Solar Panel Recycling Business: दुनियाभर में सोलर एनर्जी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ भविष्य में एक बड़ी चुनौती भी सामने आने वाली है—पुराने और खराब हो चुके सोलर पैनलों का निपटान। यही चुनौती आने वाले वर्षों में एक बड़े बिजनेस अवसर में बदल सकती है। एक रिसर्च के मुताबिक, 2060 तक दुनिया में सोलर पैनल से निकलने वाला कचरा 40 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। वहीं, इन पैनलों की रीसाइक्लिंग से सैकड़ों अरब डॉलर का आर्थिक फायदा संभव है।
नई दिल्ली: सोलर पावर को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्लीन एनर्जी स्रोतों में गिना जाता है। सरकारों और कंपनियों के साथ-साथ आम लोग भी तेजी से सोलर पैनल अपना रहे हैं। हालांकि, जैसे-जैसे पुराने सोलर पैनल अपनी उम्र पूरी करेंगे, उनके निपटान की समस्या भी बढ़ती जाएगी। यही वजह है कि Solar Panel Recycling आने वाले समय में एक बड़े और तेजी से बढ़ते उद्योग के रूप में उभर सकता है।
‘नेचर’ में प्रकाशित एक स्टडी में सोलर पैनलों से निकलने वाले भविष्य के कचरे और उससे मिलने वाले आर्थिक अवसर का अनुमान लगाया गया है। रिसर्च के मुताबिक, 2060 तक दुनियाभर में फोटोवोल्टिक (PV) कचरे की मात्रा करीब 29.7 करोड़ से 40.2 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। हालांकि, इस कचरे को सिर्फ समस्या मानने के बजाय इसमें छिपे आर्थिक अवसर को भी देखा जा रहा है।
89 लाख करोड़ रुपये तक का आर्थिक फायदा
रिसर्चर्स के अनुमान के मुताबिक, पुराने PV सिस्टम को रीसायकल करके 529.1 अरब डॉलर से 935.5 अरब डॉलर तक का आर्थिक फायदा हासिल किया जा सकता है। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 89 लाख करोड़ रुपये तक बैठती है।
यानी जिस सोलर पैनल को इस्तेमाल के बाद कबाड़ समझा जाएगा, वही भविष्य में अरबों डॉलर की सेकेंडरी रॉ मटीरियल इंडस्ट्री का हिस्सा बन सकता है। इसके अलावा रीसाइक्लिंग से करीब 3.32 अरब टन तक कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन को कम करने की क्षमता भी बताई गई है।
मानक सोलर पैनल आमतौर पर करीब 25 से 30 साल तक काम कर सकते हैं। पिछले कुछ दशकों में सोलर इंस्टॉलेशन में जिस तेजी से वृद्धि हुई है, उसका असर आने वाले वर्षों में PV वेस्ट की मात्रा पर दिखाई देगा।
2060 तक तेजी से बढ़ेगा सोलर पैनल कचरा
रिसर्च के मुताबिक, हर साल बेकार होने वाले PV पैनलों की मात्रा 2020 में करीब 0.2 लाख टन थी। इसके 2060 तक बढ़कर 1.9 करोड़ टन से ज्यादा प्रति वर्ष होने का अनुमान है।
सबसे ज्यादा सोलर पैनल वेस्ट चीन से आने की संभावना है। वहां कुल बेकार हार्डवेयर की मात्रा करीब 11.28 करोड़ से 16.05 करोड़ टन के बीच हो सकती है।
भारत भी इस मामले में एक बड़ा योगदानकर्ता बन सकता है। देश में 2060 तक करीब 2.68 करोड़ से 3.52 करोड़ टन PV कचरा पैदा होने का अनुमान लगाया गया है। यह वैश्विक कुल कचरे का करीब 8.6% से 9.2% हो सकता है।
पुराने सोलर पैनल में छिपे हैं कीमती मटीरियल
सोलर पैनलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें कई ऐसे मटीरियल मौजूद होते हैं जिनकी औद्योगिक मांग बनी हुई है। पुराने पैनलों से सिलिकॉन, सिल्वर, कॉपर और टेल्यूरियम जैसे मटीरियल को रिकवर किया जा सकता है।
इन मटीरियल को दोबारा इस्तेमाल करने से नए कच्चे माल पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे क्लीन-टेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक महत्वपूर्ण सेकेंडरी सप्लाई चेन तैयार हो सकती है।
हालांकि, हर सोलर पैनल पूरी तरह एक जैसा नहीं होता। कुछ मॉड्यूल में लेड और कैडमियम जैसे खतरनाक पदार्थ भी हो सकते हैं। इसलिए रीसाइक्लिंग सिर्फ मटीरियल निकालने का काम नहीं है, बल्कि सुरक्षित प्रोसेसिंग और पर्यावरणीय मानकों का पालन भी जरूरी होगा।
रीसाइक्लिंग की लागत में बड़ी गिरावट का अनुमान
आज सोलर पैनल रीसाइक्लिंग की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इसकी लागत है। लेकिन तकनीक और प्रोसेसिंग क्षमता में सुधार के साथ यह स्थिति बदल सकती है।
रिसर्चर्स के मुताबिक, PV रीसाइक्लिंग 2035 से 2040 के बीच आर्थिक रूप से फायदेमंद होने की स्थिति में पहुंच सकती है। अनुमान है कि प्रोसेसिंग लागत 2020 में करीब 342 से 2,550 डॉलर प्रति टन थी, जो 2040 तक घटकर लगभग 55.9 से 402.7 डॉलर प्रति टन रह सकती है।
अगर लागत इस स्तर तक आती है और साथ ही सिलिकॉन, सिल्वर, कॉपर जैसे मटीरियल की रिकवरी बेहतर होती है, तो पुराने सोलर पैनलों से मुनाफा कमाने का बिजनेस मॉडल और मजबूत हो सकता है।
थर्मल ट्रीटमेंट से मिल सकता है ज्यादा फायदा
स्टडी में अलग-अलग रीसाइक्लिंग तकनीकों के संभावित आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का भी आकलन किया गया। इसके मुताबिक, थर्मल ट्रीटमेंट को प्राथमिकता देने वाली प्रोसेसिंग तकनीकें आर्थिक लाभ और कार्बन उत्सर्जन में कमी, दोनों के लिहाज से बेहतर परिणाम दे सकती हैं।
हालांकि, किसी भी तकनीक की वास्तविक सफलता उसकी लागत, ऊर्जा खपत, रिकवरी रेट और पर्यावरणीय प्रभाव पर निर्भर करेगी। इसलिए भविष्य में ऐसी रीसाइक्लिंग तकनीक की जरूरत होगी जो ज्यादा से ज्यादा उपयोगी मटीरियल निकाल सके और कम से कम कचरा छोड़े।
भारत के लिए क्यों बड़ा मौका है?
भारत में सोलर एनर्जी क्षमता तेजी से बढ़ रही है। इसका मतलब यह भी है कि आने वाले दशकों में देश में बड़ी मात्रा में पुराने सोलर मॉड्यूल उपलब्ध होंगे।
यही स्थिति भारत में Solar Panel Recycling Business के लिए बड़ा अवसर पैदा कर सकती है। कंपनियां पुराने पैनलों को इकट्ठा करने, उन्हें अलग-अलग हिस्सों में तोड़ने, उपयोगी मटीरियल रिकवर करने और उन्हें दोबारा इंडस्ट्री को बेचने के बिजनेस में उतर सकती हैं।
इस पूरी चेन में सिर्फ रीसाइक्लिंग प्लांट ही नहीं, बल्कि कलेक्शन, लॉजिस्टिक्स, टेस्टिंग, मटीरियल रिकवरी और सेकेंडरी रॉ मटीरियल सप्लाई जैसे कई क्षेत्रों में नए कारोबार विकसित हो सकते हैं।
लेकिन आर्थिक फायदा सभी देशों को बराबर नहीं मिलेगा
इस संभावित ग्रीन इंडस्ट्री के सामने एक बड़ी चुनौती असमानता की भी है। जिन देशों में आधुनिक रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, पूंजी और तकनीक उपलब्ध है, उन्हें इस बाजार से ज्यादा आर्थिक फायदा मिलने की संभावना है।
इसके उलट कम आय वाले देशों में पुराने सोलर पैनलों को सिर्फ स्क्रैप के तौर पर एक्सपोर्ट करने की स्थिति बन सकती है। रिसर्च के मुताबिक, विकासशील क्षेत्र 2060 तक ग्लोबल आर्थिक लाभ का केवल 1.3% से 2.1% हिस्सा हासिल कर सकते हैं।
इसलिए केवल रीसाइक्लिंग प्लांट लगाना पर्याप्त नहीं होगा। विकासशील देशों को तकनीक, निवेश और प्रशिक्षित मानव संसाधन की भी जरूरत होगी।
सरकारों की भूमिका होगी अहम
रिसर्चर्स ने इस चुनौती से निपटने के लिए चरणबद्ध सब्सिडी मॉडल का सुझाव दिया है। इसके तहत शुरुआती दौर में सरकारें रीसाइक्लिंग उद्योग को आर्थिक मदद दे सकती हैं। जैसे-जैसे कंपनियां व्यावसायिक रूप से सफल होने लगें, सब्सिडी को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
इसके अलावा सरकारें पुराने सोलर पैनलों की रिकवरी के लिए रिकवरी कोटा तय कर सकती हैं। निजी निवेश को बढ़ावा देना, देशों के बीच तकनीक साझा करना और सिलिकॉन व सिल्वर जैसे महत्वपूर्ण मटीरियल की अधिकतम रिकवरी सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
कबाड़ नहीं, भविष्य का कच्चा माल
सोलर एनर्जी को बढ़ावा देने की दौड़ में अभी तक सबसे ज्यादा ध्यान नए पैनल बनाने और उन्हें लगाने पर रहा है। लेकिन अगले एक-दो दशकों में पुराने पैनलों की बढ़ती संख्या एक नए उद्योग की नींव रख सकती है।
अगर रीसाइक्लिंग की लागत घटती है, मटीरियल रिकवरी बेहतर होती है और सरकारें सही नीतियां बनाती हैं, तो पुराने सोलर पैनल भविष्य के महत्वपूर्ण कच्चे माल का स्रोत बन सकते हैं।
यही वजह है कि Solar Panel Recycling सिर्फ पर्यावरण बचाने की पहल नहीं रह जाएगी। यह आने वाले समय में सैकड़ों अरब डॉलर का ग्लोबल सर्कुलर इकोनॉमी मार्केट और भारत के लिए एक बड़ा बिजनेस अवसर भी बन सकती है।


