भारत में डिजिटल पेमेंट्स और यूपीआई क्रांति के दौर के बीच एक दिलचस्प और अहम आर्थिक ट्रेंड तेजी से उभरता दिखाई दे रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार अप्रैल के पहले 15 दिनों में सर्कुलेशन में मौजूद करेंसी यानी चलन में नकदी में 610 अरब रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इसके साथ ही कुल करेंसी इन सर्कुलेशन बढ़कर 42.3 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों के अनुसार नोटबंदी के बाद 2017 की शुरुआत से यह नकदी में सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है।
डिजिटल इंडिया के दौर में फिर क्यों बढ़ रहा कैश?
पिछले कुछ वर्षों में भारत में यूपीआई और डिजिटल पेमेंट्स में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। इसके बावजूद नकदी की मांग बढ़ना कई अर्थशास्त्रियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसी बड़ी और विविध अर्थव्यवस्था में डिजिटल और कैश दोनों समानांतर रूप से बढ़ सकते हैं। खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारों और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नकदी की भूमिका अभी भी काफी मजबूत बनी हुई है।
कितनी तेजी से बढ़ा कैश सर्कुलेशन?
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार चलन में मौजूद नकदी में सालाना आधार पर करीब 11.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल अस्थायी उछाल नहीं, बल्कि पिछले कई महीनों से बढ़ती नकदी मांग का विस्तार माना जा रहा है।
गांवों की मांग क्यों बन रही बड़ी वजह?
आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप के रिसर्च विशेषज्ञ अभिषेक उपाध्याय के अनुसार ग्रामीण मांग में मजबूती इस ट्रेंड की बड़ी वजह मानी जा रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अभी भी बड़ी मात्रा में लेनदेन नकदी आधारित होते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि आय में सुधार, सरकारी खर्च और ग्रामीण उपभोग बढ़ने से नकदी की मांग में तेजी आई है।
GST कटौती से कैसे बढ़ी नकदी की मांग?
सितंबर में रोजमर्रा की कई वस्तुओं पर GST कटौती का असर भी उपभोग पर पड़ा है।
विशेषज्ञों के अनुसार टैक्स राहत मिलने से उपभोक्ता खर्च बढ़ा, जिससे बाजार में नकदी की आवाजाही भी तेज हुई।
कम ब्याज दरों ने क्यों बढ़ाया कैश इस्तेमाल?
एसबीआई के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के अनुसार कम ब्याज दरों ने भी नकदी के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब जमा पर ब्याज दरें अपेक्षाकृत कम रहती हैं, तो लोग खर्च और नकदी रखने की तरफ ज्यादा झुकाव दिखा सकते हैं।
खासतौर पर ग्रामीण और छोटे व्यापारिक क्षेत्रों में यह प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है।
सोने-चांदी की कीमतों से कैसे जुड़ा है यह ट्रेंड?
विशेषज्ञों के अनुसार सोने और चांदी की बढ़ती कीमतों ने भी नकदी प्रवाह को प्रभावित किया हो सकता है।
कई परिवार ऊंची कीमतों के दौरान पुराने सोने-चांदी की बिक्री या रीसाइक्लिंग करते हैं, जिससे बाजार में नकदी बढ़ सकती है।
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?
चलन में नकदी बढ़ना केवल भुगतान व्यवहार का संकेत नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था की liquidity यानी तरलता की स्थिति को भी प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर लोग ज्यादा पैसा बैंकिंग सिस्टम के बजाय नकदी के रूप में रखने लगते हैं, तो बैंकों में उपलब्ध liquidity पर असर पड़ सकता है।
Liquidity Challenge क्या होती है?
बैंकिंग प्रणाली में liquidity का मतलब वह अतिरिक्त धन होता है जिसे बैंक कर्ज और आर्थिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
अगर बड़ी मात्रा में पैसा बैंकिंग सिस्टम से निकलकर नकदी के रूप में बाजार में रहने लगता है, तो lending capacity और liquidity balance प्रभावित हो सकता है।
RBI के लिए क्यों बढ़ सकती है चुनौती?
भारतीय रिजर्व बैंक पिछले कुछ समय से आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने के लिए पर्याप्त liquidity बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर नकदी की मांग लगातार तेजी से बढ़ती रही, तो RBI को liquidity management में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी पड़ सकती है।
चुनाव और महंगाई से कैसे जुड़ सकती है नकदी मांग?
अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता के अनुसार अगर महंगाई बढ़ती है, ग्रामीण मांग और मजबूत होती है और राज्यों में चुनावी गतिविधियां बढ़ती हैं, तो चलन में नकदी का स्तर और ऊंचा बना रह सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी वर्षों में आमतौर पर नकदी की मांग बढ़ती देखी जाती है।
क्या डिजिटल पेमेंट्स की रफ्तार कम हो रही है?
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा नहीं कहा जा सकता कि नकदी बढ़ने का मतलब डिजिटल भुगतान घट रहे हैं। भारत में UPI लेनदेन अभी भी रिकॉर्ड स्तर पर बने हुए हैं।
असल में भारतीय अर्थव्यवस्था में “Digital + Cash Parallel Economy” का मॉडल तेजी से उभरता दिखाई दे रहा है, जहां दोनों माध्यम साथ-साथ बढ़ रहे हैं।
RBI के डिविडेंड की क्या भूमिका हो सकती है?
ANZ के अर्थशास्त्री धीरज निम के अनुसार RBI का डिविडेंड भविष्य में liquidity को कुछ हद तक समर्थन दे सकता है। हालांकि अगर चलन में नकदी लगातार बढ़ती रही, तो यह अतिरिक्त liquidity को कम भी कर सकती है।
नोटबंदी के बाद क्या बदल गया?
2016 की नोटबंदी के बाद उम्मीद की जा रही थी कि भारत तेजी से कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ेगा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े दिखाते हैं कि डिजिटल भुगतान बढ़ने के बावजूद नकदी की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसी विशाल और विविध अर्थव्यवस्था में नकदी अभी भी भरोसे, सुविधा और छोटे लेनदेन का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में ग्रामीण मांग, महंगाई, ब्याज दरें और चुनावी गतिविधियां नकदी मांग को प्रभावित कर सकती हैं। अगर नकदी सर्कुलेशन तेजी से बढ़ता रहा, तो RBI को liquidity balance बनाए रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।
इसके साथ ही भारत में डिजिटल भुगतान और नकदी आधारित अर्थव्यवस्था दोनों का समानांतर विस्तार जारी रहने की संभावना दिखाई दे रही है।
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