कभी कोयला तौलने की नौकरी की, फिर खड़ा किया दुनिया में नाम
नई दिल्ली। जिंदगी में कई बार असफलता ही उस रास्ते की शुरुआत बन जाती है, जो इंसान को बड़ी कामयाबी तक ले जाती है। भारत के मशहूर होटल कारोबारी मोहन सिंह ओबेरॉय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सरकारी क्लर्क बनने का सपना देखने वाले मोहन सिंह ओबेरॉय परीक्षा में असफल हो गए थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही शख्स आगे चलकर भारत के सबसे बड़े होटल साम्राज्यों में से एक की नींव रखेगा।
आज ओबेरॉय ग्रुप दुनियाभर में लग्जरी होटल और हॉस्पिटैलिटी के लिए जाना जाता है। लेकिन इस साम्राज्य की शुरुआत किसी बड़े कारोबारी निवेश या विरासत से नहीं हुई थी। इसकी नींव एक ऐसे व्यक्ति ने रखी थी, जिसने बेहद कठिन परिस्थितियों में नौकरी से अपना सफर शुरू किया और आगे बढ़ते हुए होटल कारोबार की बारीकियां सीखीं।
बचपन में ही सिर से उठ गया पिता का साया
मोहन सिंह ओबेरॉय का जन्म अविभाजित पंजाब के झेलम जिले के भाऊन गांव में हुआ था। उनके पिता का निधन तब हो गया था, जब वह महज छह महीने के थे। परिवार की आर्थिक स्थिति आसान नहीं थी, लेकिन मोहन सिंह ने पढ़ाई और मेहनत के दम पर आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखी।
साल 1922 में वह सरकारी क्लर्क की परीक्षा देने के लिए शिमला पहुंचे। उस समय उनकी जेब में करीब 25 रुपये थे। उन्हें उम्मीद थी कि सरकारी नौकरी मिल जाएगी और परिवार की आर्थिक परेशानियां कुछ कम होंगी। लेकिन परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके।
यह असफलता उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई।
होटल में मिली सिर्फ कोयला तौलने की नौकरी
सरकारी नौकरी नहीं मिली तो मोहन सिंह ओबेरॉय ने काम की तलाश शुरू की। इसी दौरान वह शिमला के प्रसिद्ध होटल सेसिल पहुंचे। यहां उन्हें शुरुआत में वॉटर हीटर के लिए आने वाली कोयले की बोरियां तौलने का काम मिला।
इस नौकरी के बदले उन्हें करीब 40 रुपये महीने वेतन मिलता था। काम छोटा था, लेकिन मोहन सिंह ने इसे कभी छोटा नहीं समझा। उन्होंने होटल के कामकाज को करीब से समझना शुरू किया।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत और लगन का असर दिखाई देने लगा और वह बिलिंग क्लर्क के पद तक पहुंचे। होटल में काम करते हुए उन्हें यह समझ आने लगी कि हॉस्पिटैलिटी कारोबार सिर्फ कमरों और खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मैनेजमेंट, ग्राहक सेवा, वित्त और संचालन की बड़ी भूमिका होती है।
मोतीलाल नेहरू से मिली ₹100 की टिप
मोहन सिंह ओबेरॉय के शुरुआती जीवन से जुड़ी एक घटना अक्सर उनकी कहानी का हिस्सा बनती है। होटल में पंडित मोतीलाल नेहरू ठहरे हुए थे। एक जरूरी रिपोर्ट टाइप करने के लिए मोहन सिंह को रातभर काम करना पड़ा।
उनकी मेहनत से प्रभावित होकर मोतीलाल नेहरू ने उन्हें 100 रुपये की टिप दी। उस दौर में 100 रुपये की रकम काफी बड़ी मानी जाती थी।
यह घटना सिर्फ आर्थिक मदद नहीं थी। इससे मोहन सिंह का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्हें महसूस हुआ कि मेहनत और जिम्मेदारी के साथ काम करने वाला व्यक्ति आगे बढ़ सकता है।
पत्नी के गहने गिरवी रखकर खरीदा होटल
होटल कारोबार में अनुभव हासिल करने के बाद मोहन सिंह ओबेरॉय ने नौकरी करने के बजाय खुद कारोबारी बनने का फैसला किया।
साल 1934 में उन्होंने अपनी पत्नी के गहने और संपत्ति गिरवी रखकर क्लार्क्स होटल को खरीद लिया। यही वह फैसला था, जिसने आगे चलकर ओबेरॉय ग्रुप के निर्माण की नींव रखी।
उस समय किसी होटल को खरीदने के लिए परिवार की संपत्ति को दांव पर लगाना बड़ा जोखिम था। लेकिन मोहन सिंह ओबेरॉय ने होटल कारोबार में अपने अनुभव और भविष्य की संभावनाओं पर भरोसा किया।
यही वह दौर था जब भारत में भारतीय उद्यमी आधुनिक होटल कारोबार में अपनी जगह बनाने लगे थे। इससे पहले जमशेदजी टाटा ने 1902 में इंडियन होटल्स कंपनी की स्थापना के जरिए भारत के संगठित होटल उद्योग को एक नई दिशा दी थी।
संकट को अवसर में बदलने की कला
मोहन सिंह ओबेरॉय की कारोबारी यात्रा में एक और महत्वपूर्ण मोड़ 1930 के दशक के अंत में आया।
साल 1938 में कोलकाता का मशहूर ग्रैंड होटल हैजा फैलने के कारण बंद हो गया। होटल में सैकड़ों कमरे थे और परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण थीं। ज्यादातर कारोबारी ऐसे समय में जोखिम लेने से बचते।
लेकिन ओबेरॉय ने इसे अवसर के रूप में देखा। उन्होंने होटल को कम दर पर लीज पर लिया और इसके संचालन की जिम्मेदारी संभाली।
अपनी मैनेजमेंट क्षमता और कारोबारी समझ के दम पर उन्होंने धीरे-धीरे होटल को दोबारा खड़ा किया। यह फैसला उनके कारोबारी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में गिना जाता है।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी बढ़ाया कारोबार
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत में बड़ी संख्या में ब्रिटिश सैनिक मौजूद थे। ओबेरॉय ने उनके ठहरने और खान-पान की व्यवस्था से जुड़े कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
युद्ध के दौरान होटल कारोबार की मांग बढ़ी और ओबेरॉय को इसका फायदा मिला। इसी दौर में उनकी कारोबारी पहचान और मजबूत हुई।
उनके काम के लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि भी दी। इसके बाद उन्होंने होटल कारोबार के विस्तार पर लगातार ध्यान दिया।
1943 में बना बड़ा कारोबारी साम्राज्य
साल 1943 ओबेरॉय के कारोबारी जीवन का एक और बड़ा पड़ाव था। उन्होंने एसोसिएटेड होटल्स ऑफ इंडिया का अधिग्रहण किया। इस कदम के बाद वह भारत में बड़े होटल नेटवर्क का संचालन करने वाले प्रमुख भारतीय उद्यमी बन गए।
उनकी खासियत यह थी कि वह होटल के हर स्तर के काम को समझते थे। उन्होंने अपनी शुरुआती नौकरी से लेकर होटल मैनेजमेंट और विस्तार तक का अनुभव खुद हासिल किया था।
दिलचस्प बात यह भी है कि जिस डी.डब्ल्यू. ग्रोव ने उन्हें शुरुआती दौर में होटल सेसिल में कोयला तौलने की नौकरी दी थी, बाद में ओबेरॉय ने उन्हें अपने साथ करीब 1,500 रुपये मासिक वेतन पर नियुक्त किया। यह घटना उनके व्यक्तित्व और पुराने संबंधों को याद रखने की क्षमता को दिखाती है।
भारत में आधुनिक लग्जरी होटल की नई शुरुआत
ओबेरॉय ग्रुप के विस्तार के साथ भारत में लग्जरी हॉस्पिटैलिटी का स्तर भी बदलने लगा।
साल 1965 में दिल्ली में ओबेरॉय इंटरकॉन्टिनेंटल की शुरुआत हुई। इसे भारत में आधुनिक लग्जरी होटल उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। होटल में उस समय की आधुनिक सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सेवाओं पर जोर दिया गया।
मोहन सिंह ओबेरॉय का लक्ष्य सिर्फ होटल खोलना नहीं था। वह भारतीय होटल उद्योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना चाहते थे।
कारोबार के साथ राजनीति में भी सक्रिय रहे
मोहन सिंह ओबेरॉय सिर्फ कारोबारी ही नहीं थे। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में भी भूमिका निभाई और संसद के दोनों सदनों—राज्यसभा और लोकसभा—में सांसद के रूप में काम किया।
हालांकि उनका मुख्य क्षेत्र होटल कारोबार ही रहा। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक ओबेरॉय समूह और हॉस्पिटैलिटी उद्योग के विकास में योगदान दिया।
103 साल की उम्र में हुआ निधन
मोहन सिंह ओबेरॉय का निधन 3 मई 2002 को हुआ। वह 103 वर्ष के थे। उनके निधन के बाद उनके बेटे पृथ्वीराज सिंह ‘बिकी’ ओबेरॉय ने कारोबारी विरासत को आगे बढ़ाया।
बिकी ओबेरॉय के नेतृत्व में ओबेरॉय ग्रुप ने भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान मजबूत की। आज कंपनी की विरासत अगली पीढ़ियों तक पहुंच चुकी है और परिवार की चौथी पीढ़ी भी कारोबार से जुड़ी हुई है।
पद्म भूषण से हुए सम्मानित
मोहन सिंह ओबेरॉय के योगदान को भारत सरकार ने भी सम्मानित किया। उन्हें साल 2001 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
उनकी कहानी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उन्होंने सफलता की शुरुआत किसी बड़े पद या बड़ी पूंजी से नहीं की थी। उन्होंने एक साधारण नौकरी से शुरुआत की, होटल उद्योग को करीब से समझा, जोखिम उठाया और धीरे-धीरे अपना कारोबार खड़ा किया।
सरकारी क्लर्क की परीक्षा में असफल होने वाला एक युवक आगे चलकर भारत के सबसे प्रसिद्ध होटल कारोबारियों में शामिल हुआ। पत्नी के गहने गिरवी रखकर शुरू किया गया वह सफर एक ऐसे होटल साम्राज्य में बदल गया, जिसने भारतीय हॉस्पिटैलिटी को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
मोहन सिंह ओबेरॉय की जिंदगी इस बात की मिसाल है कि शुरुआत कितनी छोटी है, इससे ज्यादा मायने यह रखता है कि व्यक्ति अपने मौके को किस तरह पहचानता है और उसे सफलता में कैसे बदलता है।


