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India vs Vietnam: ‘China+1’ की रेस में कौन आगे? सिर्फ फैक्ट्री नहीं, सोच का भी है मुकाबला

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 10:53 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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1 Min Read
india-vs-vietnam-china-plus-one-manufacturing-race-analysis-hindi
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नई दिल्ली। दुनिया की बड़ी कंपनियां अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती हैं। कोविड महामारी, अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन संकट ने वैश्विक कंपनियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर पूरी मैन्युफैक्चरिंग सिर्फ चीन में रहेगी तो जोखिम बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। इसी से पैदा हुई ‘China+1’ रणनीति। यानी चीन के साथ-साथ किसी दूसरे देश में भी मैन्युफैक्चरिंग बेस तैयार करना।

Contents
क्या बोले केजी माओ?आखिर ‘China+1’ रणनीति क्या है?वियतनाम आखिर इतना आगे कैसे निकला?1. तेज फैसले और तेज प्रोजेक्ट अप्रूवल2. चीन के बेहद करीब लोकेशन3. मजबूत FTA नेटवर्क4. Export-Oriented मॉडलभारत की ताकतें क्या हैं?विशाल घरेलू बाजारइंजीनियरिंग और टेक्निकल टैलेंटPLI और Make in Indiaलोकतांत्रिक और diversified economyलेकिन भारत की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?1. Infrastructure gap2. Policy execution3. Regulatory complexity4. Manufacturing cultureक्या भारत सच में आलोचना स्वीकार नहीं करता?क्या वियतनाम भारत से आगे निकल जाएगा?Short-term race मेंलेकिन long-term picture अलग हो सकती हैअसली लड़ाई सिर्फ फैक्ट्री की नहीं, execution की हैसोशल मीडिया पर क्यों बंटी राय?निष्कर्ष

इस रेस में सबसे ज्यादा चर्चा दो देशों की हो रही है — भारत और वियतनाम। दोनों खुद को चीन का विकल्प बताने में लगे हैं। लेकिन अब चीन के एक चर्चित विश्लेषक की टिप्पणी ने इस बहस को और तीखा बना दिया है।

चीन के विश्लेषक केजी माओ (Keji Mao) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने पुराने अनुभव साझा करते हुए दावा किया कि कई साल पहले ही उन्हें समझ आ गया था कि ‘China+1’ रणनीति का बड़ा फायदा वियतनाम को मिलेगा, भारत को नहीं। उनका तर्क सिर्फ आर्थिक नहीं था, बल्कि मानसिकता और प्रतिक्रिया शैली से जुड़ा हुआ था।

उनकी पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कौन ज्यादा फैक्ट्री लगाएगा, बल्कि यह भी है कि कौन तेजी से सीख सकता है, सुधार कर सकता है और ग्लोबल सप्लाई चेन की जरूरतों के हिसाब से खुद को ढाल सकता है।

क्या बोले केजी माओ?

Many years ago, I gave two presentations on how China builds its industrial and technological ecosystem—one for an Indian audience and one for a Vietnamese audience. Although the content was largely the same and went into many details that were rarely mentioned in other settings,… pic.twitter.com/h8pLZSBxsH

— Keji Mao (毛克疾) (@kejimao) May 16, 2026

केजी माओ इंटरनेशनल कोऑपरेशन सेंटर से जुड़े रहे हैं। वह South Asia Research Brief के फाउंडर और Harvard-Yenching Institute के विजिटिंग फेलो भी रह चुके हैं। उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले उन्होंने चीन के औद्योगिक मॉडल पर दो अलग-अलग प्रस्तुतियां दी थीं। एक वियतनामी दर्शकों के लिए और दूसरी भारतीय दर्शकों के लिए। उनके मुताबिक दोनों जगह लगभग एक जैसी बातें कही गईं, लेकिन प्रतिक्रियाएं बिल्कुल अलग थीं।

माओ के अनुसार वियतनामी प्रतिभागियों ने चीन और वियतनाम के बीच औद्योगिक अंतर को स्वीकार किया। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि चीन किन क्षेत्रों में आगे है और वियतनाम वहां कैसे सुधार कर सकता है। माओ का कहना है कि वियतनामी प्रतिभागियों ने उनसे और गहराई से विश्लेषण करने का अनुरोध भी किया।

इसके विपरीत भारत में, उनके अनुसार, दर्शक काफी डिफेंसिव हो गए। उन्होंने लगभग हर बिंदु पर बहस शुरू कर दी। माओ का आरोप है कि आलोचना को समझने के बजाय चर्चा एक तरह की बहस में बदल गई और उनका पूरा विश्लेषण सामने नहीं आ पाया।

यहीं से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ‘China+1’ रणनीति में वियतनाम ज्यादा तेजी से आगे निकल सकता है।

आखिर ‘China+1’ रणनीति क्या है?

‘China+1’ कोई सरकारी योजना नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बिजनेस रणनीति है। इसका मकसद यह है कि कंपनियां अपनी पूरी सप्लाई चेन सिर्फ चीन पर निर्भर न रखें।

उदाहरण के लिए अगर चीन में लॉकडाउन लग जाए, अमेरिका नए टैरिफ लगा दे, युद्ध या भू-राजनीतिक संकट हो जाए, शिपिंग बाधित हो जाए तो पूरी उत्पादन व्यवस्था प्रभावित न हो। इसीलिए कंपनियां अब चीन के अलावा भारत, वियतनाम, मेक्सिको, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों में फैक्ट्रियां लगा रही हैं।

वियतनाम आखिर इतना आगे कैसे निकला?

पिछले 10 वर्षों में वियतनाम ने खुद को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित किया है। खासकर सैमसंग ने वहां बहुत बड़ा निवेश किया। आज सैमसंग के कई प्रमुख स्मार्टफोन वियतनाम में बनते हैं।

एप्पल के सप्लायर्स ने भी तेजी से वियतनाम में विस्तार किया है। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं।

1. तेज फैसले और तेज प्रोजेक्ट अप्रूवल

वियतनाम में इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स को मंजूरी अपेक्षाकृत तेजी से मिलती है। भूमि अधिग्रहण, बिजली कनेक्शन और निर्यात प्रक्रियाएं भारत की तुलना में कम जटिल मानी जाती हैं।

2. चीन के बेहद करीब लोकेशन

वियतनाम की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है। वह चीन के बेहद नजदीक है। इसका फायदा यह है कि चीनी सप्लाई नेटवर्क आसानी से वहां शिफ्ट हो सकता है।

अगर किसी फैक्ट्री को चीन से पुर्जे चाहिए तो ट्रांसपोर्ट लागत और समय दोनों कम रहते हैं।

3. मजबूत FTA नेटवर्क

वियतनाम ने यूरोप, एशिया और कई अन्य क्षेत्रों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) किए हैं। इससे वहां बने उत्पादों को कई बाजारों में कम टैक्स पर प्रवेश मिलता है।

4. Export-Oriented मॉडल

वियतनाम ने शुरू से खुद को निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में तैयार किया। उसकी नीति स्पष्ट रही — “विदेशी कंपनियों को लाओ, उत्पादन बढ़ाओ और निर्यात बढ़ाओ।”

भारत की ताकतें क्या हैं?

हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि भारत रेस से बाहर है। वास्तव में भारत की ताकतें वियतनाम से काफी अलग और कई मामलों में ज्यादा बड़ी हैं।

विशाल घरेलू बाजार

भारत सिर्फ निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्था नहीं है। यहां 140 करोड़ से ज्यादा लोगों का बड़ा उपभोक्ता बाजार मौजूद है। यही कारण है कि एप्पल, सैमसंग और कई ऑटो कंपनियां भारत को सिर्फ एक्सपोर्ट बेस नहीं बल्कि बड़े मार्केट के रूप में भी देखती हैं।

इंजीनियरिंग और टेक्निकल टैलेंट

भारत के पास बड़ी संख्या में इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल और तकनीकी विशेषज्ञ हैं। यही कारण है कि हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग और डिजाइनिंग में भारत की संभावनाएं काफी मजबूत मानी जाती हैं।

PLI और Make in India

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में Production Linked Incentive (PLI) जैसी योजनाएं शुरू की हैं। मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में इसका असर दिखाई भी दिया है।

आज भारत में:

  • iPhone assembly तेजी से बढ़ रही है
  • Foxconn निवेश बढ़ा रही है
  • semiconductor ecosystem पर काम हो रहा है
  • electronics exports लगातार बढ़ रहे हैं

लोकतांत्रिक और diversified economy

भारत की अर्थव्यवस्था सिर्फ एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है। IT, services, pharma, auto, telecom और digital economy जैसे कई मजबूत क्षेत्र मौजूद हैं।

लेकिन भारत की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

यहीं से बहस का असली हिस्सा शुरू होता है।

1. Infrastructure gap

हालांकि स्थिति तेजी से सुधर रही है, लेकिन logistics cost अभी भी भारत में ज्यादा है। बंदरगाह, सड़क और सप्लाई नेटवर्क के मामले में भारत को अभी लंबा सफर तय करना है।

2. Policy execution

भारत में नीतियां अक्सर अच्छी होती हैं, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन में देरी बड़ी समस्या बन जाती है।

3. Regulatory complexity

कई विदेशी कंपनियां अब भी मानती हैं कि भारत में compliance और approvals जटिल हैं।

4. Manufacturing culture

भारत लंबे समय तक services economy के रूप में विकसित हुआ, जबकि चीन और वियतनाम ने manufacturing ecosystem पर ज्यादा फोकस किया।

क्या भारत सच में आलोचना स्वीकार नहीं करता?

केजी माओ की यह टिप्पणी सबसे विवादित हिस्सा बन गई है। कई लोगों का कहना है कि भारत में आलोचना के बजाय बहस की संस्कृति ज्यादा मजबूत है। लेकिन दूसरी ओर कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की लोकतांत्रिक प्रकृति ही उसकी ताकत है।

भारत में:

  • मीडिया स्वतंत्र है
  • सोशल मीडिया पर खुली बहस होती है
  • सरकारों की आलोचना होती है
  • नीतियों पर सार्वजनिक चर्चा होती है

जबकि चीन और वियतनाम जैसे देशों में राजनीतिक ढांचा काफी अलग है। इसलिए दोनों की तुलना पूरी तरह समान आधार पर करना आसान नहीं है।

क्या वियतनाम भारत से आगे निकल जाएगा?

यह सवाल इतना सरल नहीं है।

Short-term race में

वियतनाम कई मामलों में आगे दिखाई देता है:

  • तेज export growth
  • electronics manufacturing
  • factory relocation
  • supply chain integration

लेकिन long-term picture अलग हो सकती है

भारत की आबादी, बाजार, डिजिटल इकोनॉमी और geopolitical positioning उसे लंबी रेस का खिलाड़ी बनाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वियतनाम “fast manufacturing hub” बन सकता है जबकि भारत “large-scale industrial economy” बनने की क्षमता रखता है

असली लड़ाई सिर्फ फैक्ट्री की नहीं, execution की है

आज दुनिया की कंपनियां सिर्फ सस्ती मजदूरी नहीं देख रहीं। वे यह भी देख रही हैं policy stability, infrastructure, supply chain reliability, skilled workforce, speed of execution यही वजह है कि भारत और वियतनाम दोनों के लिए आने वाले 10 साल बेहद अहम होंगे।

सोशल मीडिया पर क्यों बंटी राय?

माओ की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। एक वर्ग ने कहा कि भारत को आलोचना से सीखने की जरूरत है। सिर्फ “हम सबसे बड़े हैं” कहने से manufacturing hub नहीं बना जा सकता।

दूसरे वर्ग ने माओ की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने भारत की जटिलताओं को बहुत सतही तरीके से देखा। भारत जैसे विविध लोकतंत्र की तुलना छोटे और केंद्रीकृत मॉडल वाले देशों से करना उचित नहीं है।

निष्कर्ष

‘China+1’ की रेस सिर्फ निवेश खींचने की लड़ाई नहीं है। यह क्षमता, मानसिकता, नीति और execution का मुकाबला है। वियतनाम ने तेज गति दिखाई है। भारत ने बड़ा विजन दिखाया है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि कौन देश वैश्विक सप्लाई चेन में स्थायी जगह बना पाता है।

फिलहाल इतना जरूर साफ है कि दुनिया अब चीन का विकल्प खोज रही है — और उस विकल्प की सबसे बड़ी लड़ाई एशिया के भीतर ही लड़ी जा रही है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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