Indian Economy: भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। IMF की अप्रैल 2026 की ‘World Economic Outlook’ रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की नॉमिनल GDP 3.92 ट्रिलियन डॉलर रही। भारत 2019 में 2.94 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना था। ऐसे में रैंकिंग में एक पायदान की गिरावट ने सवाल खड़े किए हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
इस सवाल का जवाब वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में दिया। उन्होंने बताया कि किसी देश की अर्थव्यवस्था का आकार जब अमेरिकी डॉलर में मापा जाता है तो उस पर सिर्फ घरेलू आर्थिक विकास का असर नहीं पड़ता। नॉमिनल GDP ग्रोथ, रुपये और डॉलर के बीच एक्सचेंज रेट, कीमतों में बदलाव और दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं की ग्रोथ भी रैंकिंग को प्रभावित करती है।
IMF के मुताबिक 3.92 ट्रिलियन डॉलर की है भारतीय अर्थव्यवस्था
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के मुताबिक IMF ने अपनी अप्रैल 2026 की World Economic Outlook रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत की नॉमिनल GDP 3.92 ट्रिलियन डॉलर आंकी है। इसी आधार पर भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि यह रैंकिंग नॉमिनल GDP को मौजूदा अमेरिकी डॉलर एक्सचेंज रेट पर बदलकर तैयार की जाती है। इसलिए अगर किसी देश की अपनी करेंसी डॉलर के मुकाबले कमजोर होती है, तो घरेलू मुद्रा में GDP बढ़ने के बावजूद डॉलर में उसका मूल्य अपेक्षाकृत कम दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि भारत की आर्थिक रैंकिंग में बदलाव को केवल यह मानकर नहीं देखा जा सकता कि देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है।
रुपये की कमजोरी बनी बड़ी वजह
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव रहा है। सरकार की ओर से राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 में डॉलर के मुकाबले रुपये का औसत एक्सचेंज रेट ₹74.23 था। यह बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में ₹88.31 प्रति डॉलर हो गया।
यानी एक डॉलर खरीदने के लिए पहले की तुलना में ज्यादा रुपये देने पड़े। इसके बाद भी रुपये पर दबाव जारी रहा और दिए गए आंकड़ों के मुताबिक यह डॉलर के मुकाबले करीब ₹95.4 के स्तर तक कमजोर हुआ।
इसका सीधा असर तब दिखाई देता है जब भारतीय GDP को डॉलर में बदला जाता है। उदाहरण के तौर पर, अगर भारत की GDP रुपये में बढ़ रही हो लेकिन उसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाए, तो डॉलर में मापी गई GDP की वृद्धि उतनी तेज नहीं दिख सकती।
नई GDP सीरीज ने भी बदली तस्वीर
भारत की इकोनॉमिक रैंकिंग में बदलाव की एक और वजह GDP की नई सीरीज है। सरकार ने 2022-23 को नया बेस ईयर बनाकर GDP की नई सीरीज जारी की है।
नई सीरीज के तहत वित्त वर्ष 2025-26 में मौजूदा कीमतों पर भारत की नॉमिनल GDP ₹345.47 लाख करोड़ आंकी गई है। पुरानी सीरीज की तुलना में नई सीरीज के तहत नॉमिनल GDP का आकार कम आंका गया है।
यह बदलाव भी डॉलर में भारत की अर्थव्यवस्था के आकार और वैश्विक रैंकिंग पर असर डालता है। हालांकि, GDP सीरीज में बदलाव का मतलब यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था अचानक सिकुड़ गई है। यह मुख्य रूप से आर्थिक गतिविधियों को मापने की पद्धति और आधार वर्ष में बदलाव से जुड़ा मामला है।
क्या भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई है?
रैंकिंग में गिरावट को भारत की अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का सीधा संकेत मानना सही नहीं होगा। सरकार के मुताबिक भारत अभी भी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
यहां आर्थिक आकार और आर्थिक विकास दर के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी देश की GDP का डॉलर में आकार उसकी करेंसी की चाल से प्रभावित हो सकता है, जबकि वास्तविक आर्थिक विकास को देखने के लिए GDP ग्रोथ जैसे दूसरे संकेतकों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसलिए भारत का पांचवें से छठे स्थान पर आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि देश की घरेलू आर्थिक गतिविधियां कमजोर हो गई हैं।
IMF की रैंकिंग क्यों बदलती रहती है?
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि वैश्विक आर्थिक रैंकिंग कई कारणों से बदल सकती है। इनमें प्रमुख रूप से आर्थिक विकास, एक्सचेंज रेट, कीमतों में उतार-चढ़ाव, नेशनल अकाउंट्स में बदलाव और दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के आकार एवं विकास में बदलाव शामिल हैं।
यानी भारत की रैंकिंग सिर्फ भारत के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती। अगर किसी दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की GDP डॉलर में तेज गति से बढ़ती है या उसकी करेंसी मजबूत होती है, तो वह भारत से आगे निकल सकती है।
इसी तरह रुपये में कमजोरी आने पर भारत की डॉलर में GDP का मूल्य प्रभावित हो सकता है, भले ही घरेलू अर्थव्यवस्था में लगातार विस्तार हो रहा हो।
2019 में भारत बना था दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था
भारत ने 2019 में करीब 2.94 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल किया था। इसके बाद वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, विनिमय दरों और अलग-अलग देशों की विकास दर में बदलाव के कारण रैंकिंग में उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
इसलिए मौजूदा छठी रैंक को भारत की आर्थिक यात्रा में स्थायी बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। IMF की रैंकिंग आगे भी अलग-अलग आर्थिक आंकड़ों और एक्सचेंज रेट में बदलाव के साथ बदल सकती है।
Fitch ने भारत की ग्रोथ क्षमता पर जताया भरोसा
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक संकेत Fitch Ratings की ओर से भी मिला है। एजेंसी ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को ‘BBB-’ पर बरकरार रखा है और आउटलुक को ‘Stable’ रखा है।
Fitch के अनुसार भारत की रेटिंग को देश की मजबूत विकास संभावनाओं और ठोस बाहरी वित्तीय बुनियादी बातों से समर्थन मिलता है। इसका मतलब है कि भले ही डॉलर में GDP रैंकिंग में अस्थायी बदलाव आया हो, लेकिन भारत की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को लेकर तस्वीर अभी भी सकारात्मक बनी हुई है।
निष्कर्ष
भारत की आर्थिक रैंकिंग का पांचवें से छठे स्थान पर आना मुख्य रूप से डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी, नॉमिनल GDP ग्रोथ में बदलाव, नई GDP सीरीज और दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन से जुड़ा है। इसे सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के कमजोर होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत की GDP का घरेलू मुद्रा में आकार लगातार बढ़ा है और देश की विकास दर भी वैश्विक स्तर पर मजबूत बनी हुई है। इसलिए आने वाले समय में रुपये की चाल, GDP ग्रोथ और अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के प्रदर्शन के आधार पर भारत की वैश्विक रैंकिंग में फिर बदलाव हो सकता है।


