नई दिल्ली: वैश्विक चीनी बाजार (Global Sugar Market) इस समय सप्लाई की अनिश्चितता और बढ़ती कीमतों के दौर से गुजर रहा है। दुनिया भर में चीनी की संभावित कमी (Sugar Deficit) की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों को ऊपर पहुंचा दिया है। ब्राजील में उत्पादन घटने, अल नीनो के प्रभाव और भू-राजनीतिक तनावों के कारण निवेशकों और ट्रेडर्स की चिंता बढ़ गई है। ऐसे में दुनिया की निगाहें अब भारत पर टिकी हैं, जहां 2026-27 सीजन में चीनी उत्पादन बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
हाईलाइट्स
- वैश्विक चीनी कीमतें 15 सेंट प्रति पाउंड के पार पहुंचीं।
- विश्लेषकों ने चीनी बाजार में घाटे का अनुमान बढ़ाया।
- ब्राजील में उत्पादन घटने से सप्लाई पर दबाव।
- भारत का उत्पादन बढ़ने से वैश्विक बाजार को राहत मिलने की उम्मीद।
- अल नीनो और भू-राजनीतिक तनाव बने हुए हैं बड़ी चुनौती।
क्यों बढ़ रही हैं वैश्विक चीनी कीमतें?
अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में चीनी की कीमतों में हाल के दिनों में तेज उछाल देखने को मिला है। न्यूयॉर्क स्थित इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE) पर अक्टूबर डिलीवरी वाले रॉ शुगर कॉन्ट्रैक्ट 15.10 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड के स्तर पर कारोबार करते दिखाई दिए। वहीं लंदन में अक्टूबर डिलीवरी वाली सफेद चीनी की कीमत 475.50 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया में चीनी की उपलब्धता कम होने की आशंका के कारण ट्रेडर्स लगातार खरीदारी कर रहे हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
सप्लाई को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में भू-राजनीतिक तनाव कम होते हैं और उत्पादन अनुमान से बेहतर रहता है तो इस तिमाही और अगली तिमाही में कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है।
लेकिन दूसरी ओर अल नीनो (El Niño) का प्रभाव अब भी दुनिया के कई प्रमुख चीनी उत्पादक देशों पर बना हुआ है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां गन्ने की पैदावार को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
चीनी घाटे का अनुमान काफी बढ़ा
कमोडिटी रिसर्च एजेंसियों ने भी अपने अनुमानों में बड़ा बदलाव किया है।
- Covrig Analytics ने पहले जहां 1 लाख टन सरप्लस का अनुमान लगाया था, अब उसने वैश्विक बाजार में लगभग 3 लाख टन की कमी का अनुमान जताया है।
- वहीं Green Pool Commodity Specialists ने भी अपना अनुमान संशोधित करते हुए पहले के 17.6 लाख टन के अनुमान की तुलना में अब 33 लाख टन (3.3 मिलियन टन) के वैश्विक घाटे की संभावना जताई है।
इन संशोधित अनुमानों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी को और मजबूती दी है।
ब्राजील के उत्पादन में गिरावट बनी बड़ी वजह
ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और निर्यातक देश है। इसके अलावा भारत और थाईलैंड भी वैश्विक चीनी सप्लाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रिसर्च एजेंसी BMI के अनुसार, 2026-27 सीजन में ब्राजील का चीनी उत्पादन लगभग 42 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 4.1 प्रतिशत कम है। इसका प्रमुख कारण अल नीनो से प्रभावित मौसम और उत्पादन में आई गिरावट है।
यदि ब्राजील में उत्पादन उम्मीद से कम रहता है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई और अधिक प्रभावित हो सकती है।
भारत पर क्यों टिकी हैं दुनिया की निगाहें?
भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में शामिल है। पिछले कुछ समय में घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत ने चीनी निर्यात पर प्रतिबंध लगाए थे। अब जबकि वैश्विक बाजार में कमी की आशंका बढ़ रही है, भारत का उत्पादन पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण बन गया है।
BMI का अनुमान है कि भारत का चीनी उत्पादन 2026-27 सीजन में 33 मिलियन टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत अधिक होगा।
यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो भारत न केवल अपनी घरेलू मांग को आसानी से पूरा कर सकेगा, बल्कि भविष्य में वैश्विक बाजार की सप्लाई को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
घरेलू बाजार पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। हालांकि भारत में पर्याप्त उत्पादन की संभावना और सरकारी नीतियां फिलहाल घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती हैं।
यदि उत्पादन अनुमान के अनुरूप बढ़ता है तो भविष्य में निर्यात नीति में भी बदलाव देखने को मिल सकता है। वहीं मौसम की स्थिति और वैश्विक मांग आगे की दिशा तय करेगी।
आगे क्या रहेगा बाजार का फोकस?
आने वाले महीनों में वैश्विक चीनी बाजार की दिशा मुख्य रूप से इन कारकों पर निर्भर करेगी—
- ब्राजील और भारत में वास्तविक उत्पादन।
- अल नीनो का असर कितना रहता है।
- भू-राजनीतिक तनावों की स्थिति।
- वैश्विक मांग और निर्यात नीतियों में बदलाव।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत के उत्पादन आंकड़ों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि भारतीय उत्पादन उम्मीद के मुताबिक बढ़ता है तो वैश्विक चीनी बाजार में बनी कमी की आशंका काफी हद तक कम हो सकती है।


