भारत में मानसून पर अल-नीनो का खतरा बढ़ता नजर आ रहा है। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने आशंका जताई है कि अल-नीनो के मजबूत होने से मानसूनी बारिश कमजोर पड़ सकती है। इसका असर कृषि उत्पादन, खाद्य कीमतों और हाइड्रोपावर उत्पादन पर देखने को मिल सकता है। हालांकि, अगर मौसम की स्थिति बहुत ज्यादा खराब नहीं होती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर सीमित रहने की उम्मीद है।
भारत के लिए मानसून सिर्फ बारिश का मौसम नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार से जुड़ा एक अहम फैक्टर है। देश की बड़ी आबादी आज भी खेती और उससे जुड़े कारोबार पर निर्भर है। ऐसे में बारिश में बड़ी कमी होने पर इसका असर खेतों से लेकर बाजार और आम परिवारों के बजट तक दिखाई दे सकता है।
12% कम हुई बारिश, अगस्त में भी सुस्त रह सकता है मानसून
भारत में मानसून की स्थिति फिलहाल चिंता बढ़ाने वाली है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 11 अगस्त तक 2026 के मानसून सीजन में बारिश सामान्य से करीब 12 फीसदी कम रही है। वहीं, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने आने वाले हफ्तों में पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी हिस्सों में मानसून कमजोर पड़ने की आशंका जताई है।
भारत में सालाना होने वाली कुल बारिश का लगभग 70 फीसदी हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से मिलता है। खेती के लिए इसका महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश की करीब आधी कृषि भूमि में पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में बारिश कम होने पर किसान सीधे प्रभावित हो सकते हैं।
अल-नीनो क्या है और भारत के मानसून पर इसका असर क्यों पड़ता है?
अल-नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी मौसम संबंधी स्थिति है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।
भारत में ऐतिहासिक तौर पर अल-नीनो की स्थिति को कमजोर या अनिश्चित मानसून से जोड़कर देखा जाता रहा है। हालांकि, हर अल-नीनो के दौरान भारत में बारिश एक जैसी नहीं रहती। इसका असर उसकी तीव्रता, अवधि और दूसरे मौसमी कारकों पर निर्भर करता है।
इसी वजह से अल-नीनो को मानसून के लिए एक जोखिम माना जाता है, लेकिन इसे कम बारिश की पक्की गारंटी नहीं कहा जा सकता।
दालों, सोयाबीन और मक्के की पैदावार पर पड़ सकता है असर
अगर बारिश में कमी लंबे समय तक जारी रहती है तो इसका सबसे पहला और सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। दालों, सोयाबीन, कपास और मक्के जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।
इस सीजन में किसानों को पहले ही कई इलाकों में असमान बारिश का सामना करना पड़ा है। जुलाई में हुई बेहतर बारिश ने शुरुआती कमजोर मानसून से हुए नुकसान की कुछ भरपाई जरूर की थी, लेकिन अगस्त में फिर से बारिश कमजोर रहने की आशंका ने जोखिम बढ़ा दिया है।
कृषि उत्पादन घटने का असर सिर्फ किसानों की आमदनी तक सीमित नहीं रहेगा। अगर बाजार में फसलों की सप्लाई कम होती है तो दाल, तेल और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
खाने-पीने की चीजें महंगी हुईं तो बढ़ेगी महंगाई
कम बारिश से अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता खाद्य महंगाई की हो सकती है। फसल उत्पादन घटने पर बाजार में सप्लाई कम हो सकती है, जबकि मांग सामान्य बनी रहती है। ऐसी स्थिति में कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बनना स्वाभाविक है।
एसएंडपी के मुताबिक भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र की उन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जहां खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू बजट पर तेजी से पड़ सकता है। इसका कारण यह है कि परिवारों के खर्च में भोजन की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है और कृषि अभी भी मौसम पर काफी निर्भर है।
अगर दाल, सब्जियां, खाद्य तेल या अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इसका असर लोगों की वास्तविक आय और खपत पर भी पड़ सकता है।
बिजली आपूर्ति और जलाशयों पर भी असर
कम बारिश का असर कृषि के अलावा बिजली क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। पर्याप्त बारिश नहीं होने से प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर कम रह सकता है। इससे हाइड्रोपावर उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है।
जिन राज्यों और क्षेत्रों में बिजली उत्पादन में जलविद्युत की महत्वपूर्ण भूमिका है, वहां इसका असर ज्यादा दिखाई दे सकता है। अगर हाइड्रोपावर उत्पादन घटता है तो बिजली की मांग पूरी करने के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ सकती है।
हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि जलाशयों में पानी का स्तर कितना रहता है और मानसून के बाकी हिस्से में कितनी बारिश होती है।
क्या कमजोर मानसून से भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा?
जरूरी नहीं। एसएंडपी का आकलन है कि मौसम से जुड़ा अस्थायी झटका अपने आप में भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बारिश कितनी कम होती है, कितने समय तक स्थिति बनी रहती है और सरकार इससे निपटने के लिए क्या कदम उठाती है।
भारत के पास पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बेहतर सिंचाई सुविधाएं, कृषि तकनीक और मौसम आधारित कृषि प्रबंधन के विकल्प मौजूद हैं। इसके अलावा खाद्य सुरक्षा के लिए सरकारी भंडार भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
भारत के पास चावल का पर्याप्त स्टॉक
कम बारिश से जुड़े जोखिमों के बावजूद भारत के पास खाद्य आपूर्ति में अचानक आने वाले झटके से निपटने के लिए कुछ मजबूत सुरक्षा उपाय हैं। देश के पास चावल का पर्याप्त सरकारी स्टॉक मौजूद है, जिससे जरूरत पड़ने पर घरेलू बाजार में सप्लाई को संभालने में मदद मिल सकती है।
पिछले अल-नीनो दौर की तुलना में खेती के तरीकों, सिंचाई और फसल तकनीक में भी सुधार हुआ है। इससे कमजोर मानसून के संभावित प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
आम लोगों के लिए क्या है सबसे बड़ा जोखिम?
आम परिवारों के लिए फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी है। अगर बारिश और कमजोर होती है और प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है, तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
इसका असर खास तौर पर कम और मध्यम आय वाले परिवारों पर ज्यादा पड़ सकता है, क्योंकि उनकी आय का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा खाने-पीने और जरूरी सामान पर खर्च होता है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल-नीनो भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका देगा। आने वाले हफ्तों की बारिश, फसल उत्पादन, जलाशयों में पानी का स्तर और सरकार की नीतिगत प्रतिक्रिया यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि मौसम का यह जोखिम कितना बड़ा आर्थिक दबाव बनता है।
निष्कर्ष: कमजोर मानसून से कृषि उत्पादन, खाद्य कीमतों और हाइड्रोपावर पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन पर्याप्त खाद्य भंडार, बेहतर कृषि तकनीक और सरकारी हस्तक्षेप के कारण भारत के पास इस तरह के मौसम संबंधी झटके से निपटने की क्षमता पहले की तुलना में बेहतर है। फिलहाल सबसे ज्यादा नजर अगस्त की बारिश और अल-नीनो की आगे की स्थिति पर रहेगी।


