Balochistan Human Rights Crisis: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ह्यूमन राइट्स काउंसिल ऑफ बलूचिस्तान (HRCB) की रिपोर्टों में जबरन गुमशुदगी, हत्याओं और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई के कई मामले दर्ज किए गए हैं। संगठन की 2025 की रिपोर्टिंग के मुताबिक, साल के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने और मारे जाने के मामले सामने आए। हालांकि, इन आंकड़ों को HRCB द्वारा दर्ज और दस्तावेज किए गए मामलों के रूप में देखना चाहिए, न कि पाकिस्तान सरकार द्वारा स्वीकार किए गए आधिकारिक आंकड़ों के तौर पर।
2025 में जबरन गुमशुदगी के मामलों में बड़ा उछाल
HRCB की जनवरी-जून 2025 की बायएनुअल रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ पहले छह महीनों में ही 814 लोगों के जबरन गायब होने के मामले दर्ज किए गए थे। संगठन ने इसकी तुलना पूरे 2024 में दर्ज 830 मामलों से की थी। यानी 2025 की पहली छमाही में ही आंकड़ा पिछले पूरे साल के स्तर के बेहद करीब पहुंच गया था।
HRCB के मुताबिक, इन मामलों में छात्र, राजनीतिक कार्यकर्ता, मजदूर और आम नागरिक शामिल रहे। संगठन का आरोप है कि कई लोगों को घरों या सार्वजनिक स्थानों से हिरासत में लिया गया और बाद में उनके परिवारों को उनकी स्थिति या ठिकाने की जानकारी नहीं दी गई।
साल के अलग-अलग महीनों की HRCB रिपोर्टों में भी गुमशुदगी का सिलसिला जारी रहने की बात कही गई। उदाहरण के लिए, जुलाई 2025 में 112 जबरन गुमशुदगी के मामले दर्ज किए गए, जबकि अगस्त में 123 और सितंबर में 104 मामले रिपोर्ट किए गए।
हत्याओं का आंकड़ा भी चिंता बढ़ाने वाला
गुमशुदगी के साथ-साथ बलूचिस्तान में हत्या और कथित न्यायेतर हत्याओं के मामलों को लेकर भी HRCB ने चिंता जताई है। उसकी जनवरी-जून 2025 की रिपोर्ट में कम से कम 131 हत्याओं का जिक्र किया गया था। संगठन ने इनमें हिरासत में मौत, कथित फर्जी मुठभेड़ और सैन्य अभियानों के दौरान हुई मौतों को शामिल किया।
HRCB की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, उस साल संगठन ने 830 जबरन गुमशुदगी और 480 मौतों को दस्तावेज किया था। संगठन ने यह भी कहा था कि सूचना पर प्रतिबंध, मीडिया सेंसरशिप और प्रभावित परिवारों के डर के कारण वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
यहां यह समझना जरूरी है कि बलूचिस्तान में हिंसा की तस्वीर को लेकर अलग-अलग संगठनों के आंकड़े एक जैसे नहीं हैं। उदाहरण के लिए, Baloch Advocacy and Support Committee (BASC) ने 2025 में 1,395 जबरन गुमशुदगी और 194 न्यायेतर हत्याओं को दस्तावेज करने की बात कही है। वहीं अन्य बलूच अधिकार संगठनों ने अलग-अलग आंकड़े जारी किए हैं।
इसलिए किसी एक संगठन के आंकड़े को पूरे प्रांत में हुई हिंसा का अंतिम और निर्विवाद सरकारी आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा। लेकिन अलग-अलग रिपोर्टों में गुमशुदगी और हिंसा के बड़े पैमाने पर दर्ज होने की बात जरूर सामने आती है।
बच्चे भी नहीं रहे हिंसा से अछूते
बलूचिस्तान की स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में बच्चों के प्रभावित होने की भी बात सामने आई है।
HRCB की 2025 की पहली छमाही की रिपोर्ट में 13 वर्षीय नेहमत बलूच की मौत का जिक्र किया गया था। संगठन के अनुसार, एक शांतिपूर्ण धरने पर पुलिस कार्रवाई के दौरान तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हुई, जिनमें नेहमत भी शामिल था।
बच्चों और नाबालिगों से जुड़े मामलों को लेकर अन्य बलूच मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई है। BASC की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, उसके दस्तावेज किए गए मामलों में महिलाएं और स्कूली उम्र के बच्चे भी जबरन गुमशुदगी से प्रभावित हुए।
फ्रंटियर कोर और सुरक्षा एजेंसियों पर गंभीर आरोप
बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी और हिंसा के मामलों में पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका सबसे बड़ा विवादित मुद्दा है। HRCB की रिपोर्टों में फ्रंटियर कोर (FC), काउंटर-टेररिज्म डिपार्टमेंट (CTD), खुफिया एजेंसियों और अन्य राज्य-संबद्ध समूहों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
जुलाई 2025 की HRCB रिपोर्ट के अनुसार, 112 गुमशुदगी के मामलों में से कई में FC, CTD, खुफिया एजेंसियों और कथित राज्य समर्थित समूहों की भूमिका का आरोप लगाया गया था। उसी महीने संगठन ने 49 मौतों की भी रिपोर्ट की थी।
हालांकि, इन आरोपों को पाकिस्तान सरकार या संबंधित सुरक्षा एजेंसियों की ओर से स्वीकार किया गया हो, ऐसा इन रिपोर्टों से स्थापित नहीं होता। यही वजह है कि बलूचिस्तान में मानवाधिकार मामलों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की मांग लगातार उठती रही है।
पत्रकारों और कार्यकर्ताओं पर भी दबाव
बलूचिस्तान में सिर्फ आम नागरिक ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील और राजनीतिक कार्यकर्ता भी कथित दमन का सामना करने की बात कहते रहे हैं।
HRCB ने 2025 में बलूच यकजेहती कमेटी (BYC) के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी चिंता जताई। संगठन के मुताबिक, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, उनके खिलाफ मामले दर्ज करने, प्रदर्शनकारियों को हटाने और उनके समर्थकों के घरों पर कार्रवाई जैसी घटनाएं सामने आईं।
इस पूरे विवाद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सवाल भी महत्वपूर्ण बन जाता है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
पाकिस्तान के लिए क्यों बढ़ रही है चुनौती?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों से भी समृद्ध माना जाता है। इसके बावजूद यहां लंबे समय से राजनीतिक असंतोष, आर्थिक पिछड़ापन, संसाधनों पर नियंत्रण, सुरक्षा अभियानों और अलगाववादी हिंसा को लेकर तनाव बना हुआ है।
एक तरफ पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान बलूचिस्तान में आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई को सुरक्षा की जरूरत बताते हैं। दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठन आरोप लगाते हैं कि सुरक्षा के नाम पर आम नागरिकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और असहमति रखने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाती है।
यही विरोधाभास बलूचिस्तान संकट को और जटिल बनाता है। क्षेत्र में बलूच उग्रवादी संगठनों द्वारा हिंसक हमले भी होते रहे हैं, जबकि राज्य की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आते हैं। ऐसे माहौल में सबसे ज्यादा प्रभावित आम नागरिक और उनके परिवार होते हैं।
क्या ये पाकिस्तान का ‘खूनी खेल’ है?
बलूचिस्तान में सामने आ रहे आंकड़े निश्चित रूप से गंभीर चिंता पैदा करते हैं। अगर किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग बिना स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के लापता होते हैं और उनके परिवारों को लंबे समय तक जानकारी नहीं मिलती, तो यह मानवाधिकार और कानून के शासन से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।
लेकिन इसे सीधे तौर पर ‘पाकिस्तान का खूनी खेल’ घोषित करने से पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध आंकड़े मुख्य रूप से मानवाधिकार संगठनों द्वारा दस्तावेज किए गए मामले हैं। अलग-अलग संगठनों के आंकड़ों में अंतर भी है। इसलिए सबसे जरूरी जरूरत स्वतंत्र जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही की है।
HRCB की रिपोर्टों से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि बलूचिस्तान में जबरन गुमशुदगी और हिंसा का मुद्दा खत्म नहीं हुआ है। बल्कि 2025 के दौरान कई महीनों में बड़ी संख्या में नए मामले दर्ज किए गए। 2026 में भी HRCB ने गुमशुदगी और हत्याओं के मामले जारी रहने की रिपोर्ट दी है। जून 2026 के लिए संगठन ने 63 जबरन गुमशुदगी और 77 हत्याओं के मामले दर्ज किए।
परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल—लापता लोग कहां हैं?
बलूचिस्तान संकट का सबसे मानवीय पहलू उन परिवारों की पीड़ा है जिनके सदस्य अचानक गायब हो जाते हैं। कई परिवार वर्षों तक अपने प्रियजनों के बारे में जानकारी का इंतजार करते हैं। किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी, हिरासत या मौत की आधिकारिक जानकारी न मिलने से परिवार कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर संघर्ष करते हैं।
इसीलिए मानवाधिकार संगठनों की सबसे प्रमुख मांगों में लापता लोगों का पता लगाना, हिरासत में लिए गए लोगों को कानूनी अधिकार देना, कथित गैरकानूनी हिरासत की जांच और मौत के मामलों में जवाबदेही तय करना शामिल है।
बलूचिस्तान में जारी संकट अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक सुरक्षा मामला नहीं रह गया है। जबरन गुमशुदगी, कथित न्यायेतर हत्याओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कार्रवाई के आरोपों ने इसे एक गंभीर मानवाधिकार मुद्दा बना दिया है। आगे की स्थिति इस बात पर काफी निर्भर करेगी कि पाकिस्तान इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और जवाबदेही के लिए क्या कदम उठाता है।


