नई दिल्ली: शेयर बाजार में निवेश को लेकर अक्सर गिरावट के समय निवेशकों के मन में डर पैदा हो जाता है। लेकिन लंबी अवधि के आंकड़े बताते हैं कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद धैर्य बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। UTI म्यूचुअल फंड के डेटा के मुताबिक, अगर साल 2003 में Nifty 100 TRI में ₹1 लाख का निवेश किया गया होता और उसे जून 2026 तक बनाए रखा जाता, तो उसकी वैल्यू बढ़कर ₹34.46 लाख हो गई होती।
इस निवेश पर दो दशकों से ज्यादा की अवधि में करीब 16.2% का CAGR (Compound Annual Growth Rate) मिला। खास बात यह है कि इस दौरान बाजार ने 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस, यूरो डेट क्राइसिस, नोटबंदी के बाद की गिरावट, कोविड क्रैश और हाल के कई बड़े करेक्शन का सामना किया।
Nifty 100 TRI क्या है?
Nifty 100 TRI यानी Nifty 100 Total Return Index भारत में लिस्टेड 100 बड़ी और अपेक्षाकृत लिक्विड कंपनियों के प्रदर्शन को ट्रैक करता है। यहां TRI का मतलब Total Return Index है।
सामान्य प्राइस इंडेक्स और TRI में बड़ा अंतर यह है कि TRI में कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड को भी शामिल किया जाता है, यह मानते हुए कि डिविडेंड को दोबारा निवेश किया गया है। इसलिए लंबी अवधि के निवेश के रिटर्न को समझने के लिए TRI एक उपयोगी बेंचमार्क माना जाता है।
बाजार में कई बड़ी गिरावट के बावजूद जारी रही ग्रोथ
2003 से जून 2026 तक के सफर में निवेशकों को कई बार भारी गिरावट का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए:
- 2008 ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस: Nifty 100 TRI में करीब 61% की गिरावट।
- यूरो डेट क्राइसिस: करीब 29% की गिरावट।
- 2016 नोटबंदी के बाद का करेक्शन: करीब 21% की गिरावट।
- 2020 कोविड क्रैश: करीब 38% की गिरावट।
- 2022 ग्लोबल मार्केट करेक्शन: करीब 17% की गिरावट।
- 2025 में अमेरिकी टैरिफ और पश्चिम एशिया में तनाव: करीब 17% की गिरावट।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि इक्विटी मार्केट में लंबी अवधि के दौरान बड़ी गिरावट आना असामान्य नहीं है। लेकिन केवल गिरावट को देखकर निवेश की पूरी तस्वीर समझना सही नहीं होगा।
₹1 लाख कैसे बने ₹34.46 लाख?
मान लीजिए किसी निवेशक ने 2003 में Nifty 100 TRI में ₹1 लाख लगाया और बाजार में आई इन गिरावटों के बावजूद निवेश को जारी रखा। जून 2026 तक यह रकम बढ़कर ₹34.46 लाख हो गई होती।
यानी शुरुआती निवेश की तुलना में रकम करीब 34 गुना हो गई।
यह उदाहरण कंपाउंडिंग की ताकत को समझने में मदद करता है। बाजार में कुछ वर्षों में बड़ी गिरावट आ सकती है, लेकिन लंबी अवधि में रिकवरी और कंपाउंडिंग निवेश की वैल्यू को काफी बढ़ा सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में Nifty 100 TRI भी बिल्कुल इसी दर से रिटर्न देगा। पिछला प्रदर्शन भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं है।
मार्केट क्रैश के समय निवेशक की असली परीक्षा
जब बाजार तेजी से गिरता है तो निवेशक के लिए अपनी रणनीति पर टिके रहना मुश्किल हो सकता है। 30%, 40% या उससे ज्यादा की गिरावट कुछ ही समय में पोर्टफोलियो की वैल्यू को काफी कम कर सकती है।
ऐसे समय में डर के कारण निवेश बेच देने का फैसला नुकसान को पक्का कर सकता है। दूसरी तरफ, बाजार में रिकवरी होने पर निवेश से बाहर रहने वाला व्यक्ति उस तेजी का फायदा नहीं उठा पाता।
इसीलिए लंबी अवधि के निवेश में केवल सही एसेट चुनना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि निवेश के दौरान अनुशासन और धैर्य बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
बाजार बढ़ने पर भी बढ़ सकता है जोखिम
UTI म्यूचुअल फंड की प्रस्तुति के मुताबिक, जब बाजार लगातार ऊपर जाता है तो निवेशकों की उम्मीदें भी बढ़ सकती हैं। तेजी के दौरान उत्साह और आत्मविश्वास बढ़ने से कुछ निवेशक जरूरत से ज्यादा जोखिम लेने लगते हैं।
बाजार के ऊंचे स्तरों के आसपास FOMO यानी मुनाफा छूट जाने का डर भी बढ़ सकता है। ऐसे में निवेशक अधिक रिटर्न की उम्मीद में अपनी जोखिम क्षमता से ज्यादा पैसा बाजार में लगा सकता है।
गिरते बाजार में डर हावी हो सकता है
इसके उलट, जब बाजार में तेज गिरावट आती है तो निवेशकों की सोच तेजी से बदल सकती है। चिंता, डर और घबराहट के कारण कई लोग अपने निवेश को नुकसान में ही बेचने का फैसला कर लेते हैं।
समस्या यह है कि बाजार से बाहर निकलने के बाद रिकवरी कब शुरू होगी, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं होता। अगर निवेशक रिकवरी के समय दोबारा निवेश नहीं कर पाता, तो वह बाजार की अगली तेजी से मिलने वाले रिटर्न से भी चूक सकता है।
Nifty 100 के आंकड़ों से क्या सीख मिलती है?
Nifty 100 TRI का यह उदाहरण दो महत्वपूर्ण बातें बताता है। पहली, लंबी अवधि में कंपाउंडिंग काफी प्रभावशाली हो सकती है। 2003 में लगाए गए ₹1 लाख का जून 2026 तक ₹34.46 लाख होना इसका एक उदाहरण है।
दूसरी और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण बात निवेशक के व्यवहार से जुड़ी है। बाजार में तेजी और गिरावट दोनों आती हैं और इनके साथ निवेशकों की भावनाएं भी बदलती रहती हैं।
इसलिए लंबी अवधि के इक्विटी निवेश में बाजार की हर छोटी-बड़ी गिरावट पर फैसला लेने के बजाय अपने निवेश लक्ष्य, समय अवधि और जोखिम क्षमता के हिसाब से रणनीति बनाना जरूरी है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। इक्विटी और म्यूचुअल फंड निवेश बाजार जोखिम के अधीन हैं। किसी भी निवेश का फैसला लेने से पहले अपनी जोखिम क्षमता और वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखें।


