नई दिल्ली: भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की कोशिशों के बीच देश के BIS Certification और Quality Control Order (QCO) सिस्टम को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा सर्टिफिकेशन व्यवस्था कई विदेशी कंपनियों के लिए जटिल और महंगी साबित हो रही है। इसका असर भारत में निवेश और मैन्युफैक्चरिंग विस्तार की योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
GTRI ने खास तौर पर जापानी कंपनियों की चिंताओं का हवाला देते हुए कहा कि भारत के QCO फ्रेमवर्क में व्यापक सुधार की जरूरत है। थिंक टैंक ने यह भी कहा कि केवल हाई-टेक इंडस्ट्री को कुछ राहत देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। पूरे सर्टिफिकेशन मॉडल को जोखिम के आधार पर दोबारा तैयार करने की जरूरत है।
जापानी कंपनियों ने BIS नियमों पर जताई चिंता
GTRI की रिपोर्ट के मुताबिक, जापान एक्सटर्नल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (JETRO) के वित्त वर्ष 2025 के सर्वे में 71.9% जापानी मैन्युफैक्चरर्स ने कहा कि BIS सर्टिफिकेशन का उनके कारोबार पर असर पड़ा है या भविष्य में पड़ने की आशंका है।
मैन्युफैक्चरिंग के कुछ अहम क्षेत्रों में यह चिंता और ज्यादा दिखाई दी। सर्वे में 92.3% जनरल-मशीनरी कंपनियों और 76.8% ट्रांसपोर्टेशन-इक्विपमेंट कंपनियों ने BIS से जुड़ी दिक्कतों का उल्लेख किया।
GTRI के अनुसार, प्रभावित कंपनियों में बड़ी संख्या ने इन समस्याओं को गंभीर या बेहद गंभीर बताया। कंपनियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी सर्टिफिकेशन की लंबी प्रक्रिया, दस्तावेजों की जटिलता और यह स्पष्ट न होना है कि किसी उत्पाद के लिए सर्टिफिकेशन वास्तव में जरूरी है या नहीं।
विदेशी कंपनियों पर बढ़ रही लागत
BIS सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में उत्पादों की टेस्टिंग, कई तरह के दस्तावेज और जरूरत पड़ने पर विदेशी फैक्ट्रियों का निरीक्षण शामिल हो सकता है। समस्या तब बढ़ जाती है जब किसी कंपनी के उत्पाद पहले से ही जापानी या अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों, लेकिन भारत में उन्हें अलग से सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़े।
इससे कंपनियों को टेस्टिंग, कंसल्टेंसी, इंस्पेक्शन और अन्य अनुपालन लागत उठानी पड़ सकती है। GTRI ने चेतावनी दी है कि ऐसी व्यवस्था भारत में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियों के लिए अतिरिक्त बाधा बन सकती है।
इसका असर सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ जापानी कंपनियों को अपने सप्लायर बदलने पड़े क्योंकि विदेशी सप्लायर छोटे ऑर्डर के लिए भारत-विशिष्ट सर्टिफिकेशन प्रक्रिया अपनाने के लिए तैयार नहीं थे।
42.7% कंपनियों को बिक्री और डिलीवरी में परेशानी
JETRO के सर्वे में शामिल प्रभावित कंपनियों में 42.7% बिजनेस ने बिक्री रुकने या डिलीवरी में देरी जैसी समस्याओं का सामना करने की बात कही।
कुछ कंपनियों ने ऐसे आयात के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) हासिल करने में भी मुश्किलें बताईं, जिन्हें पहले पूर्ण सर्टिफिकेशन के बिना मंजूरी मिल चुकी थी।
GTRI का कहना है कि इस तरह की अनिश्चितता खास तौर पर छोटी और मध्यम भारतीय कंपनियों यानी MSME के लिए ज्यादा नुकसानदेह हो सकती है। बड़ी कंपनियां अतिरिक्त अनुपालन लागत वहन कर सकती हैं, लेकिन छोटे कारोबारों के लिए यही लागत प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती है।
हाई-टेक कंपनियों को राहत से पूरी समस्या हल नहीं होगी
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 25 अगस्त को टोक्यो में कहा था कि भारत हाई-टेक इंडस्ट्रीज के लिए अनिवार्य क्वालिटी सर्टिफिकेशन को आसान बनाने या हटाने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करेगा।
GTRI ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही कहा है कि केवल हाई-टेक सेक्टर को छूट देने से मौजूदा सिस्टम की बुनियादी समस्याएं दूर नहीं होंगी।
थिंक टैंक के मुताबिक, अगर सर्टिफिकेशन मॉडल ही अनुपयुक्त है तो किसी एक सेक्टर को राहत देना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे QCO सिस्टम की समीक्षा जरूरी है।
₹60 लाख खर्च करने के बाद भी नहीं मिला अंतिम फैसला
GTRI ने मौजूदा व्यवस्था की संभावित लागत को समझाने के लिए वियतनाम की एक स्क्रू बनाने वाली कंपनी का उदाहरण दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस कंपनी ने BIS द्वारा नामित लैब में टेस्टिंग पर करीब ₹20 लाख खर्च किए। इसके अलावा कंसल्टेंसी, इंस्पेक्शन और अन्य संबंधित प्रक्रियाओं पर करीब ₹40 लाख खर्च हुए। यानी कंपनी का कुल खर्च लगभग ₹60 लाख पहुंच गया।
इसके बावजूद प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी कंपनी को BIS का अंतिम निर्णय नहीं मिला।
GTRI का कहना है कि ऐसी परिस्थितियां क्वालिटी एश्योरेंस व्यवस्था को एक महंगे और अनिश्चित लाइसेंसिंग सिस्टम में बदलने का जोखिम पैदा करती हैं।
यूरोप की तरह रिस्क-बेस्ड मॉडल अपनाने की सलाह
GTRI ने भारत को यूरोपीय संघ की तर्ज पर रिस्क-बेस्ड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क अपनाने की सलाह दी है।
इस मॉडल में हर उत्पाद के लिए सरकार से पहले से सर्टिफिकेशन लेने की जरूरत नहीं होती। कई उत्पादों के मामले में निर्माता खुद यह घोषणा कर सकते हैं कि उनका सामान निर्धारित मानकों का पालन करता है। इसके बाद रेगुलेटर बाजार की निगरानी और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
GTRI का सुझाव है कि भारत में भी पहले अनिवार्य टेस्टिंग, रजिस्ट्रेशन और फैक्टरी इंस्पेक्शन केवल उन उत्पादों के लिए रखा जाए जिनसे स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण या राष्ट्रीय सुरक्षा को वास्तविक जोखिम हो।
कम जोखिम वाले उत्पादों के लिए कंपनियों को नियमों के पालन की घोषणा करने की अनुमति दी जा सकती है। अगर बाजार में कोई उत्पाद मानकों का उल्लंघन करता पाया जाता है तो रेगुलेटर जांच और जुर्माने के जरिए कार्रवाई कर सकते हैं।
डबल सर्टिफिकेशन से भी परेशानी
GTRI ने डबल सर्टिफिकेशन की व्यवस्था पर भी चिंता जताई है। यह समस्या खास तौर पर स्टील जैसे क्षेत्रों में सामने आती है, जहां QCO की जरूरतें इनपुट और तैयार उत्पाद दोनों पर अलग-अलग लागू हो सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह की जरूरत को सितंबर 2026 तक के लिए निलंबित किया गया है। GTRI का सुझाव है कि ऐसी छूट को स्थायी बनाया जाना चाहिए। थिंक टैंक ने मशीनरी और कुछ औद्योगिक इनपुट के लिए भी स्थायी छूट की मांग की है।
QCO के बाहर के उत्पादों के लिए भी नियम सरल हों
GTRI ने उन उत्पादों से जुड़े नियमों पर भी सवाल उठाए हैं जो QCO के दायरे में नहीं आते।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में ऐसे उत्पादों के लिए NOC की जरूरत खत्म किए जाने के बाद भी अलग से छूट वाली सूची का इस्तेमाल किया जा रहा है। समस्या यह है कि QCO से बाहर होने वाले हर उत्पाद का नाम इस सूची में शामिल नहीं होता।
इसके कारण इंपोर्टर्स को अतिरिक्त मंजूरी लेने की जरूरत पड़ सकती है। इससे न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि सामान की डिलीवरी में भी देरी हो सकती है।
GTRI का सुझाव है कि जो उत्पाद QCO के दायरे में नहीं हैं, उन्हें किसी अलग छूट सूची में शामिल करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। ऐसे उत्पादों को ऑटोमैटिक रूप से मंजूरी मिलनी चाहिए।
जूते और फर्नीचर जैसे उत्पादों पर भी सवाल
थिंक टैंक ने फुटवियर और फर्नीचर जैसे रोजमर्रा के उत्पादों पर अनिवार्य सर्टिफिकेशन लागू करने के तर्क पर भी सवाल उठाया है।
GTRI का कहना है कि ऐसे उत्पादों में हर मामले में अनिवार्य सरकारी सर्टिफिकेशन लगाने से लागत बढ़ सकती है। इसका सीधा असर MSME और अंततः ग्राहकों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई ऐसे उत्पादों में क्वालिटी, डिजाइन और आराम जैसे पहलुओं को तय करने में बाजार में प्रतिस्पर्धा और ग्राहक की पसंद ज्यादा प्रभावी भूमिका निभा सकती है।
दूसरे देश भी अपनाएं ऐसे नियम तो बढ़ेगा एक्सपोर्ट का खर्च
GTRI ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर भारत में लागू सर्टिफिकेशन व्यवस्था का स्वरूप दूसरे देश भी अपनाने लगते हैं तो इसका असर भारतीय एक्सपोर्टर्स पर पड़ सकता है।
भारतीय कंपनियों को अलग-अलग देशों के लिए अलग सर्टिफिकेशन, टेस्टिंग और इंस्पेक्शन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ सकता है, भले ही उनके उत्पाद पहले से अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करते हों।
इससे टेस्टिंग और लाइसेंसिंग फीस के अलावा विदेशी निरीक्षण के लिए यात्रा और रहने का खर्च भी बढ़ सकता है। नतीजतन भारतीय उत्पादों की एक्सपोर्ट लागत बढ़ने और शिपमेंट में देरी होने की आशंका रहेगी।
भारत के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्य के लिए क्यों जरूरी है सुधार?
भारत ‘मेक इन इंडिया’ और ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करना चाहता है। ऐसे में रेगुलेटरी सिस्टम का सरल, पारदर्शी और जोखिम-आधारित होना बेहद महत्वपूर्ण है।
GTRI ने QCO फ्रेमवर्क की उच्च-स्तरीय समीक्षा की मांग करते हुए कहा है कि क्वालिटी रेगुलेशन का उद्देश्य उपभोक्ताओं की सुरक्षा और उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि अनजाने में आयात पर रोक या लाइसेंसिंग बाधा पैदा करना।
थिंक टैंक के अनुसार, अगर बड़े स्तर पर सुधार नहीं किए गए तो मौजूदा व्यवस्था MSME पर दबाव बढ़ा सकती है, उत्पादों की कीमत बढ़ा सकती है और विदेशी कंपनियों के लिए भारत में मैन्युफैक्चरिंग निवेश का आकर्षण कम कर सकती है।
भारत को अगर वास्तव में ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है, तो क्वालिटी और रेगुलेशन के बीच संतुलन बनाना होगा। सुरक्षा से जुड़े उत्पादों पर कड़े मानक जरूरी हैं, लेकिन कम जोखिम वाले उत्पादों के लिए आसान अनुपालन व्यवस्था निवेश और व्यापार को गति दे सकती है।


