Monsoon & Kharif Crops: देश में मानसून की शुरुआती सुस्ती के बाद खरीफ फसलों की बुआई की रफ्तार में तेजी आई है। 14 अगस्त तक खरीफ फसलों की बुआई का अंतर घटकर महज 2 फीसदी रह गया है। हालांकि धान का रकबा अभी भी चिंता बढ़ा रहा है। जानिए बारिश, बुआई, उत्पादन, खाद्य आपूर्ति और महंगाई पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
देश में इस साल मानसून की शुरुआत खेती-किसानी के लिए चुनौतीपूर्ण रही। जून में बारिश सामान्य से काफी कम रहने के कारण खरीफ फसलों की बुआई की रफ्तार प्रभावित हुई थी। जून में देश में बारिश करीब 40 फीसदी तक कम रही, जो पिछले कई वर्षों में सबसे कमजोर शुरुआत में से एक थी। इससे किसानों के सामने बुआई में देरी और फसल उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई थी।
हालांकि जुलाई में बारिश की स्थिति सुधरी और इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुआई पर दिखाई दिया। अब कृषि क्षेत्र से राहत भरी खबर सामने आ रही है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 14 अगस्त तक देश में खरीफ फसलों की बुआई करीब 101.7 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि की तुलना में यह रकबा करीब 2 फीसदी ही कम है।
यानी जून में जो बड़ा गैप दिखाई दे रहा था, वह काफी हद तक कम हो गया है। लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, क्योंकि खरीफ की सबसे महत्वपूर्ण फसल धान की बुआई और रोपाई अभी भी पिछले साल के मुकाबले पीछे चल रही है।
खरीफ फसलों की बुआई का गैप घटकर सिर्फ 2 फीसदी
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 14 अगस्त तक किसानों ने करीब 101.7 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर खरीफ फसलों की बुआई कर ली थी। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग 2 फीसदी कम है।
जून में मानसून की कमजोर शुरुआत के कारण बुआई में काफी पिछड़ापन देखने को मिला था। लेकिन जुलाई में बारिश सामान्य रहने से किसानों को खेतों में नमी मिली और बुआई का काम तेजी से आगे बढ़ा।
कृषि सचिव आतिश चंद्रा के मुताबिक जून के बाद बुआई की रफ्तार में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। दलहन, तिलहन और कपास जैसी कई प्रमुख खरीफ फसलों का प्रदर्शन संतोषजनक बताया जा रहा है।
इसका मतलब यह है कि शुरुआती मानसूनी कमजोरी के बावजूद किसानों ने उपलब्ध समय का इस्तेमाल करते हुए बुआई के अंतर को काफी कम कर दिया है।
अगस्त और सितंबर की बारिश क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
भारत में खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। दक्षिण-पश्चिम मानसून जून से सितंबर के बीच देश में होने वाली कुल बारिश का बड़ा हिस्सा लेकर आता है। यही बारिश खेतों में नमी बनाए रखने के साथ-साथ जलाशयों और भूजल स्तर को भी रिचार्ज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
खरीफ सीजन के लिए अगस्त और सितंबर की बारिश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान कई फसलों की बढ़वार और उत्पादन की स्थिति तय होती है।
17 अगस्त तक देश में संचयी मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 13 फीसदी कम बताई गई है। ऐसे में अब आगे होने वाली बारिश पर किसानों के साथ-साथ सरकार और खाद्य बाजार की भी नजर रहेगी।
अगर अगस्त और सितंबर में बारिश पर्याप्त रहती है तो खरीफ फसलों के उत्पादन को काफी हद तक सहारा मिल सकता है। इसके उलट अगर मानसून दोबारा कमजोर पड़ता है या बारिश का वितरण असमान रहता है, तो कुछ राज्यों में उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
धान का रकबा अभी भी दे रहा टेंशन
खरीफ सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसलों में धान शामिल है। देश के खाद्य सुरक्षा तंत्र में धान की बड़ी भूमिका है। इसलिए धान के रकबे में कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस समय धान की बुआई और रोपाई पिछले साल की तुलना में पीछे चल रही है। यही वजह है कि कुल खरीफ रकबे में सुधार के बावजूद धान को लेकर चिंता बनी हुई है।
हालांकि कृषि मंत्रालय का मानना है कि अभी स्थिति को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। कई राज्यों में किसानों के पास अगस्त के अंत तक और कुछ क्षेत्रों में सितंबर तक भी धान की रोपाई का समय मौजूद है।
इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह धान के लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। पर्याप्त बारिश और अनुकूल मौसम मिलने पर धान के रकबे में और सुधार संभव है।
दलहन, तिलहन और कपास से मिली राहत
खरीफ सीजन में सिर्फ धान ही महत्वपूर्ण नहीं है। दलहन, तिलहन और कपास जैसी फसलों की बुआई भी कृषि क्षेत्र और अर्थव्यवस्था के लिए अहम है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन फसलों की बुआई की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई दे रही है। अगर इन फसलों का रकबा और उत्पादन सामान्य रहता है तो इससे घरेलू बाजार में खाद्य तेल, दालों और अन्य कृषि उत्पादों की सप्लाई को सहारा मिल सकता है।
खास तौर पर दलहन और तिलहन की पर्याप्त घरेलू पैदावार आयात पर निर्भरता को कम करने में मदद कर सकती है।
खेती पर मानसून का असर सीधे महंगाई से जुड़ा है
मानसून का असर सिर्फ किसानों की कमाई तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा संबंध देश में खाद्य पदार्थों की कीमतों से भी है।
अगर बारिश अच्छी रहती है और खरीफ फसलों का उत्पादन बेहतर रहता है तो बाजार में अनाज, दाल, तिलहन और अन्य कृषि उत्पादों की पर्याप्त सप्लाई बनी रहती है। पर्याप्त सप्लाई से कीमतों पर दबाव कम रहता है।
इसके उलट अगर बारिश कमजोर रहती है और उत्पादन घटता है तो सप्लाई कम हो सकती है। ऐसे में बाजार में कीमतें बढ़ने का जोखिम रहता है और खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
यही वजह है कि सरकार इस समय मानसून और फसल बुआई की स्थिति पर लगातार नजर रख रही है।
चीनी बाजार भी दे रहा संकेत
घरेलू कृषि बाजार पर मानसून के असर को समझने के लिए चीनी बाजार भी महत्वपूर्ण है। भारत में घरेलू आपूर्ति और कीमतों को संतुलित रखने के लिए सरकार समय-समय पर आयात और निर्यात नीति में बदलाव करती है।
चीनी के आयात शुल्क में कटौती पर विचार किए जाने की खबर भी इसी व्यापक खाद्य आपूर्ति और कीमत प्रबंधन की ओर संकेत करती है। अगर किसी कृषि जिंस की घरेलू उपलब्धता कम होती है और कीमतों पर दबाव बढ़ता है, तो सरकार आयात नीति के जरिए बाजार में सप्लाई बढ़ाने का प्रयास कर सकती है।
किसानों के लिए आगे की राह क्या है?
फिलहाल खरीफ सीजन की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। जून की कमजोर शुरुआत के बाद जुलाई में बारिश और बुआई में सुधार ने किसानों को राहत दी है। कुल खरीफ बुआई का अंतर अब सिर्फ 2 फीसदी के आसपास रह गया है।
लेकिन आने वाले सप्ताह बेहद अहम हैं। खासकर धान के रकबे में सुधार, अगस्त-सितंबर की बारिश और बारिश के क्षेत्रवार वितरण पर नजर रहेगी।
अगर मानसून बाकी सीजन में सामान्य रहता है तो खरीफ उत्पादन में शुरुआती कमजोरी की भरपाई संभव है। इससे किसानों को राहत मिलने के साथ-साथ खाद्य वस्तुओं की सप्लाई और कीमतों को भी सहारा मिल सकता है।
दूसरी ओर, अगर बारिश में दोबारा कमी आती है या कुछ प्रमुख कृषि राज्यों में लंबे समय तक सूखे जैसे हालात बनते हैं, तो धान समेत कुछ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
निष्कर्ष
इस साल मानसून ने शुरुआत में किसानों को परेशान किया, लेकिन जुलाई के बाद स्थिति में सुधार ने उम्मीद जगाई है। 14 अगस्त तक खरीफ फसलों की बुआई 101.7 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंचना और पिछले साल से अंतर का घटकर 2 फीसदी रह जाना सकारात्मक संकेत है।
फिर भी धान का पिछड़ता रकबा और सामान्य से कम संचयी बारिश चिंता के दो प्रमुख कारण हैं। इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि खरीफ की बुआई कितनी हुई, बल्कि यह है कि अगस्त और सितंबर में मानसून कैसा रहता है और धान समेत प्रमुख फसलों को कितना पानी मिलता है।
अगर बारिश सामान्य रही तो इस सीजन में उत्पादन और खाद्य महंगाई दोनों मोर्चों पर राहत मिल सकती है। वहीं मानसून कमजोर पड़ने पर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों को लेकर नई चुनौती खड़ी हो सकती है।


