नई दिल्ली। आज के दौर में डिजिटल पेमेंट हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबारी भुगतान तक, लोग कुछ सेकेंड में मोबाइल से पैसे ट्रांसफर कर देते हैं। इसी बीच समय-समय पर यह चर्चा भी होती रहती है कि क्या भविष्य में UPI ट्रांजेक्शन पर यूजर्स से चार्ज लिया जा सकता है। हालांकि, सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आम यूजर्स के लिए UPI पेमेंट पर किसी तरह का चार्ज लगाने की बात से इनकार किया है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि UPI, क्रेडिट कार्ड और बैंकिंग सिस्टम से सदियों पहले भारत में बिना भारी मात्रा में नकदी साथ लेकर कारोबार कैसे किया जाता था? उस दौर में न इंटरनेट था, न मोबाइल और न ही आज जैसी बैंकिंग सुविधाएं। इसके बावजूद व्यापारियों के बीच एक ऐसा भरोसेमंद सिस्टम मौजूद था, जिसके जरिए दूर बैठे व्यक्ति तक रकम पहुंचाई जा सकती थी।
इस व्यवस्था का एक प्रमुख उदाहरण था ‘हुंडी’। खासकर सूरत जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में हुंडी का इस्तेमाल व्यापार, कर्ज और रकम के भुगतान के लिए किया जाता था। इसे आधुनिक नजरिए से देखें तो इसमें बैंक ड्राफ्ट, क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट और कुछ हद तक डिजिटल पेमेंट सिस्टम जैसी खूबियां दिखाई देती हैं।
पहले कैश से भी पहले होता था वस्तु विनिमय
भारत में शुरुआती दौर में लेन-देन का सबसे सामान्य तरीका वस्तु विनिमय यानी Barter System था। इसका मतलब था कि एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का आदान-प्रदान किया जाता था।
मसलन, किसी व्यक्ति के पास अनाज है और उसे कपड़े की जरूरत है तो वह अनाज देकर कपड़ा हासिल कर सकता था। लेकिन जैसे-जैसे व्यापार का दायरा बढ़ा, यह व्यवस्था मुश्किल होती गई। हर वस्तु के बदले ऐसी दूसरी वस्तु मिलना आसान नहीं था जिसकी सामने वाले को जरूरत हो।
इसके बाद सिक्कों और धातु की मुद्रा का इस्तेमाल बढ़ा। लेकिन बड़ी रकम को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना अपने आप में जोखिम भरा था। व्यापारियों को रास्ते में चोरी और लूट का खतरा रहता था। यहीं से भरोसे पर आधारित कागजी वित्तीय साधनों की उपयोगिता बढ़ी।
क्या थी हुंडी?
हुंडी एक तरह का वित्तीय साख पत्र या क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट था। इसे आसान भाषा में एक ऐसे लिखित दस्तावेज के रूप में समझा जा सकता है, जिसके जरिए एक व्यक्ति या व्यापारी किसी दूसरे स्थान पर निर्धारित रकम प्राप्त कर सकता था।
हुंडी की कई किस्में थीं और अलग-अलग व्यापारिक परिस्थितियों में इनका इस्तेमाल अलग तरीके से किया जाता था। कारोबारी नेटवर्क में साहूकार, व्यापारी और वित्तीय मध्यस्थ इसकी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे।
आज अगर कोई व्यक्ति बैंक के जरिए दूसरे शहर में पैसा भेजता है, तो उसे बड़ी मात्रा में नकदी लेकर यात्रा करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसी तरह पुराने समय में भी हुंडी ने व्यापारियों को बड़ी मात्रा में सिक्के या कीमती धातु साथ लेकर चलने की जरूरत को कम किया।
सूरत में क्यों महत्वपूर्ण थी हुंडी?
18वीं सदी में सूरत भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में से एक था। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी व्यापार होता था। कपड़ा, मसाले, कीमती वस्तुएं और अन्य सामान के कारोबार के कारण बड़ी रकम का लेन-देन होता था।
ऐसे माहौल में नकदी को एक शहर से दूसरे शहर तक ले जाना व्यावहारिक और सुरक्षित नहीं था। हुंडी ने इस समस्या का एक समाधान दिया।
व्यापारी किसी भरोसेमंद वित्तीय व्यक्ति के पास रकम जमा कर सकता था और बदले में हुंडी प्राप्त कर सकता था। फिर संबंधित व्यापारिक नेटवर्क के जरिए दूसरे शहर में उस दस्तावेज के आधार पर रकम प्राप्त की जा सकती थी।
इस तरह पैसा भौतिक रूप से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के बजाय भुगतान का अधिकार कागज के जरिए स्थानांतरित किया जाता था।
राज्य की गारंटी से बढ़ता था भरोसा
कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में 18वीं सदी के सूरत में ऐसी हुंडियों का उल्लेख मिलता है, जिनके भुगतान में राज्य की गारंटी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
इसका सीधा फायदा यह था कि दस्तावेज को स्वीकार करने वाले व्यक्ति के लिए उसके पीछे मौजूद साख और भुगतान की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण होती थी। उस दौर में जब आधुनिक बैंकिंग नेटवर्क मौजूद नहीं था, भरोसा और प्रतिष्ठा वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ थे।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर हुंडी को आज के UPI की तरह सरकारी गारंटी वाला भुगतान माध्यम समझना सही नहीं होगा। हुंडी की अलग-अलग किस्में थीं और उनके नियम, पक्षकार तथा भुगतान की शर्तें अलग हो सकती थीं।
ऐसे होता था हुंडी से लेन-देन
इसे एक उदाहरण से समझिए।
मान लीजिए सूरत का कोई व्यापारी बंगाल में कारोबार करने वाले व्यक्ति को भुगतान करना चाहता है। वह बड़ी मात्रा में चांदी या सिक्के लेकर लंबी यात्रा करने के बजाय किसी भरोसेमंद साहूकार या वित्तीय मध्यस्थ के पास रकम जमा कर सकता था।
इसके बदले उसे एक हुंडी या लिखित भुगतान आदेश मिलता था। संबंधित व्यापारी उस दस्तावेज को लेकर दूसरे व्यापारिक केंद्र तक जाता और वहां मौजूद संबंधित व्यक्ति या नेटवर्क से रकम प्राप्त कर सकता था।
इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चीज थी विश्वास का नेटवर्क। जिस व्यक्ति ने हुंडी जारी की, जिस व्यापारी ने उसे स्वीकार किया और जिस जगह भुगतान होना था—इन सभी के बीच कारोबारी साख मायने रखती थी।
कर्ज चुकाने में भी होती थी हुंडी की भूमिका
हुंडी का इस्तेमाल सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह पैसा पहुंचाने तक सीमित नहीं था। इसका उपयोग व्यापारिक देनदारी और कर्ज चुकाने में भी किया जाता था।
अगर किसी व्यापारी पर दूसरे व्यापारी की रकम बकाया है, तो हर बार सिक्कों में भुगतान करना जरूरी नहीं था। व्यापारिक नेटवर्क और उपलब्ध वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर हुंडी के जरिए भुगतान की व्यवस्था की जा सकती थी।
यानी एक कागज कई बार भुगतान की प्रतिबद्धता और साख का प्रतिनिधित्व करता था।
क्या हुंडी आज के UPI जैसी थी?
यहां थोड़ी सावधानी जरूरी है। हुंडी को सीधे UPI का प्राचीन संस्करण कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा।
UPI एक आधुनिक डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर है, जो बैंक खातों को रियल टाइम में जोड़कर इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सुविधा देता है। इसके विपरीत हुंडी मुख्य रूप से लिखित वित्तीय दस्तावेज और व्यापारिक साख व्यवस्था पर आधारित थी।
फिर भी दोनों में एक दिलचस्प समानता जरूर है। दोनों व्यवस्थाओं में भुगतान के लिए व्यक्ति को हर बार बड़ी मात्रा में भौतिक नकदी लेकर चलने की जरूरत नहीं पड़ती।
यही वजह है कि इतिहास के संदर्भ में हुंडी को समझना यह दिखाता है कि कैशलेस या कम-कैश व्यापार की सोच कोई नई चीज नहीं है।
आज के बैंक ड्राफ्ट और बिल ऑफ एक्सचेंज से समानता
हुंडी की तुलना अक्सर आधुनिक बिल ऑफ एक्सचेंज, चेक या बैंक ड्राफ्ट जैसे वित्तीय साधनों से की जाती है। हालांकि इनके कानूनी ढांचे और काम करने के तरीके अलग-अलग हैं, लेकिन मूल विचार में एक समानता दिखाई देती है—लिखित आदेश या वित्तीय साख के आधार पर भुगतान।
आज बैंकिंग व्यवस्था में किसी व्यक्ति को रकम ट्रांसफर करने के लिए बैंक खाता, डिजिटल नेटवर्क या चेक जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। पुराने समय में व्यापारियों के पास ऐसा आधुनिक नेटवर्क नहीं था, इसलिए स्थानीय व्यापारिक समुदाय और वित्तीय मध्यस्थों की साख बेहद महत्वपूर्ण थी।
लूट के जोखिम को कम करने में मिली मदद
पुराने समय में लंबी दूरी की व्यापारिक यात्राएं आसान नहीं थीं। व्यापारियों को सड़क, समुद्री मार्ग और राजनीतिक परिस्थितियों के अलावा डकैतों और लुटेरों का भी खतरा रहता था।
अगर किसी व्यापारी को बड़ी मात्रा में चांदी या सिक्के लेकर यात्रा करनी पड़े, तो वह खुद एक जोखिम बन जाता था। हुंडी जैसी व्यवस्था ने भौतिक नकदी के परिवहन की आवश्यकता को कम करने में मदद की।
यानी व्यापारी के पास पैसा नहीं, बल्कि पैसा प्राप्त करने का अधिकार दर्शाने वाला दस्तावेज होता था।
‘सिर्फ भरोसे’ पर नहीं, मजबूत व्यापारिक नेटवर्क पर चलता था सिस्टम
हुंडी व्यवस्था को केवल ‘भरोसे पर चलने वाला सिस्टम’ कहना आकर्षक जरूर है, लेकिन इसकी वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।
इसके पीछे साहूकारों की साख, व्यापारिक समुदायों के नेटवर्क, लिखित रिकॉर्ड, स्थानीय नियम और भुगतान करने वाले पक्ष की विश्वसनीयता जैसे कई तत्व काम करते थे।
किसी व्यक्ति की कारोबारी प्रतिष्ठा खराब होने पर उसके द्वारा जारी दस्तावेजों को स्वीकार करना मुश्किल हो सकता था। इसलिए उस दौर की वित्तीय व्यवस्था में साख खुद एक आर्थिक संपत्ति की तरह काम करती थी।
UPI से पहले भी भारत में था कम-कैश कारोबार
आज हम QR कोड स्कैन करके कुछ सेकेंड में भुगतान कर देते हैं। एक क्लिक में पैसा एक बैंक खाते से दूसरे खाते में पहुंच जाता है। लेकिन भारत में कम नकदी के साथ व्यापार करने का विचार सदियों पुराना है।
मुगल काल और उसके बाद के व्यापारिक दौर में हुंडी ने व्यापारियों को लंबी दूरी के लेन-देन में मदद की। कागज पर लिखी साख, व्यापारिक नेटवर्क और भरोसे के सहारे बड़ी रकम के भुगतान को अपेक्षाकृत आसान बनाया जाता था।
इस लिहाज से हुंडी भारतीय वित्तीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो बताता है कि कैशलेस कारोबार की बुनियादी सोच डिजिटल युग की देन नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब भुगतान का माध्यम कागज और व्यापारिक साख थी, जबकि आज वही काम बैंकिंग नेटवर्क और इंटरनेट आधारित डिजिटल सिस्टम कर रहे हैं।


