Radhika Gupta SIP Investment Strategy: एडलवाइस म्यूचुअल फंड की एमडी और सीईओ राधिका गुप्ता अपनी निवेश रणनीति और फाइनेंशियल डिसिप्लिन को लेकर अक्सर चर्चा में रहती हैं। हाल ही में एक पॉडकास्ट में उन्होंने अपनी पर्सनल फाइनेंस जर्नी के बारे में कई अहम बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा था जब वह अपनी कमाई से कुछ भी सेव नहीं कर पाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने बचत और निवेश की आदत विकसित की और आज वह अपनी टैक्स के बाद मिलने वाली सैलरी का करीब 90% हिस्सा SIP में निवेश करती हैं।
उनकी कहानी उन युवाओं के लिए खास तौर पर सीख देती है, जो नौकरी शुरू करने के बाद निवेश को टालते रहते हैं। राधिका गुप्ता का मानना है कि निवेश में शुरुआत बड़ी रकम से नहीं, बल्कि नियमित आदत से होती है।
पहली सैलरी से ही शुरू करें निवेश
राधिका गुप्ता के मुताबिक, नौकरी की शुरुआत के साथ ही निवेश की आदत डालना बेहद जरूरी है। शुरुआती दौर में कम आय होने के कारण बड़ी रकम निवेश करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि निवेश को भविष्य के लिए टाल दिया जाए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी की सैलरी ₹45,000 महीने है, तो उसे करीब ₹9,000-₹10,000 बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर इतनी बचत संभव नहीं है, तो कम से कम ₹5,000 हर महीने अलग रखने का लक्ष्य बनाया जा सकता है।
उनकी सलाह का मुख्य उद्देश्य यह है कि व्यक्ति अपनी कमाई बढ़ने का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध आय में से ही बचत और निवेश की शुरुआत करे।
सीक्रेट नंबर 1: पहले निवेश, फिर खर्च
राधिका गुप्ता की निवेश रणनीति में सबसे अहम बात है कि बचत को महीने के आखिर में बची हुई रकम पर निर्भर नहीं रखना चाहिए।
आमतौर पर लोग पहले अपनी जरूरतों और इच्छाओं पर खर्च करते हैं और महीने के अंत में जो पैसा बचता है, उसे निवेश करने की सोचते हैं। समस्या यह है कि कई बार महीने के अंत तक बचाने के लिए कुछ खास रकम बचती ही नहीं।
SIP इस आदत को बदलने में मदद कर सकती है। बैंक अकाउंट से तय तारीख पर ऑटोमैटिक डेबिट होने के कारण निवेश की रकम पहले ही अलग हो जाती है। इसके बाद बची हुई रकम से बाकी खर्च मैनेज किए जा सकते हैं।
राधिका गुप्ता ने इसे सैलरी से टैक्स कटने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए समझाया है। जिस तरह TDS सैलरी मिलने से पहले ही कट जाता है, उसी तरह निवेश की रकम भी पहले ही अलग हो जानी चाहिए।
सीक्रेट नंबर 2: छोटी शुरुआत को कम न समझें
वेल्थ क्रिएशन के लिए शुरुआत में बड़ी रकम जरूरी नहीं है। ज्यादा महत्वपूर्ण है कि निवेश लगातार जारी रहे।
मान लीजिए कोई व्यक्ति नौकरी शुरू करते समय हर महीने ₹5,000 की SIP शुरू करता है। बाद में उसकी आय बढ़ती है तो वह SIP की रकम भी बढ़ा सकता है। इसे आम तौर पर SIP Step-Up रणनीति कहा जाता है।
इसका फायदा यह है कि निवेशक अपनी बढ़ती आय के साथ निवेश को भी बढ़ाता रहता है। इस तरह समय के साथ निवेश की रकम और संभावित कंपाउंडिंग दोनों का असर बढ़ सकता है।
हालांकि, म्यूचुअल फंड में रिटर्न की गारंटी नहीं होती और वास्तविक रिटर्न बाजार के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
सीक्रेट नंबर 3: बचत दर धीरे-धीरे बढ़ाएं
राधिका गुप्ता ने अपनी कहानी बताते हुए कहा कि वह हमेशा से अपनी सैलरी का 90% हिस्सा निवेश नहीं करती थीं।
उनकी यात्रा जीरो सेविंग्स से शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने अपनी आय का करीब 10% बचाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह अनुपात 20% और फिर समय के साथ बढ़ता गया।
उनका अनुभव बताता है कि फाइनेंशियल डिसिप्लिन एक दिन में नहीं बनता। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, उसी अनुपात में जीवनशैली का खर्च बढ़ाने के बजाय निवेश और बचत को भी बढ़ाया जा सकता है।
युवाओं के लिए इसका सरल तरीका यह हो सकता है कि हर सैलरी बढ़ोतरी या बोनस का कुछ हिस्सा सीधे निवेश में लगाया जाए।
सीक्रेट नंबर 4: बच्चों के लिए भी जल्दी शुरू करें निवेश
राधिका गुप्ता बच्चों के लिए लंबे समय तक निवेश करने की समर्थक रही हैं। उन्होंने 2023 में बताया था कि अपने बेटे के छह महीने का होने के बाद ही उसके नाम पर इक्विटी में निवेश शुरू कर दिया था।
बच्चों के लिए लंबी अवधि में निवेश करने का सबसे बड़ा फायदा समय हो सकता है। जितना लंबा निवेश का समय होगा, उतना ही कंपाउंडिंग को काम करने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, बच्चों के नाम पर निवेश करते समय माता-पिता को निवेश का उद्देश्य, जोखिम और समयावधि समझकर ही विकल्प चुनना चाहिए। केवल लंबे समय के नाम पर बहुत अधिक जोखिम लेना जरूरी नहीं है।
0% से 90% तक की सेविंग्स रेट कैसे पहुंची?
राधिका गुप्ता की पर्सनल फाइनेंस जर्नी का सबसे दिलचस्प हिस्सा उनका सेविंग्स रेट है। उन्होंने बताया कि उन्होंने धीरे-धीरे अपनी बचत बढ़ाई।
इसे एक सरल उदाहरण से समझ सकते हैं:
- शुरुआत में बचत: 0%
- अगला लक्ष्य: 10%
- फिर: 20%
- आय बढ़ने के साथ बचत और निवेश में वृद्धि
- मौजूदा स्तर: पोस्ट-टैक्स सैलरी का करीब 90% SIP में निवेश
यह आंकड़ा उनकी व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति और रणनीति को दर्शाता है। हर व्यक्ति के लिए 90% बचत करना संभव या जरूरी नहीं है। किसी व्यक्ति की SIP उसकी आय, खर्च, कर्ज, आपातकालीन फंड और वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार होनी चाहिए।
SIP को लेकर एक जरूरी बात
SIP यानी Systematic Investment Plan खुद कोई अलग निवेश उत्पाद नहीं है। यह म्यूचुअल फंड में नियमित अंतराल पर तय रकम निवेश करने का तरीका है।
इससे निवेश में नियमितता आती है और बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच लगातार निवेश किया जा सकता है। लेकिन SIP करने का मतलब यह नहीं है कि म्यूचुअल फंड में नुकसान नहीं होगा।
इक्विटी म्यूचुअल फंड में बाजार जोखिम मौजूद रहता है। इसलिए केवल किसी सेलिब्रिटी, एक्सपर्ट या फाइनेंस प्रोफेशनल की व्यक्तिगत रणनीति देखकर अपनी पूरी निवेश योजना कॉपी नहीं करनी चाहिए।
सिर्फ ज्यादा पैसा जमा करना ही जिंदगी का लक्ष्य नहीं
राधिका गुप्ता की सलाह का एक दूसरा पहलू भी काफी महत्वपूर्ण है। वह केवल ज्यादा से ज्यादा पैसा जमा करने की दौड़ से बचने की बात कहती रही हैं।
उनका कहना है कि मेहनत से कमाए पैसे का इस्तेमाल जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए भी होना चाहिए। यानी निवेश और बचत जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ वर्तमान जीवन, परिवार और व्यक्तिगत खुशियों के लिए भी पैसा खर्च करना चाहिए।
इसका मतलब है कि फाइनेंशियल प्लानिंग का उद्देश्य सिर्फ बड़ा बैंक बैलेंस या बड़ा पोर्टफोलियो बनाना नहीं होना चाहिए। सही वित्तीय योजना वह है जो भविष्य के लक्ष्यों के साथ वर्तमान जरूरतों के बीच भी संतुलन बनाए।
युवाओं के लिए क्या है सबसे बड़ी सीख?
राधिका गुप्ता की पूरी निवेश रणनीति से चार मुख्य बातें निकलती हैं—जल्दी शुरुआत, नियमित निवेश, आय बढ़ने के साथ SIP बढ़ाना और लंबे समय तक निवेश बनाए रखना।
अगर कोई युवा अपनी पहली सैलरी से सिर्फ ₹5,000 की SIP शुरू करता है और बाद में अपनी आय बढ़ने के साथ उसे बढ़ाता जाता है, तो वह निवेश की मजबूत आदत विकसित कर सकता है।
लेकिन निवेश की रकम तय करते समय अपनी वित्तीय क्षमता को प्राथमिकता देना जरूरी है। पहले जरूरी खर्च, इमरजेंसी फंड और कर्ज की स्थिति को ध्यान में रखें। इसके बाद अपने लक्ष्य और जोखिम क्षमता के अनुसार निवेश का फैसला करें।
डिस्क्लेमर: म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। ऊपर दी गई जानकारी राधिका गुप्ता द्वारा साझा की गई निवेश संबंधी बातों और सामान्य वित्तीय अवधारणाओं पर आधारित है। इसे व्यक्तिगत निवेश सलाह न समझें। निवेश करने से पहले अपनी वित्तीय स्थिति, लक्ष्य और जोखिम क्षमता का आकलन करें और जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।


