Gold Holding in Indian Households: भारत में सोना सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि बचत और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक भी है। भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने का आधिकारिक आंकड़ा सरकार के पास नहीं है, लेकिन उद्योग जगत के अनुमानों के मुताबिक घरेलू सोने का स्टॉक इतना बड़ा है कि यह दुनिया के शीर्ष 10 केंद्रीय बैंकों के कुल स्वर्ण भंडार से भी ज्यादा बताया जाता है। सरकार अब इस विशाल सोने को अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल करने के विकल्पों पर जोर दे रही है।
भारत में सोने का इस्तेमाल सदियों से संपत्ति को सुरक्षित रखने के साधन के तौर पर होता आया है। शादी-ब्याह, त्योहारों और पारिवारिक जरूरतों से लेकर आर्थिक संकट के समय तक सोना भारतीय परिवारों के लिए महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाता है। यही वजह है कि देश में हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात होता है और इसका एक बड़ा हिस्सा आभूषणों तथा घरेलू तिजोरियों में चला जाता है।
लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, सरकार के पास भारतीय परिवारों के पास मौजूद निष्क्रिय सोने का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, उद्योग संगठनों और बाजार विशेषज्ञों के अनुमानों से घरेलू सोने की मात्रा का अंदाजा लगाया जाता है।
भारतीय घरों में कितना सोना मौजूद है?
एसोचैम के अनुमानों के अनुसार, भारतीय परिवारों के पास जमा सोने की कुल वैल्यू करीब 5 ट्रिलियन डॉलर, यानी लगभग ₹415 लाख करोड़ के आसपास हो सकती है। यह अनुमान सोने की कीमत और घरेलू स्तर पर मौजूद संभावित स्टॉक को ध्यान में रखकर लगाया गया है।
यह आंकड़ा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने का अनुमानित स्टॉक दुनिया के कई बड़े केंद्रीय बैंकों के आधिकारिक स्वर्ण भंडार से कई गुना अधिक है। हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि घरेलू सोने का आंकड़ा एक औद्योगिक अनुमान है, जबकि केंद्रीय बैंकों का स्वर्ण भंडार आधिकारिक तौर पर दर्ज और रिपोर्ट किया जाता है।
भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने का बड़ा हिस्सा आभूषणों के रूप में है। इसलिए इस पूरी मात्रा को तुरंत आर्थिक परिसंपत्ति में बदलना आसान नहीं है। भावनात्मक लगाव, पारिवारिक परंपराएं और भविष्य की जरूरतों के लिए सोना सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति इसके मॉनेटाइजेशन में बड़ी भूमिका निभाती है।
सरकार को सोने के आयात से मिला हजारों करोड़ का कस्टम ड्यूटी
संसद में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, 13 मई से 2 अगस्त 2026 के बीच सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात से कुल ₹10,463 करोड़ का सीमा शुल्क संग्रह किया गया।
इसमें सबसे बड़ा योगदान सोने का रहा। सोने के आयात से सरकार को करीब ₹10,040 करोड़ का कस्टम ड्यूटी मिला। वहीं चांदी से ₹328 करोड़ और प्लैटिनम से ₹95 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ।
सरकार ने 13 मई 2026 को सोने और चांदी पर प्रभावी सीमा शुल्क को 6% से बढ़ाकर 15% और प्लैटिनम पर 6.4% से बढ़ाकर 15.4% कर दिया था। ड्यूटी में इस बदलाव का उद्देश्य राजस्व संग्रह के साथ-साथ कीमती धातुओं के आयात को लेकर नीति को मजबूत करना भी था।
सोने की तस्करी पर भी सरकार की नजर
सोने पर ऊंची ड्यूटी के कारण अवैध आयात और तस्करी सरकार के लिए लगातार चुनौती बने हुए हैं। उपलब्ध सरकारी जानकारी के मुताबिक, ड्यूटी में बदलाव के बाद करीब छह सप्ताह के भीतर 160 किलो से अधिक सोना जब्त किया गया और 116 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
इससे साफ है कि सोने की मांग भारत में कितनी मजबूत है। घरेलू मांग अधिक होने के कारण कीमतों और आयात लागत में बदलाव के बावजूद सोने की खरीदारी जारी रहती है। यही वजह है कि सरकार के लिए सोने के आयात को संतुलित करना एक महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दा है।
तिजोरी में रखा सोना ‘बर्फ’ क्यों बन जाता है?
बाजार विशेषज्ञ और वित्तीय क्षेत्र के दिग्गज नीलेश शाह ने घरेलू सोने के बड़े स्टॉक को अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देखने की बात कही है।
उनके अनुसार, भारत ने अब तक कीमती धातुओं के आयात पर करीब 700 अरब डॉलर खर्च किए हैं। उनका तर्क है कि देश में आयात होकर आने वाला बड़ा हिस्सा घरों और तिजोरियों में लंबे समय तक निष्क्रिय पड़ा रहता है। ऐसे में यह संपत्ति अर्थव्यवस्था में सक्रिय रूप से इस्तेमाल नहीं हो पाती।
नीलेश शाह ने तिजोरियों में रखे सोने को ‘बर्फ’ की तरह बताया है, यानी ऐसी संपत्ति जो मौजूद तो है, लेकिन आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से योगदान नहीं दे रही। यदि इस सोने को वित्तीय प्रणाली में लाकर उत्पादक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो इससे पूंजी की उपलब्धता बढ़ सकती है।
उनका मानना है कि घरेलू सोने का बेहतर इस्तेमाल होने पर भारत में टैलेंट, कैपिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर तालमेल बन सकता है और आर्थिक विकास को गति मिल सकती है।
घरेलू सोने का सिर्फ 2% इस्तेमाल भी बड़ा बदलाव ला सकता है
एसोचैम के अनुमान के मुताबिक, अगर भारतीय परिवार हर साल अपने घरेलू सोने का केवल 2% हिस्सा वित्तीय परिसंपत्तियों में बदलने में सफल होते हैं, तो इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के बदलाव से 2047 तक भारतीय जीडीपी में मल्टीप्लायर इफेक्ट के जरिए करीब 7.5 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त योगदान संभव हो सकता है।
हालांकि, यह एक अनुमानित आर्थिक प्रभाव है और इसे निश्चित भविष्यवाणी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि कितना सोना औपचारिक वित्तीय प्रणाली में आता है, उसका इस्तेमाल किस तरह होता है और उससे पैदा होने वाली पूंजी कितनी उत्पादक साबित होती है।
RBI के पास कितना सोना है?
भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की तुलना में रिजर्व बैंक का स्वर्ण भंडार काफी अलग श्रेणी की संपत्ति है। सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 29 मई 2026 तक भारतीय रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार के हिस्से के रूप में 880.52 टन सोना मौजूद था।
सरकार ने उन मीडिया रिपोर्ट्स को भी खारिज किया, जिनमें दावा किया गया था कि आरबीआई ने अपना सोना बेच दिया है। केंद्रीय बैंक के पास रखा सोना भारत के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा होता है और इसे वित्तीय स्थिरता तथा रिजर्व प्रबंधन के नजरिए से देखा जाता है।
Gold Monetisation Scheme क्या है?
भारतीय घरों और संस्थानों में लंबे समय से निष्क्रिय पड़े सोने को अर्थव्यवस्था में वापस लाने के लिए सरकार ने 2015 में Gold Monetisation Scheme (GMS) शुरू की थी।
इस योजना का उद्देश्य लोगों को अपने घर में रखे सोने को बैंकिंग प्रणाली में जमा करने के लिए प्रोत्साहित करना है। योग्य जमा के तहत सोना बैंक के पास जमा किया जा सकता है और निर्धारित शर्तों के अनुसार उस पर ब्याज भी प्राप्त किया जा सकता है।
इससे दो संभावित फायदे हो सकते हैं। पहला, परिवार को निष्क्रिय सोने पर कुछ रिटर्न प्राप्त हो सकता है। दूसरा, घरेलू सोने का एक हिस्सा औपचारिक वित्तीय प्रणाली में आ सकता है, जिससे देश की सोने के आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, योजना की सफलता के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों का सोने के प्रति भावनात्मक लगाव है। परिवारों के लिए सोना केवल निवेश नहीं है। खासकर आभूषणों के रूप में रखा गया सोना पारिवारिक संपत्ति और परंपरा का हिस्सा होता है। इसलिए लोग इसे बैंक में जमा करने के बजाय अपने पास रखना अधिक पसंद करते हैं।
सरकार के लिए घरेलू सोना क्यों बना चुनौती?
भारत की सोने की मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। जब सोने की कीमत बढ़ती है और आयात भी मजबूत रहता है, तो देश के आयात बिल और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, घरेलू स्तर पर पहले से मौजूद विशाल सोने का स्टॉक आर्थिक गतिविधियों में सीमित रूप से इस्तेमाल होता है।
यही विरोधाभास सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। एक तरफ भारतीय परिवारों के पास खरबों डॉलर मूल्य का सोना मौजूद होने का अनुमान है, वहीं दूसरी तरफ देश हर साल बड़ी मात्रा में सोना आयात करता है।
अगर घरेलू सोने के एक हिस्से को वित्तीय प्रणाली में सफलतापूर्वक लाया जाता है, तो नए सोने के आयात की जरूरत को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और वित्तीय प्रणाली में पूंजी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
क्या भारतीय अपना सोना बैंक में जमा करेंगे?
यह सबसे बड़ा सवाल है। केवल आर्थिक फायदे पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि भारतीय परिवारों के लिए सोने का महत्व वित्तीय रिटर्न से कहीं ज्यादा है। शादी, विरासत, सामाजिक सुरक्षा और आपातकालीन जरूरतों के लिए लोग सोना अपने पास रखना पसंद करते हैं।
इसके अलावा, कई लोगों को गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम की प्रक्रिया, ब्याज, अवधि और सोना वापस मिलने की शर्तों को लेकर भी पूरी जानकारी नहीं होती। इसलिए विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर सरकार घरेलू सोने को अर्थव्यवस्था में लाना चाहती है तो उसे केवल योजना शुरू करने के बजाय लोगों में भरोसा और जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष: भारतीय घरों में मौजूद सोने का अनुमानित भंडार देश की सबसे बड़ी निष्क्रिय संपत्तियों में से एक माना जा सकता है। इसका पूरा आंकड़ा आधिकारिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन उद्योग जगत के अनुमानों से इसकी विशालता का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि इस सोने को लोगों की भावनाओं और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किस तरह औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाया जाए। अगर घरेलू गोल्ड का छोटा हिस्सा भी उत्पादक वित्तीय परिसंपत्तियों में बदलता है, तो यह भारत के लिए बड़ी आर्थिक पूंजी साबित हो सकता है।


