Snake Venom Research: सांप के जहर से होने वाली मौतों को रोकने की दिशा में वैज्ञानिकों ने बड़ी सफलता हासिल की है। शोधकर्ताओं ने जहरीले सांपों के खून में ऐसे प्राकृतिक प्रोटीन खोजे हैं, जो उनके अपने ही विष को बेअसर करने की क्षमता रखते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में अधिक प्रभावी, सुरक्षित और किफायती एंटीवेनम विकसित करने का रास्ता खोल सकती है। इससे हर साल लाखों लोगों की जान बचाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
सांप के शरीर में ही छिपा मिला जहर का इलाज
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के वैज्ञानिकों ने अपनी नई रिसर्च में पाया कि जहरीले सांपों के शरीर में मौजूद कुछ विशेष प्रोटीन उनके अपने जहर से उन्हें सुरक्षित रखते हैं। यही प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र अब इंसानों के लिए नई पीढ़ी के एंटीवेनम विकसित करने की प्रेरणा बन सकता है।
रिसर्च टीम का मानना है कि यदि इन प्रोटीनों को प्रयोगशाला में विकसित किया जाए, तो ऐसे एंटीवेनम तैयार किए जा सकते हैं जो मौजूदा उपचार की तुलना में अधिक प्रभावी और कम दुष्प्रभाव वाले होंगे।
सांप खुद अपने जहर से क्यों नहीं मरते?
यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों को परेशान करता रहा है कि जहरीले सांप अपने ही विष से प्रभावित क्यों नहीं होते।
रिसर्च टीम के प्रमुख सीन बी. कैरोल के अनुसार, सांपों के शरीर में मौजूद विशेष सुरक्षा प्रोटीन उनके जहर के खतरनाक टॉक्सिन को निष्क्रिय कर देते हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने इस समस्या का समाधान पहले से ही तैयार कर रखा था, जिसे अब वैज्ञानिक समझने में सफल हो रहे हैं।
हर साल लाखों लोग बनते हैं शिकार
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक दुनिया भर में हर साल लगभग 80 हजार से 1.40 लाख लोगों की मौत जहरीले सांपों के काटने से होती है। इसके अलावा लाखों लोग स्थायी विकलांगता या गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं।
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में समय पर इलाज और एंटीवेनम उपलब्ध न होने के कारण यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
मौजूदा एंटीवेनम की क्या हैं सीमाएं?
आज इस्तेमाल होने वाले अधिकांश एंटीवेनम घोड़ों या भेड़ों जैसे जानवरों में नियंत्रित मात्रा में सांप का जहर डालकर तैयार किए जाते हैं। इसके बाद उनके शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी को दवा के रूप में उपयोग किया जाता है।
हालांकि इस प्रक्रिया की कई चुनौतियां हैं।
- सभी सांपों के जहर पर समान रूप से प्रभावी नहीं होते।
- उत्पादन प्रक्रिया काफी महंगी होती है।
- कई मरीजों में एलर्जी और गंभीर इम्यून रिएक्शन का खतरा रहता है।
- अलग-अलग प्रजातियों के लिए अलग एंटीवेनम की जरूरत पड़ती है।
FETUA-3 प्रोटीन बना नई उम्मीद
वैज्ञानिकों ने पहली बार वर्ष 2022 में FETUA-3 नामक सुरक्षा प्रोटीन की पहचान की थी। यह प्रोटीन सांप के जहर में मौजूद खतरनाक टॉक्सिन परिवार को रोकने की क्षमता रखता है।
नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने FETUA प्रोटीन परिवार के कई अलग-अलग रूपों का परीक्षण किया। जब इन प्रोटीनों को मिलाकर मिश्रण तैयार किया गया तो उसकी विष निष्क्रिय करने की क्षमता पहले से कहीं अधिक प्रभावी पाई गई।
पुराने एंटीवेनम से 10 गुना ज्यादा असरदार
प्रयोगशाला परीक्षणों में वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए इस प्रोटीन मिश्रण ने मौजूदा भेड़-आधारित एंटीवेनम की तुलना में करीब 10 गुना अधिक प्रभावशीलता दिखाई।
शोध के दौरान यह मिश्रण—
- रैटलस्नेक के जहर को पूरी तरह निष्क्रिय करने में सफल रहा।
- कई अन्य वाइपर प्रजातियों के विष के खिलाफ भी सुरक्षा प्रदान कर सका।
- भविष्य में व्यापक प्रभाव वाले एंटीवेनम विकसित करने की संभावना मजबूत हुई।
अब कई तरह के विषैले टॉक्सिन पर चल रहा शोध
वैज्ञानिक अब इसी तकनीक का उपयोग सांपों के अन्य प्रमुख विषैले टॉक्सिन समूहों पर भी कर रहे हैं। यदि यह रिसर्च सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में प्रयोगशाला में तैयार ऐसे एंटीवेनम विकसित किए जा सकेंगे जो कई अलग-अलग प्रजातियों के जहरीले सांपों के खिलाफ एक साथ प्रभावी होंगे।
इससे इलाज की लागत भी कम हो सकती है और एंटीवेनम का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सकेगा।
पहले पशु चिकित्सा में हो सकता है इस्तेमाल
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक का शुरुआती व्यावसायिक उपयोग पशु चिकित्सा (Veterinary Medicine) में किया जा सकता है। इसके सफल होने के बाद इसे इंसानों के इलाज के लिए विकसित किया जाएगा।
यदि आगे के क्लीनिकल परीक्षण सफल रहते हैं, तो यह खोज भविष्य में सांप के जहर के इलाज की पूरी प्रणाली को बदल सकती है और दुनिया भर में लाखों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
निष्कर्ष
सांपों के शरीर में मौजूद प्राकृतिक सुरक्षा प्रोटीनों की यह खोज चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। FETUA-3 जैसे प्रोटीन भविष्य में ऐसे आधुनिक एंटीवेनम विकसित करने का आधार बन सकते हैं जो अधिक सुरक्षित, सस्ते और कई तरह के जहरीले सांपों के खिलाफ प्रभावी हों। यदि यह तकनीक सफलतापूर्वक इंसानों तक पहुंचती है, तो आने वाले समय में सांप काटने से होने वाली मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।


