नई दिल्ली: अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सख्ती बढ़ाने की तैयारी एक बार फिर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा रही है। अमेरिकी संसद में पेश एक नए बिल के तहत राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदते हैं। इस प्रस्तावित कानून का सबसे बड़ा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है, क्योंकि दोनों ही रूस के प्रमुख तेल खरीदार हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल टैरिफ की धमकी के कारण भारत का रूसी तेल खरीदना बंद करना आसान नहीं होगा। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रिफाइनिंग उद्योग और आयात लागत काफी हद तक रूसी कच्चे तेल पर निर्भर हो चुकी है।
Highlights
- अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ का प्रस्ताव।
- भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50-55% तक।
- नए बिल से राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की व्यापक शक्ति मिल सकती है।
- विशेषज्ञ बोले- सिर्फ टैरिफ की वजह से भारत खरीद बंद नहीं करेगा।
- रूस से तेल कम होने पर पेट्रोल-डीजल और आयात बिल पर बढ़ सकता है दबाव।
क्या है अमेरिका का नया 100% टैरिफ वाला बिल?
अमेरिका में पेश किए गए ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act 2026’ के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार देने का प्रस्ताव है कि वे रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक आयात शुल्क (Tariff) लगा सकें।
प्रस्ताव के अनुसार, हर 180 दिन में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) रूस से सबसे अधिक ऊर्जा खरीदने वाले पांच देशों की समीक्षा करेगा। इसके बाद राष्ट्रपति तय करेंगे कि किन देशों पर टैरिफ लगाया जाए और किन्हें छूट दी जाए।
किन देशों पर सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है?
रूस से सबसे अधिक तेल और ऊर्जा खरीदने वाले देशों में शामिल हैं—
- भारत
- चीन
- हंगरी
- स्लोवाकिया
- अजरबैजान
हालांकि, यदि कोई देश अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का 15% से कम हिस्सा रूस से खरीदता है और रूस पर निर्भरता कम करने के प्रयास करता है, तो उसे इस प्रस्तावित व्यवस्था में राहत मिल सकती है।
भारत के लिए रूसी तेल क्यों है इतना अहम?
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। आज स्थिति यह है कि भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50-55% हिस्सा रूस से आता है।
कम कीमत पर मिलने वाले इस तेल ने भारतीय रिफाइनरियों की लागत घटाने और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है।
क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी संभावना फिलहाल बेहद कम है।
Kpler के ऊर्जा विशेषज्ञ सुमित रितोलिया के अनुसार, जब तक शिपिंग, बीमा और भुगतान प्रणाली पर कठोर प्रतिबंध नहीं लगाए जाते, तब तक भारतीय कंपनियां रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद नहीं करेंगी।
वहीं ICRA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि केवल टैरिफ लगने की संभावना से भारत अपनी ऊर्जा खरीद नीति में बड़ा बदलाव नहीं करेगा। भारत अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता देगा।
अगर रूस से तेल कम खरीदा गया तो क्या होगा?
यदि भारत को रूस से तेल आयात कम करना पड़ा, तो उसे प्रतिदिन लगभग 8 से 10 लाख बैरल अतिरिक्त तेल दूसरे देशों से खरीदना पड़ सकता है।
इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है—
- तेल आयात महंगा होगा।
- रिफाइनरियों की लागत बढ़ेगी।
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
- सरकार का आयात बिल बढ़ेगा।
- चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत केवल 1 डॉलर प्रति बैरल भी बढ़ती है, तो भारत का सालाना आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
रूस के विकल्प कौन-कौन से हैं?
यदि भविष्य में रूस से तेल खरीदना मुश्किल होता है, तो भारत निम्न देशों से आयात बढ़ा सकता है—
- इराक
- सऊदी अरब
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
- अमेरिका
- ब्राजील
- गुयाना
- पश्चिम अफ्रीकी देश
- वेनेजुएला
हालांकि इन देशों से तेल लाने में दूरी अधिक होने के कारण परिवहन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ रूस का विकल्प तुरंत उपलब्ध मानने को तैयार नहीं हैं।
क्या यह बिल अभी कानून बन गया है?
नहीं। यह प्रस्तावित बिल अभी अमेरिकी संसद में विचाराधीन है।
इसे कुछ रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसदों का समर्थन मिला है, लेकिन कई सांसद इसका विरोध भी कर रहे हैं। विरोध की प्रमुख वजह यह है कि इससे अमेरिकी राष्ट्रपति को किसी भी देश पर भारी टैरिफ लगाने की व्यापक शक्ति मिल जाएगी।
फिलहाल अमेरिकी संसद का निचला सदन (House of Representatives) अवकाश पर है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि यह बिल कब तक पारित होगा।
भारत पर 100% टैरिफ लगने की कितनी संभावना?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह बिल कानून बन भी जाता है, तब भी भारत पर 100% टैरिफ लगना स्वतः तय नहीं होगा।
अंतिम फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति और प्रशासन के हाथ में होगा। अमेरिका को यह भी ध्यान रखना होगा कि रूस पर अत्यधिक दबाव डालने से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई न बढ़ जाए।
यानी फिलहाल भारत पर 100% टैरिफ लगने की संभावना को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन यदि यह कानून बनता है तो अमेरिका के पास ऐसा कदम उठाने का कानूनी आधार जरूर होगा।


