Subhash Chandra Guarantee Controversy: एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा ने अपनी पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स को लेकर विस्तृत सफाई दी है। उन्होंने खास तौर पर ₹22,000 करोड़ की रकम को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं पर अपना पक्ष रखा है। चंद्रा का कहना है कि ₹22,000 करोड़ की रकम उनका व्यक्तिगत कर्ज नहीं, बल्कि उनके द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी की कुल राशि है।
नई दिल्ली: एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और मीडिया कारोबारी डॉ. सुभाष चंद्रा ने 30 अगस्त को अपनी पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स को लेकर विस्तृत बयान जारी किया। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर उनकी देनदारियों और करीब ₹22,000 करोड़ की रकम को लेकर चर्चाएं चल रही थीं। कुछ पोस्ट में #PaiseVapasKaro जैसे हैशटैग भी इस्तेमाल किए गए।
चंद्रा ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट के कारण उनकी देनदारियों की प्रकृति को लेकर गलतफहमी पैदा हुई है। इसलिए उन्होंने पूरे मामले को आंकड़ों के साथ समझाने की कोशिश की है।
₹22,000 करोड़ का मतलब क्या है?
सुभाष चंद्रा के स्पष्टीकरण का सबसे अहम हिस्सा ₹22,000 करोड़ की रकम से जुड़ा है। उनका कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर बैंकों या वित्तीय संस्थानों से ₹22,000 करोड़ का कर्ज नहीं लिया था।
उनके अनुसार, करीब ₹22,000 करोड़ की पर्सनल गारंटी पर उनके हस्ताक्षर थे। लेकिन इस पूरी रकम को व्यक्तिगत रूप से उनके द्वारा लिया गया कर्ज समझना सही नहीं है।
चंद्रा के मुताबिक, इनमें से करीब ₹4,800 करोड़ की गारंटी उस समय दी गई थी, जब मूल कर्जदारों ने फंड हासिल किया था। बाकी गारंटियों पर उन्होंने डिफॉल्ट होने के बाद हस्ताक्षर किए थे।
इसी आधार पर उन्होंने अपने बयान में कहा कि उनका व्यक्तिगत कर्ज ₹0 है।
यहां पर्सनल लोन और पर्सनल गारंटी के बीच अंतर समझना जरूरी है। जब कोई व्यक्ति किसी कंपनी या अन्य कर्जदार के लोन की गारंटी देता है, तो डिफॉल्ट की स्थिति में उस गारंटी के तहत उसके ऊपर देनदारी आ सकती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि गारंटी देने वाले व्यक्ति ने खुद उतनी रकम उधार ली थी।
कर्जदारों को वास्तव में कितनी रकम मिली थी?
चंद्रा के बयान में पर्सनल गारंटी से जुड़े दावों का कर्जदाता-वार विवरण भी दिया गया है।
उनके अनुसार, जिन मूल कर्जदारों के लिए गारंटी दी गई थी, उन्हें कर्ज के रूप में कुल करीब ₹4,808 करोड़ मिले थे। इनमें से कर्जदारों ने पहले ही लगभग ₹3,803 करोड़ का भुगतान कर दिया था।
इस हिसाब से करीब ₹998 करोड़ की रकम बकाया रह गई थी।
हालांकि, पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स में कर्जदाताओं की तरफ से दाखिल किए गए दावों की रकम इससे काफी ज्यादा थी।
कर्जदाताओं ने कितने करोड़ का दावा किया?
बयान के अनुसार, कर्जदाताओं ने पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स में कुल करीब ₹5,311 करोड़ के क्लेम दाखिल किए थे।
इनमें से लगभग ₹1,049 करोड़ के दावों का भुगतान या निपटारा हो चुका था। चंद्रा की ओर से दिए गए मिलान के मुताबिक इसके बाद करीब ₹4,262 करोड़ की रकम बकाया रह गई।
इन दावों में कई बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान शामिल हैं। इनमें Indiabulls Housing Finance, Axis Bank Group, HDFC Group, Canara Bank, Edelweiss, Franklin Templeton, IndusInd Bank, LIC Housing Finance, RBL Bank और Union Bank जैसे नाम शामिल हैं।
चंद्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले जारी किए गए एक प्रेस बयान में बकाया रकम करीब ₹3,992 करोड़ बताई गई थी। बाद में आंकड़ा ₹4,262 करोड़ इसलिए हुआ क्योंकि कुछ खातों को पहले के आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया था। इन खातों से जुड़े पक्षों ने समाधान योजना के पक्ष या विपक्ष में वोट नहीं किया था।
मूल कर्ज से दावे की रकम अलग क्यों है?
इस मामले को समझने के लिए एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्सनल गारंटी कई संस्थाओं और कर्ज खातों से जुड़ी थी।
चंद्रा के बयान के अनुसार, कुछ मामलों में कर्जदाताओं ने दो, तीन या चार अलग-अलग संस्थाओं को फंड दिया था। इन संस्थाओं के कर्ज के रीपेमेंट की गारंटी चंद्रा की ओर से दी गई थी।
इसलिए पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स में सामने आने वाले कुल क्लेम को सीधे-सीधे सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिए गए कर्ज के बराबर नहीं माना जा सकता।
यही वह अंतर है जिस पर चंद्रा ने अपनी सफाई में सबसे ज्यादा जोर दिया है।
रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने संपत्ति का भी आकलन किया
बयान में NCLT की ओर से नियुक्त रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। चंद्रा के अनुसार, रिजॉल्यूशन प्लान तैयार करते समय उनकी संपत्ति और उपलब्ध फंड का आकलन किया गया था।
उन्होंने 2016 में संसद में घोषित अपनी संपत्ति का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक उस समय घोषित संपत्ति की कीमत करीब ₹39.08 करोड़ थी।
बाद में उनकी संपत्ति घटकर करीब ₹31.79 करोड़ रह गई। इसमें लगभग ₹25 करोड़ की आवासीय संपत्ति भी शामिल थी, जिसे गिरवी रखा गया था।
उनके बयान के मुताबिक इसके बाद करीब ₹6.79 करोड़ के लिक्विड एसेट बचे थे। लिक्विड एसेट का मतलब ऐसी संपत्ति से है जिसे अपेक्षाकृत आसानी से नकदी में बदला जा सकता है।
₹4,262 करोड़ के बकाये पर क्या कहा?
सुभाष चंद्रा ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने इस मामले को लेकर कर्ज लेने वालों से बातचीत की थी। उनका दावा है कि उन्होंने कर्जदाताओं के साथ मिलान के बाद सामने आने वाली ₹4,262 करोड़ की बकाया रकम का निपटारा करने का भरोसा दिया था।
उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी फंड, घरेलू फंड, NBFC और कॉरपोरेट संस्थाओं समेत कई अन्य स्रोतों से भी कर्ज लिया गया था।
उनके अनुसार, इन देनदारियों में से अधिकांश का निपटारा संबंधित कर्जदारों की तरफ से या तो किया जा चुका है या फिर उनकी समाधान प्रक्रिया चल रही है। कुछ मामलों में पर्याप्त संपत्ति का बैकअप भी मौजूद है।
विवाद में सबसे अहम बात क्या है?
सुभाष चंद्रा की सफाई का मुख्य बिंदु यही है कि ₹22,000 करोड़ को उनका व्यक्तिगत कर्ज बताना सही नहीं है। यह रकम उन पर्सनल गारंटियों की कुल राशि से जुड़ी है, जिन पर उन्होंने अलग-अलग कर्जदारों के लिए हस्ताक्षर किए थे।
वहीं, उनके बयान में मूल रूप से प्राप्त कर्ज, चुकाई गई रकम, कर्जदाताओं के क्लेम और मौजूदा बकाये के अलग-अलग आंकड़े दिए गए हैं।
इसलिए ₹22,000 करोड़ की गारंटी और करीब ₹4,262 करोड़ के बकाये को एक ही रकम समझना सही नहीं होगा। चंद्रा ने अपने बयान के जरिए इसी अंतर को स्पष्ट करने की कोशिश की है।
नोट: पर्सनल गारंटी, क्लेम और इनसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स से जुड़े आंकड़े सुभाष चंद्रा द्वारा जारी स्पष्टीकरण में बताए गए हैं। इन आंकड़ों को उनके बयान के संदर्भ में समझना चाहिए।


