Bihar Flood Train: बिहार के खगड़िया में बाढ़ के दिनों में एक पैसेंजर ट्रेन का नजारा बिल्कुल बदल जाता है। सुबह इसमें सैकड़ों पशुपालक चारे की तलाश में निकलते हैं और शाम को हरी घास की भारी गठरियां लेकर वापस लौटते हैं। इसी वजह से स्थानीय लोगों ने इसे ‘घास ट्रेन’ नाम दे दिया है।
Bihar Train News: बिहार में बाढ़ सिर्फ इंसानों की जिंदगी ही नहीं बदलती, बल्कि पशुपालकों के सामने मवेशियों के लिए चारे का बड़ा संकट भी खड़ा कर देती है। खगड़िया जिले के बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों ने इस समस्या से निपटने का अपना अनोखा तरीका खोज लिया है। यहां एक पैसेंजर ट्रेन हर साल बाढ़ के मौसम में पशुपालकों के लिए किसी जीवनरेखा से कम नहीं रहती।
भारतीय रेलवे के रिकॉर्ड में यह ट्रेन समस्तीपुर-सहरसा पैसेंजर ट्रेन के नाम से दर्ज है। हालांकि, स्थानीय लोगों के बीच इसकी पहचान एक अलग नाम से है। बाढ़ के मौसम में इसमें सफर करने वाले पशुपालक इसे प्यार से ‘घास ट्रेन’ कहते हैं।
इस नाम के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। सुबह बड़ी संख्या में पशुपालक ट्रेन पकड़कर ऐसे इलाकों की ओर निकलते हैं, जहां बाढ़ का पानी नहीं पहुंचा है और मवेशियों के लिए हरा चारा उपलब्ध है। दिनभर वे घास काटते हैं और शाम को उसी ट्रेन से चारे की बड़ी-बड़ी गठरियां लेकर अपने गांव लौट आते हैं।
बाढ़ आते ही बढ़ जाती है चारे की परेशानी

खगड़िया जिले के मानसी प्रखंड के कई निचले इलाकों में हर साल बाढ़ की स्थिति बनती है। धमसारा घाट, मटिहानी और रोहियार जैसे इलाकों में पानी भरने के बाद खेत और आसपास के चरागाह भी प्रभावित हो जाते हैं।
ऐसे समय में पशुपालकों के लिए सबसे बड़ी चिंता मवेशियों के खाने की होती है। जिन परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी गाय, भैंस और दूसरे पशुओं पर निर्भर है, उनके लिए पर्याप्त चारा जुटाना बेहद जरूरी होता है।
बाढ़ के पानी में खेत डूब जाने के बाद स्थानीय स्तर पर हरी घास मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में पशुपालक बाढ़ प्रभावित इलाके से बाहर निकलते हैं और सूखे क्षेत्रों में जाकर चारा काटकर लाते हैं।
सुबह-सुबह ट्रेन में जुटते हैं पशुपालक
बाढ़ के दिनों में सुबह का समय इस ट्रेन के लिए खास हो जाता है। बड़ी संख्या में पशुपालक इसमें सवार होते हैं। उनके साथ चारा काटने के लिए जरूरी सामान होता है और मंजिल होती है ऐसे इलाके जहां मवेशियों के लिए हरी घास उपलब्ध हो।
इन लोगों का सफर किसी सामान्य यात्रा जैसा नहीं होता। उनके लिए ट्रेन बाढ़ से प्रभावित गांवों और चारे वाले इलाकों के बीच एक जरूरी कड़ी बन जाती है।
ट्रेन से उतरने के बाद किसान और पशुपालक आसपास के खेतों तथा खुले इलाकों में जाकर घास काटते हैं। तेज धूप और गर्मी के बावजूद वे घंटों मेहनत करते हैं, क्योंकि उनके पीछे घर पर मवेशी उनका इंतजार कर रहे होते हैं।
दिनभर घास काटने के बाद शाम को बदल जाता है नजारा
सुबह खाली हाथ या कम सामान के साथ निकले पशुपालक जब शाम को स्टेशन लौटते हैं तो उनके साथ हरे चारे की बड़ी-बड़ी गठरियां होती हैं।
इसके बाद ट्रेन का दृश्य किसी आम पैसेंजर ट्रेन से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। डिब्बों में यात्रियों के साथ जगह-जगह हरी घास की गठरियां और बोरियां नजर आती हैं। कई बार चारा इतना अधिक होता है कि डिब्बे के दरवाजे और दूसरे हिस्से भी उससे भरे दिखाई देते हैं।
इन्हीं तस्वीरों और इस अनोखे सफर की वजह से स्थानीय स्तर पर यह ट्रेन ‘घास ट्रेन’ के नाम से मशहूर हो गई है।
ट्रेन सिर्फ सफर का साधन नहीं, मवेशियों की उम्मीद भी है
बाढ़ के दौरान पशुपालकों के लिए इस ट्रेन की अहमियत सिर्फ आवागमन तक सीमित नहीं है। यह उन्हें उन इलाकों तक पहुंचने में मदद करती है जहां उनके पशुओं के लिए चारा मिल सकता है।
अगर उन्हें हर दिन लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़े या किसी दूसरे साधन का इंतजाम करना पड़े, तो समय और खर्च दोनों बढ़ सकते हैं। ट्रेन उनके लिए अपेक्षाकृत आसान माध्यम बन जाती है।
इस तरह एक साधारण पैसेंजर ट्रेन बाढ़ के मुश्किल समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन से जुड़े परिवारों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
‘वंदे भारत’ से अलग है इस ट्रेन की कहानी
देश में जब आधुनिक ट्रेनों, तेज रफ्तार और अत्याधुनिक सुविधाओं की चर्चा होती है, तब खगड़िया की यह पैसेंजर ट्रेन अपनी बिल्कुल अलग वजह से लोगों का ध्यान खींचती है।
यहां ट्रेन की पहचान उसकी रफ्तार या सुविधाओं से नहीं, बल्कि उससे जुड़ी ग्रामीण जरूरत से बनी है। बाढ़ के दिनों में यह ट्रेन सैकड़ों पशुपालकों को चारे तक पहुंचने का रास्ता देती है और फिर शाम को उनके साथ मवेशियों के लिए जुटाया गया हरा चारा वापस गांव लेकर आती है।
यही वजह है कि स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ रेलवे की एक पैसेंजर सेवा नहीं रह गई है। बाढ़ के मौसम में यह इंसानों के साथ उनके मवेशियों के लिए भी एक जरूरी सहारा बन जाती है।
हर साल दोहराई जाती है ‘घास ट्रेन’ की कहानी
बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मुश्किल हालात नए नहीं हैं। लेकिन हर साल जब पानी गांवों और खेतों को घेर लेता है, तब इस पैसेंजर ट्रेन के जरिए चारा जुटाने की तस्वीर एक बार फिर सामने आती है।
सुबह पशुपालकों का सूखे इलाकों की ओर जाना और शाम को हरे चारे की गठरियों के साथ लौटना बताता है कि ग्रामीण भारत में परिवहन के साधन किस तरह स्थानीय जरूरतों के मुताबिक नई भूमिका निभा सकते हैं।
इसी अनोखी वजह से समस्तीपुर-सहरसा पैसेंजर ट्रेन को खगड़िया के स्थानीय लोग ‘घास ट्रेन’ कहते हैं। बाढ़ के मौसम में यह नाम सिर्फ एक ट्रेन की पहचान नहीं, बल्कि उन पशुपालक परिवारों की रोजाना की जद्दोजहद की कहानी बन जाता है, जो अपने मवेशियों को जिंदा रखने के लिए हर दिन कई किलोमीटर का सफर करते हैं।


