Russia Fuel Shortage: रूस के कई हिस्सों में एक बार फिर पेट्रोल की उपलब्धता को लेकर दबाव बढ़ गया है। तेल रिफाइनरियों पर ड्रोन हमलों की नई लहर के बाद ईंधन उत्पादन और सप्लाई प्रभावित हुई है। हालात को देखते हुए कम से कम 10 क्षेत्रों में पेट्रोल की बिक्री पर पाबंदियां सख्त की गई हैं। मॉस्को क्षेत्र के कुछ पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की कमी की खबरें सामने आई हैं, जबकि कई जगह डीजल की उपलब्धता बनी हुई है।
यह स्थिति रूस के लिए इसलिए भी चिंता बढ़ाने वाली है क्योंकि देश कुछ ही सप्ताह पहले ईंधन की पिछली किल्लत से उबरने की कोशिश कर रहा था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर रिफाइनरियों पर हमले जारी रहते हैं तो रूस घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की सप्लाई कैसे बनाए रखेगा। इसी बीच भारत की बड़ी रिफाइनिंग क्षमता रूस के लिए संभावित मदद का एक रास्ता बन सकती है।
रूस में फिर क्यों बढ़ी पेट्रोल की किल्लत?
रूस के ऊर्जा बाजार पर एक बार फिर ड्रोन हमलों का असर दिखाई दे रहा है। जुलाई के आखिर और अगस्त की शुरुआत में रूसी रिफाइनरियों को निशाना बनाकर किए गए हमलों के बाद कुछ रिफाइनिंग इकाइयों का संचालन प्रभावित हुआ। इससे पेट्रोलियम उत्पादों का घरेलू उत्पादन दबाव में आया।
रूस जैसे बड़े देश में रिफाइनरियों की क्षमता पर असर पड़ने का सीधा प्रभाव पेट्रोल पंपों तक पहुंचने वाली सप्लाई पर पड़ सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, जहां स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक सप्लाई सीमित है।
रॉयटर्स के अनुसार, मॉस्को क्षेत्र के कुछ फिलिंग स्टेशनों पर सोमवार को पेट्रोल उपलब्ध नहीं था, जबकि ज्यादातर स्टेशनों पर डीजल मिल रहा था। क्षेत्रीय अधिकारियों और स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में भी कई इलाकों में ईंधन बिक्री पर दोबारा नियंत्रण लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।
कुछ हफ्ते पहले ही संभला था संकट
रूस में मौजूदा ईंधन संकट अचानक पैदा नहीं हुआ है। इससे पहले मई में शुरू हुई पेट्रोल की कमी जुलाई तक देश के कई हिस्सों में फैल गई थी। उस समय भी ड्रोन हमलों के कारण कई रिफाइनरियों के संचालन पर असर पड़ा था।
स्थिति को संभालने के लिए रूसी सरकार ने कई कदम उठाए थे। इनमें पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर प्रतिबंध, घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने की कोशिश और पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़े कुछ नियमों में अस्थायी ढील जैसे उपाय शामिल थे।
कुछ जगहों पर विदेश से पेट्रोलियम उत्पाद मंगाकर भी घरेलू जरूरत पूरी करने की कोशिश की गई। जुलाई के अंत तक कई क्षेत्रों में उपलब्धता बेहतर हुई और कुछ स्थानीय प्रतिबंधों में ढील दी गई।
लेकिन रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों की नई लहर ने इस सुधार को फिर चुनौती दे दी है।
10 से ज्यादा क्षेत्रों में बढ़ी चिंता
रूसी अधिकारियों ने कई क्षेत्रों में ईंधन की स्थिति की समीक्षा की है। इनमें ओरेनबर्ग, लिपेत्स्क, त्वेर, क्रास्नोडार, जबायकाल्स्की, प्रिमोर्स्की, क्रास्नोयार्स्क, ओरियोल, तुवा और खाकसिया जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
सरकार की कोशिश है कि पेट्रोल पंपों पर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त ईंधन उपलब्ध रहे। इसके लिए जरूरत के हिसाब से बिक्री पर नियंत्रण और सप्लाई के प्रबंधन जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
ईंधन की कमी का असर केवल आम उपभोक्ताओं पर ही नहीं पड़ता। परिवहन, कृषि, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक गतिविधियों के लिए भी पेट्रोल और डीजल की नियमित आपूर्ति जरूरी होती है। यदि संकट लंबे समय तक चलता है तो इसका असर स्थानीय कीमतों और कारोबार पर भी पड़ सकता है।
थोक बाजार में भी दिख रहा दबाव
रूस के थोक ईंधन बाजार में भी सप्लाई की समस्या का संकेत दिखाई दे रहा है। सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल मर्केंटाइल एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त की शुरुआत से गैसोलीन की औसत बिक्री जुलाई के दूसरे हिस्से की तुलना में करीब 20% कम रही है।
इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल कुछ पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं है। रिफाइनिंग क्षमता में व्यवधान और घरेलू मांग के बीच संतुलन बनाना रूस के लिए चुनौती बन रहा है।
मौसमी मांग भी इस स्थिति को मुश्किल बना सकती है। गर्मियों के दौरान यात्रा और परिवहन गतिविधियां बढ़ने से पेट्रोल की खपत में भी इजाफा होता है। ऐसे समय में अगर उत्पादन क्षमता प्रभावित हो जाए तो बाजार पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है।
रूस के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
रूस के ऊर्जा क्षेत्र के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ रिफाइनरियों और तेल से जुड़ी दूसरी सुविधाओं पर ड्रोन हमलों का खतरा है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू बाजार में ईंधन की मांग को पूरा करना जरूरी है।
सरकार पहले ही ईंधन निर्यात पर प्रतिबंध जैसे कदम उठा चुकी है। ऐसे में लंबे समय तक उत्पादन प्रभावित रहने पर घरेलू बाजार को प्राथमिकता देना पड़ सकता है।
रूस दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल है, लेकिन कच्चे तेल का उत्पादन और उसे पेट्रोल-डीजल जैसे तैयार उत्पादों में बदलने की रिफाइनिंग क्षमता दो अलग-अलग बातें हैं। कच्चा तेल उपलब्ध होने के बावजूद अगर रिफाइनरी क्षमता प्रभावित होती है तो घरेलू पेट्रोल-डीजल की सप्लाई में कमी आ सकती है।
भारत रूस की कैसे कर सकता है मदद?
रूस में ईंधन संकट के बीच भारत की भूमिका पर चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के पास दुनिया की बड़ी रिफाइनिंग क्षमताओं में से एक है। भारतीय रिफाइनरियां कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने की क्षमता रखती हैं।
ऐसे में सैद्धांतिक रूप से भारत रूस की मदद के लिए प्रोसेस्ड फ्यूल की सप्लाई बढ़ाने पर विचार कर सकता है, हालांकि ऐसा किसी भी व्यावसायिक या सरकारी समझौते, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और लॉजिस्टिक्स पर निर्भर करेगा।
भारत की संभावित भूमिका को तीन हिस्सों में देखा जा सकता है।
1. पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई
अगर रूस को घरेलू बाजार में पेट्रोल या डीजल की अस्थायी कमी का सामना करना पड़ता है, तो भारत की रिफाइनरियां अतिरिक्त क्षमता के आधार पर पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में भूमिका निभा सकती हैं।
हालांकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि रूस की वास्तविक जरूरत क्या है और संबंधित व्यापारिक व नियामकीय शर्तें क्या अनुमति देती हैं।
2. रिफाइनरी स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता
रिफाइनरियों पर बार-बार हमले होने की स्थिति में केवल कच्चा माल ही पर्याप्त नहीं होता। क्षतिग्रस्त उपकरणों को दोबारा चालू करने के लिए मशीनरी, कंपोनेंट्स और स्पेयर पार्ट्स की जरूरत पड़ सकती है।
भारत की इंजीनियरिंग और औद्योगिक कंपनियां कुछ क्षेत्रों में ऐसे उपकरणों और सेवाओं की आपूर्ति में संभावित भूमिका निभा सकती हैं।
3. रूसी क्रूड का बेहतर इस्तेमाल
भारत पहले से ही बड़ी मात्रा में कच्चे तेल को रिफाइन करके घरेलू जरूरतों के साथ-साथ वैश्विक बाजारों में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति करता है।
ऐसे में रूसी कच्चे तेल का व्यापारिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य ढांचे के भीतर इस्तेमाल जारी रहने से वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसे रूस के घरेलू ईंधन संकट का सीधा समाधान मानना सही नहीं होगा, क्योंकि रूस में रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की अपनी समस्याएं हैं।
भारत के लिए भी क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
रूस में ईंधन संकट केवल रूस का घरेलू मामला नहीं है। रूस वैश्विक तेल बाजार का बड़ा खिलाड़ी है। अगर रिफाइनरियों पर हमले लंबे समय तक जारी रहते हैं और पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन प्रभावित होता है, तो वैश्विक तेल बाजार पर भी असर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल या पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बड़ा बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर असर डाल सकता है।
भारत के लिए सबसे अहम बात यह होगी कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों, रूस के साथ व्यापारिक संबंधों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के बीच संतुलन बनाए रखे।
आगे क्या होगा?
रूस में ईंधन संकट कितना गंभीर होगा, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करेगा कि रिफाइनरियों पर हमले आगे कितने समय तक जारी रहते हैं और प्रभावित इकाइयों को कितनी जल्दी दोबारा चालू किया जा सकता है।
अगर उत्पादन जल्द सामान्य होता है तो मौजूदा प्रतिबंध अस्थायी साबित हो सकते हैं। लेकिन रिफाइनिंग क्षमता पर लगातार दबाव बना रहा तो रूस को घरेलू बाजार में सप्लाई बनाए रखने के लिए निर्यात नियंत्रण और अन्य उपायों को लंबे समय तक जारी रखना पड़ सकता है।
भारत की बड़ी रिफाइनिंग क्षमता इस पूरी स्थिति में एक संभावित विकल्प जरूर बन सकती है, लेकिन भारत की ओर से रूस को ईंधन या रिफाइनरी उपकरणों की किसी विशेष अतिरिक्त सप्लाई को तभी निश्चित माना जाना चाहिए जब उसका आधिकारिक ऐलान या पुष्ट व्यापारिक समझौता सामने आए।
निष्कर्ष: रूस में दोबारा उभरता ईंधन संकट दिखाता है कि आधुनिक ऊर्जा बाजार में रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है। रिफाइनरियों पर हमले लंबे समय तक जारी रहने पर रूस को घरेलू पेट्रोल-डीजल सप्लाई बनाए रखने में मुश्किल हो सकती है। वहीं भारत अपनी विशाल रिफाइनिंग क्षमता और पेट्रोलियम क्षेत्र की विशेषज्ञता के कारण संभावित रूप से एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार की भूमिका निभा सकता है। हालांकि भारत की वास्तविक मदद का स्वरूप बाजार की जरूरतों, व्यापारिक समझौतों और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर निर्भर करेगा।


