की सप्लाई चेन भी चीन पर निर्भर है।
दवा उद्योग में चीन पर निर्भरता बड़ी चुनौती
भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा निर्यातकों में शामिल है। भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनियां दुनियाभर के बाजारों में सस्ती और जरूरी दवाओं की आपूर्ति करती हैं।
लेकिन इन दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई Active Pharmaceutical Ingredients यानी API के लिए भारत चीन से बड़े पैमाने पर आयात करता है।
यही कारण है कि चीन के साथ तनाव बढ़ने या सप्लाई चेन में किसी तरह की बाधा आने पर भारतीय दवा उद्योग प्रभावित हो सकता है। इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा, क्योंकि भारतीय दवाओं की सप्लाई दुनिया के कई देशों में होती है।
भारत लंबे समय से API और अन्य जरूरी कच्चे माल के मामले में चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद यह निर्भरता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
‘चाइना शॉक 2.0’ का डर क्यों?
चीन के बढ़ते निर्यात को समझने के लिए विशेषज्ञ अक्सर China Shock की बात करते हैं। इसका पहला बड़ा दौर 2001 के बाद देखने को मिला, जब चीन विश्व व्यापार संगठन यानी WTO में शामिल हुआ।
इसके बाद चीन ने अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बड़े पैमाने पर सस्ते सामान का निर्यात किया। चीन के पास विशाल श्रमबल और कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग क्षमता थी। इसका फायदा उसे वैश्विक बाजार में मिला।
दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप की कई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां चीनी कंपनियों से कीमत के मामले में मुकाबला नहीं कर पाईं। कई उत्पादन इकाइयां बंद हुईं या उनका उत्पादन दूसरे देशों में शिफ्ट हुआ।
अमेरिका में 2001 से 2007 के बीच चीन से आयात करीब तीन गुना बढ़ा और इससे जुड़े प्रभावों को लेकर लाखों नौकरियों के खत्म होने की बात सामने आई।
अब दुनिया को China Shock 2.0 का डर सता रहा है।
इस बार खतरा सिर्फ कपड़े और खिलौनों तक सीमित नहीं
पहले चीन का दबदबा मुख्य रूप से कपड़े, खिलौने, फर्नीचर और दूसरी कम कीमत वाली उपभोक्ता वस्तुओं में था। अब स्थिति बदल चुकी है।
इस बार चीन जिन क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है, उनमें शामिल हैं:
- इलेक्ट्रिक वाहन
- सोलर पैनल
- लिथियम-आयन बैटरी
- इलेक्ट्रॉनिक्स
- ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी
- एडवांस मैन्युफैक्चरिंग
- इलेक्ट्रिक और ऑटो कंपोनेंट्स
इन क्षेत्रों में भारी निवेश और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण चीनी कंपनियां वैश्विक बाजार में बेहद कम कीमत पर उत्पाद उपलब्ध कराने में सक्षम हैं।
यही वजह है कि अमेरिका और यूरोप समेत कई देशों ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों, सोलर उत्पादों और अन्य रणनीतिक वस्तुओं पर टैरिफ और व्यापार प्रतिबंध बढ़ाने शुरू किए हैं।
चीन को भारी सरकारी सब्सिडी का फायदा?
चीन की औद्योगिक नीति भी पश्चिमी देशों की चिंता का एक बड़ा कारण है। OECD समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं चीन की कंपनियों को मिलने वाले सरकारी समर्थन और सब्सिडी पर सवाल उठा चुकी हैं।
सरकारी सहायता से चीनी कंपनियों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नई तकनीक विकसित करने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत कम रखने में मदद मिलती है।
इसका दूसरा पहलू यह है कि जब घरेलू मांग कमजोर होती है और उत्पादन क्षमता बहुत अधिक होती है, तो कंपनियां अतिरिक्त सामान विदेशी बाजारों में बेचने की कोशिश करती हैं। इससे दूसरे देशों के घरेलू उद्योगों पर कीमतों का दबाव बढ़ता है।
IMF ने क्यों दी ट्रेड बैरियर्स की चेतावनी?
IMF की प्रमुख क्रिस्टलीना जियॉर्जिएवा ने चीन से अपनी घरेलू मांग बढ़ाने की अपील की है। उनका मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था को केवल निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू खपत को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
अगर चीन का निर्यात लगातार बढ़ता रहा और दुनिया के बाकी देशों के साथ व्यापार असंतुलन और गहरा हुआ, तो दूसरे देशों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक होगी।
वे चीनी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा सकते हैं, आयात प्रतिबंध लगा सकते हैं या दूसरे ट्रेड बैरियर्स खड़े कर सकते हैं। इससे वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और देशों के बीच ट्रेड वॉर का खतरा भी बढ़ सकता है।
कोविड के बाद शुरू हुई ‘China Plus One’ रणनीति
कोविड-19 महामारी ने दुनिया को चीन पर अत्यधिक सप्लाई चेन निर्भरता का जोखिम दिखाया। महामारी के दौरान चीन से कई जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हुई थी।
इसके बाद बड़ी वैश्विक कंपनियों ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग रणनीति में बदलाव शुरू किया। China Plus One रणनीति के तहत कंपनियों ने चीन के साथ-साथ भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया और दूसरे देशों में भी उत्पादन क्षमता विकसित करने पर जोर दिया।
भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर भी है। यदि देश अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, लॉजिस्टिक्स, कौशल और तकनीकी क्षमता को तेजी से मजबूत करता है, तो चीन से निकलने वाली सप्लाई चेन का एक हिस्सा भारत की तरफ आ सकता है।
भारत को क्या करना चाहिए?
चीन के बढ़ते निर्यात का मुकाबला केवल आयात शुल्क बढ़ाकर नहीं किया जा सकता। भारत को अपनी उत्पादन क्षमता और तकनीकी ताकत को मजबूत करना होगा।
सबसे ज्यादा निवेश AI, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी, बैटरी टेक्नोलॉजी, ग्रीन टेक और स्किलिंग जैसे क्षेत्रों में करने की जरूरत है।
सरकार ने कई क्षेत्रों में इंसेंटिव और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव जैसी योजनाओं के जरिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की कोशिश की है। लेकिन वैश्विक स्तर पर चीन से मुकाबला करने के लिए इन प्रयासों को और व्यापक बनाना होगा।
भारत को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो कंपनियों को केवल सब्सिडी पर निर्भर न बनाएं, बल्कि उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद करें।
मुफ्त योजनाओं और लॉन्ग टर्म निवेश के बीच संतुलन जरूरी
भारत में चुनावी राजनीति के कारण मुफ्त सुविधाओं और सब्सिडी का दायरा भी बढ़ा है। मौजूदा वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने खाद्य, उर्वरक और ईंधन सब्सिडी के लिए करीब 4.10 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।
सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं की अपनी भूमिका है, लेकिन लंबे समय में आर्थिक ताकत बढ़ाने के लिए पूंजी को उत्पादक क्षेत्रों में लगाना भी जरूरी है।
AI, रोबोटिक्स, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, स्किलिंग और ग्रीन टेक्नोलॉजी में निवेश भारत को भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बना सकता है।
दुनिया के लिए आगे की चुनौती क्या है?
चीन का विशाल निर्यात सिर्फ व्यापार का आंकड़ा नहीं है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते संतुलन का संकेत भी है।
एक तरफ चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं में से एक है। दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप अपने घरेलू उद्योगों और रणनीतिक क्षेत्रों को चीनी प्रतिस्पर्धा से बचाना चाहते हैं।
अगर चीन का निर्यात और व्यापार अधिशेष इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में टैरिफ, एंटी-डंपिंग कार्रवाई और अन्य व्यापारिक प्रतिबंध बढ़ सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों है। चीन पर निर्भरता कम करने के साथ भारत यदि अपनी मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन क्षमता को मजबूत करता है, तो वह वैश्विक कंपनियों के लिए चीन के विकल्प के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
लेकिन इसके लिए सिर्फ सस्ता श्रम पर्याप्त नहीं होगा। भारत को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल श्रमबल, विश्वस्तरीय लॉजिस्टिक्स, स्थिर नीतियां और टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादन की जरूरत होगी।
आने वाले वर्षों में असली मुकाबला सिर्फ चीन बनाम भारत का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि वैश्विक सप्लाई चेन में अगली बड़ी मैन्युफैक्चरिंग ताकत कौन बनती है।


