परिचय: मजबूत रिश्तों के बावजूद व्यापार क्यों नहीं बढ़ा?
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देश तकनीक, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग में बड़े साझेदार माने जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद द्विपक्षीय व्यापार का आंकड़ा पिछले तीन वित्तीय वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है।
हाल ही में आई Rubix Data Sciences की रिपोर्ट के अनुसार, भारत–दक्षिण कोरिया व्यापार FY2022 से FY2025 के बीच लगभग USD 25 से 28 बिलियन के दायरे में ही घूमता रहा। यह स्थिति तब है जब दोनों देशों ने 2030 तक इसे USD 50 बिलियन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
यह सवाल स्वाभाविक है कि जब राजनीतिक और रणनीतिक संबंध इतने मजबूत हैं, तो व्यापार उतनी तेजी से क्यों नहीं बढ़ पा रहा?
व्यापार स्थिर क्यों रहा? रिपोर्ट क्या कहती है
रिपोर्ट के अनुसार, व्यापार में स्थिरता के पीछे कोई एक कारण नहीं बल्कि कई संरचनात्मक (structural) समस्याएं हैं।
भारत का दक्षिण कोरिया को होने वाला निर्यात लगातार घटा है। FY2022 में यह लगभग USD 8.1 बिलियन था, जो FY2025 में घटकर USD 5.8 बिलियन पर आ गया।
दूसरी तरफ, भारत का आयात लगभग स्थिर रहा और करीब USD 21 बिलियन पर बना रहा। इसी वजह से व्यापार घाटा लगातार बढ़ता गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह असंतुलन दर्शाता है कि भारत अभी भी कोरिया से अधिक टेक्नोलॉजी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स आयात कर रहा है, लेकिन निर्यात में विविधता (diversification) नहीं ला पा रहा है।
भारत–कोरिया संबंधों में नया मोड़
हाल ही में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को इस साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यह आठ वर्षों बाद पहला उच्च स्तरीय दौरा था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर कहा कि दोनों देशों के बीच लोकतांत्रिक मूल्य, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था और कानून का सम्मान एक मजबूत आधार बनाते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देश Indo-Pacific क्षेत्र में एक समान दृष्टिकोण रखते हैं, जो भविष्य की रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत कर सकता है।
व्यापार क्यों नहीं बढ़ पा रहा? मुख्य चुनौतियां
1. निर्यात में गिरावट
भारत का दक्षिण कोरिया को निर्यात लगातार घट रहा है, खासकर:
- पेट्रोलियम उत्पाद
- मेटल्स
- इंटरमीडिएट गुड्स
इसका मतलब है कि भारत अभी भी “commodity-based exports” पर निर्भर है।
2. हाई-टेक आयात पर निर्भरता
कोरिया से भारत मुख्य रूप से आयात करता है:
- इलेक्ट्रॉनिक चिप्स
- सेमीकंडक्टर
- मशीनरी
- हाई-टेक कंपोनेंट्स
रिपोर्ट में बताया गया है कि इलेक्ट्रिकल इंटीग्रेटेड सर्किट्स का हिस्सा 7% से बढ़कर 15% हो गया है।
3. नॉन-टैरिफ बाधाएं (Non-Tariff Barriers)
दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने में कई गैर-शुल्क बाधाएं भी एक बड़ी समस्या हैं, जैसे:
- नियमों की जटिलता
- प्रमाणन प्रक्रिया
- बाजार प्रवेश प्रतिबंध
भारत के लिए क्या अवसर हैं?
रिपोर्ट यह भी बताती है कि स्थिति केवल चुनौतीपूर्ण नहीं है, बल्कि अवसरों से भरी हुई है।
1. सेमीकंडक्टर सेक्टर
भारत और कोरिया मिलकर चिप निर्माण में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
2. क्लीन एनर्जी
सोलर और बैटरी टेक्नोलॉजी में सहयोग बढ़ सकता है।
3. शिपबिल्डिंग और डिफेंस
कोरिया दुनिया का बड़ा शिपबिल्डिंग हब है, भारत इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित कर सकता है।
4. एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग
मेक इन इंडिया और कोरियन टेक्नोलॉजी का मेल बड़ा अवसर बन सकता है।
50 अरब डॉलर लक्ष्य कितना वास्तविक है?
2030 तक USD 50 billion trade target महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन असंभव नहीं।
इसके लिए तीन चीजें जरूरी हैं:
- भारत को निर्यात बढ़ाना होगा
- मैन्युफैक्चरिंग साझेदारी मजबूत करनी होगी
- दोनों देशों को व्यापार नियम आसान करने होंगे
अगर यह सुधार नहीं हुए, तो व्यापार केवल “stable but stagnant” ही रहेगा।
निवेश साझेदारी की भूमिका
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि निवेश (investment flows) भी बढ़ाना जरूरी है।
अगर कोरियन कंपनियां भारत में उत्पादन बढ़ाती हैं, तो:
- निर्यात बढ़ेगा
- रोजगार बढ़ेगा
- तकनीक ट्रांसफर होगा
निष्कर्ष: मजबूत रिश्ते, लेकिन अधूरी क्षमता
भारत और दक्षिण कोरिया के रिश्ते राजनीतिक रूप से मजबूत हैं, लेकिन आर्थिक रूप से अभी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंचे हैं।
वर्तमान स्थिति यह दिखाती है कि:
- संबंध मजबूत हैं
- अवसर बड़े हैं
- लेकिन संरचनात्मक सुधार जरूरी हैं
अगर ये सुधार किए जाते हैं, तो 2030 का 50 अरब डॉलर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, वरना व्यापार एक सीमित दायरे में ही घूमता रहेगा।
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