London Road Dues: लंदन की सड़कों पर विदेशी दूतावासों की ओर से जमा किए जाने वाले कंजेशन चार्ज और उससे जुड़े जुर्माने का बकाया लगातार बढ़ता जा रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक विदेशी डिप्लोमैटिक मिशनों पर करीब £173.82 मिलियन यानी लगभग 2,249 करोड़ रुपये का बकाया है। इस सूची में अमेरिका सबसे ऊपर है, जबकि भारत चौथे स्थान पर है।
नई दिल्ली: लंदन में विदेशी दूतावासों और डिप्लोमैटिक मिशनों पर बकाया सड़क शुल्क का मामला एक बार फिर चर्चा में है। ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन (TfL) के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2003 में कंजेशन चार्ज शुरू होने के बाद से 30 जून 2026 तक विदेशी डिप्लोमैटिक मिशनों पर करीब £173.82 मिलियन का कंजेशन चार्ज और संबंधित पेनल्टी बकाया है।
इस सूची में अमेरिकी दूतावास सबसे बड़ा बकाएदार है। इसके बाद चीन और जापान का नंबर आता है। भारत की स्थिति भी काफी ऊपर है। भारतीय उच्चायोग पर £10,794,005 यानी करीब 1.08 करोड़ पाउंड का बकाया दर्ज है। इस रकम के साथ भारत दुनिया में नहीं, बल्कि लंदन में बकाया रखने वाले विदेशी डिप्लोमैटिक मिशनों की सूची में चौथे स्थान पर है।
23 साल से जमा होता गया बकाया
लंदन का कंजेशन चार्ज फरवरी 2003 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों में ट्रैफिक कम करना और सड़क परिवहन से जुड़ी लागत को मैनेज करना है।
समय के साथ कई विदेशी डिप्लोमैटिक मिशनों ने इस शुल्क का भुगतान किया, लेकिन कुछ मिशनों ने इसे स्थानीय टैक्स मानते हुए भुगतान करने पर आपत्ति जताई। इसी वजह से पिछले दो दशकों से अधिक समय में बकाया रकम लगातार जमा होती गई।
ब्रिटिश सरकार और TfL का कहना है कि कंजेशन चार्ज टैक्स नहीं बल्कि एक सेवा के लिए लिया जाने वाला शुल्क है। इसलिए डिप्लोमैटिक मिशनों को भी इसका भुगतान करना चाहिए। ब्रिटिश अधिकारियों का कहना है कि विदेशी मिशनों को इस शुल्क से छूट देने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
भारत चौथे नंबर पर, अमेरिका सबसे आगे
30 जून 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा बकाया रखने वाले शीर्ष देशों की सूची इस प्रकार है:
| रैंक | देश | बकाया रकम |
|---|---|---|
| 1 | अमेरिका | £16,309,935 |
| 2 | चीन | £13,088,720 |
| 3 | जापान | £11,255,868 |
| 4 | भारत | £10,794,005 |
| 5 | नाइजीरिया | £9,755,675 |
| 6 | पोलैंड | £6,451,360 |
| 7 | रूस | £6,206,355 |
| 8 | कजाकिस्तान | £6,014,905 |
| 9 | घाना | £5,916,765 |
| 10 | जर्मनी | £4,915,120 |
आंकड़ों से साफ है कि भारत का बकाया अमेरिका से कम है, लेकिन चीन और जापान के मुकाबले भी भारत चौथे स्थान पर है। भारत के ऊपर केवल अमेरिका, चीन और जापान हैं।
भारत पर करीब 11 मिलियन पाउंड का बकाया
भारतीय उच्चायोग पर £10.79 मिलियन का बकाया है। कुल विदेशी डिप्लोमैटिक मिशनों के बकाए में भारत की हिस्सेदारी करीब 6.2 प्रतिशत बैठती है।
यह रकम केवल एक साल की देनदारी नहीं है। यह लंबे समय से जमा होते आए कंजेशन चार्ज और संबंधित पेनल्टी का कुल बकाया है। इसी वजह से रकम अब लाखों पाउंड से बढ़कर करोड़ों पाउंड के स्तर पर पहुंच चुकी है।
जनवरी 2026 में जारी आधिकारिक आंकड़ों में भी भारत चौथे स्थान पर था और उस समय भारतीय मिशन पर करीब £10.07 मिलियन का बकाया दर्ज किया गया था। इससे पता चलता है कि कुछ महीनों के दौरान बकाया रकम में और इजाफा हुआ है।
आखिर क्यों नहीं भर रहे हैं ये पैसे?
इस पूरे मामले की जड़ कंजेशन चार्ज की कानूनी परिभाषा को लेकर विवाद है।
ब्रिटिश सरकार और TfL का तर्क है कि यह सामान्य टैक्स नहीं है। उनके मुताबिक, वाहन को लंदन के निर्धारित कंजेशन जोन में सड़क इस्तेमाल करने की अनुमति देने के बदले यह शुल्क लिया जाता है। यानी इसे किसी सेवा के बदले किया गया भुगतान माना जाना चाहिए।
दूसरी तरफ कुछ विदेशी मिशनों का तर्क है कि कंजेशन चार्ज वास्तव में टैक्स की प्रकृति रखता है। ऐसे में 1961 के Vienna Convention on Diplomatic Relations के तहत डिप्लोमैटिक मिशनों को स्थानीय टैक्स से मिलने वाली छूट का सवाल उठता है।
यूके सरकार ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया है। ब्रिटिश पक्ष का कहना है कि वियना कन्वेंशन में उन शुल्कों से छूट का प्रावधान नहीं है जो किसी विशेष सेवा के बदले लिए जाते हैं। TfL ने भी कंजेशन चार्ज को इसी श्रेणी में रखा है।
ब्रिटेन बकाया वसूलने की कोशिश कर रहा है
ब्रिटिश सरकार और TfL लंबे समय से डिप्लोमैटिक चैनलों के जरिए इस रकम की वसूली की कोशिश कर रहे हैं।
यूके के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने 2025 में भी विदेशी मिशनों से बकाया कंजेशन चार्ज और पेनल्टी का भुगतान करने की अपील की थी। बड़े बकाए वाले मिशनों से सीधे संपर्क कर उन्हें भुगतान करने या उन शुल्कों के खिलाफ अपील करने का मौका भी दिया गया, जिन्हें वे गलत मानते हैं।
लंदन प्रशासन का कहना है कि ज्यादातर डिप्लोमैटिक मिशन कंजेशन चार्ज का भुगतान करते हैं। समस्या उन मिशनों को लेकर है जिन पर लंबे समय से बड़ी रकम बकाया है। TfL इन बकायों को डिप्लोमैटिक चैनलों के माध्यम से वसूलने की कोशिश जारी रखता है।
दक्षिण एशिया में भारत सबसे बड़ा बकाएदार
दक्षिण एशियाई देशों की बात करें तो भारत का बकाया सबसे ज्यादा है। इसके बाद पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश जैसे देश आते हैं।
यहां भी भारत और पाकिस्तान के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। भारत का बकाया £10.79 मिलियन है, जबकि पाकिस्तान का बकाया करीब £4.12 मिलियन बताया गया है।
इसका मतलब है कि लंदन के कंजेशन चार्ज से जुड़े बकाए के मामले में भारत का आंकड़ा पाकिस्तान से ढाई गुने से भी ज्यादा है।
क्या यह सिर्फ ‘रोड टैक्स’ है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। इसे सीधे-सीधे ‘रोड टैक्स’ कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। लंदन में यह मुख्य रूप से Congestion Charge और उससे जुड़े Penalty Charge Notices का बकाया है।
ब्रिटिश अधिकारी इसे सड़क के एक निर्धारित क्षेत्र में वाहन इस्तेमाल करने के लिए लिया जाने वाला शुल्क मानते हैं, जबकि कुछ विदेशी मिशन इसे टैक्स की श्रेणी में रखते हैं। यही कानूनी अंतर इस विवाद को दो दशक से ज्यादा समय से खींच रहा है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है?
भारत और ब्रिटेन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में व्यापार और निवेश के लिहाज से लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे समय में भारतीय उच्चायोग का लंदन में इतना बड़ा कंजेशन चार्ज बकाया होना निश्चित रूप से ध्यान खींचता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह रकम भारत सरकार के सामान्य बजट या किसी भारतीय नागरिक के निजी ट्रैफिक चालान का बकाया नहीं है। यह लंदन में डिप्लोमैटिक मिशन से जुड़े वाहनों पर लगे कंजेशन चार्ज और पेनल्टी का रिकॉर्ड है।
फिलहाल ब्रिटिश सरकार का रुख स्पष्ट है कि कंजेशन चार्ज का भुगतान किया जाना चाहिए और बकाया रकम को माफ करने का कोई सामान्य आधार नहीं है। इसलिए आने वाले समय में इस पुराने विवाद पर दोनों पक्षों के बीच डिप्लोमैटिक बातचीत महत्वपूर्ण रहेगी।
नोट: बकाया रकम समय के साथ बदल सकती है। ऊपर दिए गए आंकड़े 30 जून 2026 तक के उपलब्ध TfL आंकड़ों पर आधारित हैं।


