भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि देश के लिए पाकिस्तान बड़ा खतरा है या चीन? पाकिस्तान के साथ लंबे समय से सीमा विवाद, आतंकवाद और कई युद्धों का इतिहास रहा है, जबकि चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सीमा विवाद के अलावा आर्थिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी लगातार बढ़ी है।
भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने इस सवाल को एक अलग नजरिए से समझाया है। उनका कहना है कि पाकिस्तान और चीन से मिलने वाली चुनौतियों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। पाकिस्तान की ओर से प्रायोजित आतंकवाद की वजह से भारत का तत्काल सुरक्षा फोकस पश्चिमी सीमा पर रहता है, लेकिन लंबी अवधि में चीन भारत का मुख्य प्रतिस्पर्धी होगा।
जनरल नरवणे ने यह बात अपनी किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज’ के संदर्भ में कही। उनकी यह किताब रूपा पब्लिकेशंस ने प्रकाशित की है। वह 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक भारतीय थल सेना के प्रमुख रहे और उनके कार्यकाल में 2020 का भारत-चीन सीमा गतिरोध भी हुआ था।
पाकिस्तान और चीन को एक जैसा नहीं मान सकते: नरवणे
पूर्व सेना प्रमुख के मुताबिक भारत की सुरक्षा के लिहाज से पाकिस्तान और चीन दोनों महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है। भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्ध हो चुके हैं और दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े विवाद अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
इसके अलावा पाकिस्तान की तरफ से आतंकवाद को लगातार समर्थन मिलने की वजह से भारत की पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा चुनौती बनी रहती है। यही कारण है कि पाकिस्तान से जुड़ी समस्या भारत के लिए तत्काल और प्रत्यक्ष सुरक्षा चुनौती बनी हुई है।
लेकिन चीन का मामला इससे कहीं व्यापक है। नरवणे ने खास तौर पर ‘दुश्मन’ के बजाय ‘प्रतिस्पर्धी’ शब्द का इस्तेमाल किया। उनके मुताबिक आने वाले वर्षों में चीन भारत का मुख्य प्रतिस्पर्धी बनने वाला है।
इसका मतलब केवल सैन्य ताकत से नहीं है। चीन के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा राजनीति, अर्थव्यवस्था, व्यापार और रणनीतिक प्रभाव जैसे कई क्षेत्रों में हो सकती है।
तो क्या चीन पाकिस्तान से बड़ा खतरा है?
नरवणे की बात को अगर सरल भाषा में समझें तो इसका जवाब यह है कि खतरे की प्रकृति और समय-सीमा अलग-अलग है।
पाकिस्तान से भारत को तत्काल सैन्य और आतंकवाद से जुड़ी चुनौती मिलती है। दूसरी तरफ चीन एक ऐसी शक्ति है जिसके साथ भारत की प्रतिस्पर्धा आने वाले दशकों तक चल सकती है।
यानी पाकिस्तान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन लॉन्ग टर्म रणनीतिक नजरिए से चीन भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2020 के बाद दोनों देशों के संबंधों में सीमा पर सैन्य तैनाती और तनाव का मुद्दा प्रमुख रहा है। जनरल नरवणे खुद उस दौर में सेना प्रमुख थे।
‘दुश्मन’ नहीं, ‘प्रतिस्पर्धी’ क्यों कहा?
नरवणे की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनका ‘प्रतिस्पर्धी’ शब्द का इस्तेमाल करना है।
उन्होंने चीन को सीधे ‘दुश्मन’ कहने से परहेज किया। इसके पीछे रणनीतिक सोच समझी जा सकती है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद जरूर है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए दोनों देशों के बीच संबंध सिर्फ सैन्य टकराव तक सीमित नहीं हैं। जहां एक तरफ सीमा पर दोनों देशों को अपनी सैन्य तैयारियां मजबूत रखनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी संबंधों को संभालना जरूरी है।
नरवणे के मुताबिक जहां भी दो बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है, वहां कुछ स्तर का संघर्ष और टकराव देखने को मिल सकता है। इसलिए भारत को एक तरफ अपनी सैन्य क्षमता मजबूत करनी होगी और दूसरी तरफ कूटनीतिक विकल्प भी खुले रखने होंगे।
बातचीत से समाधान की कोशिश, लेकिन सेना तैयार रहनी चाहिए
पूर्व सेना प्रमुख ने भारत की सुरक्षा रणनीति के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत पर भी जोर दिया—कूटनीति को प्राथमिकता और सैन्य शक्ति को अंतिम विकल्प के रूप में रखना।
उनका कहना है कि लंबे समय से चले आ रहे विवादों को बातचीत के जरिए हल करने की कोशिश होनी चाहिए। किसी भी विवाद का सैन्य समाधान हमेशा पहली पसंद नहीं होना चाहिए।
लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत अपनी सैन्य तैयारियों में कमी करे।
नरवणे के मुताबिक ऐसी स्थिति भी आ सकती है जब बातचीत से कोई रास्ता नहीं निकले। उस समय भारत के पास इतना मजबूत मिलिट्री डिटरेंस होना चाहिए कि सामने वाला देश किसी भी तरह के दुस्साहस से पहले कई बार सोचे।
यही सैन्य प्रतिरोध क्षमता किसी संभावित संघर्ष को रोकने में भी मदद कर सकती है।
मजबूत मिलिट्री डिटरेंस क्यों जरूरी?
किसी देश की सैन्य ताकत का उद्देश्य सिर्फ युद्ध लड़ना नहीं होता। कई बार मजबूत सेना और पर्याप्त सैन्य क्षमता युद्ध को होने से रोकने का काम भी करती है।
अगर किसी संभावित प्रतिद्वंद्वी को यह भरोसा हो कि सामने वाला देश किसी भी आक्रामक कदम का जवाब देने में सक्षम है, तो वह सैन्य दुस्साहस से बच सकता है।
भारत के संदर्भ में चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ यही रणनीतिक सोच महत्वपूर्ण हो जाती है। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से जुड़ी चुनौती और उत्तरी एवं पूर्वी सीमाओं पर चीन से जुड़ी चुनौती को देखते हुए भारत को दोनों मोर्चों पर तैयार रहना पड़ता है।
इसलिए नरवणे की बात का एक अहम संदेश यह है कि कूटनीति और सैन्य ताकत एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
चीन से मुकाबला सिर्फ सीमा पर नहीं होगा
नरवणे ने चीन को भारत का लंबी अवधि का मुख्य प्रतिस्पर्धी बताते हुए एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा केवल सीमा पर सैनिकों की तैनाती तक सीमित नहीं रहने वाली।
दोनों देशों के बीच मुकाबला कई स्तरों पर हो सकता है।
1. सैन्य क्षेत्र
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद अभी भी एक प्रमुख मुद्दा है। ऐसे में सीमा पर बुनियादी ढांचे, सैनिकों की तैनाती, निगरानी और आधुनिक सैन्य तकनीक की भूमिका बढ़ती रहेगी।
2. आर्थिक क्षेत्र
चीन दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल है। भारत के लिए अपनी अर्थव्यवस्था का विस्तार और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना भी रणनीतिक महत्व रखता है।
3. व्यापार और सप्लाई चेन
इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर औद्योगिक सामान तक कई क्षेत्रों में चीन की वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत स्थिति है। ऐसे में भारत के लिए वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करना और घरेलू उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है।
4. भू-राजनीतिक प्रभाव
दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की सक्रियता भी भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखती है। पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में चीन का प्रभाव भारत की सुरक्षा गणनाओं को प्रभावित करता है।
पाकिस्तान की चुनौती फिर भी कम नहीं
चीन को लंबी अवधि का मुख्य प्रतिस्पर्धी बताने का मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौती खत्म हो गई है।
भारत-पाकिस्तान संबंधों में आतंकवाद अब भी सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। पाकिस्तान की तरफ से आतंकवादी संगठनों को समर्थन मिलने का आरोप भारत लंबे समय से लगाता रहा है।
इसके अलावा दोनों देशों के बीच जम्मू-कश्मीर और सीमा से जुड़े विवाद भी हैं। इसलिए भारत के लिए पाकिस्तान को लेकर सतर्कता बनाए रखना जरूरी है।
यही वजह है कि नरवणे ने दोनों देशों को अलग-अलग तरह की चुनौती के रूप में देखने की बात कही है।
‘आप अपने पड़ोसियों को नहीं चुन सकते’
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर जनरल नरवणे ने एक बेहद व्यावहारिक बात कही। उनका कहना है कि आप अपने पड़ोसियों को नहीं चुन सकते।
यह बात सामान्य जीवन और भू-राजनीति दोनों पर लागू होती है। किसी देश के पास जो पड़ोसी हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता। इसलिए उनके साथ संबंधों को अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से संभालना ही सबसे व्यावहारिक रास्ता है।
भारत के सामने भी यही स्थिति है। पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर और पूर्व में चीन तथा आसपास के अन्य पड़ोसी देशों के साथ भारत को सुरक्षा, कूटनीति और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
नरवणे की किताब में क्या है?
जनरल नरवणे की नई किताब ‘The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries’ सैन्य जीवन के उन पहलुओं पर केंद्रित है जो आम लोगों के लिए कम जाने-पहचाने हैं। इसमें सैन्य परंपराओं, किस्सों, रहस्यों, युद्ध से जुड़े अनुभवों और सेना की संस्कृति से जुड़ी कहानियों को जगह दी गई है।
किताब अप्रैल 2026 में लॉन्च हुई थी और बाद में इसके सिलसिले में जनरल नरवणे ने कई इंटरव्यू भी दिए। अगस्त 2026 में पुणे में भी इस किताब के एक विशेष लॉन्च कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
निष्कर्ष: भारत के लिए असली तस्वीर क्या है?
जनरल नरवणे की टिप्पणी को एक लाइन में समझें तो पाकिस्तान भारत के लिए तत्काल सुरक्षा चुनौती है, जबकि चीन लंबी अवधि की व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र है।
पाकिस्तान के मामले में आतंकवाद और पश्चिमी सीमा की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है। चीन के मामले में सीमा विवाद के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक, व्यापारिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी जुड़ी हुई है।
इसलिए भारत की रणनीति सिर्फ यह तय करने तक सीमित नहीं हो सकती कि ‘बड़ा खतरा कौन है’। असल चुनौती यह है कि भारत दोनों मोर्चों पर अपनी सैन्य क्षमता बनाए रखते हुए कूटनीति के जरिए तनाव को नियंत्रित करे।
नरवणे का संदेश भी इसी संतुलन की ओर इशारा करता है—बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए, लेकिन जरूरत पड़ने पर जवाब देने के लिए सैन्य ताकत भी विश्वसनीय होनी चाहिए।
पूर्व सेना प्रमुख का यह नजरिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह ऐसे समय के सैन्य नेतृत्व का अनुभव रखते हैं जब भारत को एक साथ पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों और चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गंभीर तनाव का सामना करना पड़ा था।


