भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक से पहले देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की रिसर्च रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इस बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7% से अधिक रह सकती है।
रिपोर्ट में महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार, रुपये की स्थिति, मानसून और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में बढ़ते निवेश जैसे कई अहम पहलुओं का भी विश्लेषण किया गया है।
Highlights
- अगस्त 2026 की MPC बैठक में रेपो रेट स्थिर रहने का अनुमान
- अगले दो तिमाहियों तक खुदरा महंगाई 5% से ऊपर रहने की संभावना
- FY27 की पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7% से अधिक रहने का अनुमान
- विदेशी मुद्रा भंडार में 12.5 अरब डॉलर की बढ़ोतरी
- AI सेक्टर में जरूरत से ज्यादा निवेश से ‘AI Bubble’ का खतरा
- बेहतर मानसून से ग्रामीण मांग मजबूत होने की उम्मीद
अगस्त MPC बैठक में रेपो रेट पर क्या होगा फैसला?
SBI रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, 3 से 5 अगस्त 2026 के बीच होने वाली RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में रेपो रेट को मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखा जा सकता है। नीतिगत फैसलों की घोषणा 5 अगस्त को होगी।
रिपोर्ट का कहना है कि अगले दो तिमाहियों तक खुदरा महंगाई (CPI Inflation) 5% से ऊपर रहने की संभावना है। ऐसे में केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती करना फिलहाल उचित नहीं माना जा रहा।
महंगाई बनी सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि हाल के महीनों में कई आर्थिक संकेतकों में सुधार देखने को मिला है, लेकिन महंगाई अब भी RBI की चिंता बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक,
- CPI महंगाई अगले दो तिमाहियों तक 5% से ऊपर रह सकती है।
- कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है।
- रुपये पर दबाव और वैश्विक पूंजी प्रवाह में अनिश्चितता बनी हुई है।
- इसलिए RBI के नरम रुख अपनाने की संभावना फिलहाल कम है।
GDP ग्रोथ 7% से ऊपर रहने की उम्मीद
SBI रिसर्च ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक अनुमान भी दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1) में देश की GDP Growth 7% से अधिक रह सकती है।
इससे पहले RBI ने पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए पहली तिमाही के विकास अनुमान को 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया था। लेकिन अब हालात में सुधार के कारण वास्तविक वृद्धि पहले के अनुमान से बेहतर रहने की उम्मीद जताई गई है।
विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिति में सुधार
रिपोर्ट के अनुसार जुलाई महीने में भारत में लगभग 35 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह (Capital Inflow) दर्ज किया गया।
इसके अलावा,
- 24 जुलाई तक विदेशी मुद्रा भंडार में 12.5 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।
- जून के अंत तक तीन महीने की अवधि वाले फॉरवर्ड पोजीशन में 13 अरब डॉलर की कमी आई।
- इससे विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव कम हुआ और रुपये को भी सहारा मिला।
SBI का मानना है कि RBI ने फॉरवर्ड मार्केट में सक्रिय रणनीति अपनाकर रुपये पर अल्पकालिक दबाव को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है।
बेहतर मानसून से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
रिपोर्ट में मानसून को लेकर भी सकारात्मक तस्वीर पेश की गई है।
- जुलाई में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई।
- वर्षा की कमी घटकर केवल 13% रह गई।
- देश के प्रमुख जलाशयों का जलस्तर लगभग सामान्य है।
- खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 4.7% कम रही।
इन परिस्थितियों से आने वाले महीनों में ग्रामीण मांग और कृषि गतिविधियों को मजबूती मिलने की उम्मीद है, जिसका सकारात्मक असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
AI सेक्टर में बबल बनने का खतरा
SBI रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में AI को लेकर भारी निवेश और ऊंची उम्मीदों का दौर चल रहा है। कई कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर जरूरत से ज्यादा खर्च कर रही हैं। यदि निवेश की रफ्तार वास्तविक मांग से अधिक रही तो भविष्य में AI Bubble बनने का खतरा पैदा हो सकता है।
रिपोर्ट का कहना है कि तकनीकी क्रांतियों के शुरुआती दौर में अक्सर अत्यधिक निवेश और सट्टेबाजी देखने को मिलती है और AI भी इससे अछूता नहीं है।
निवेशकों और आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब?
यदि RBI अगस्त की बैठक में रेपो रेट को स्थिर रखता है तो फिलहाल होम लोन, ऑटो लोन और अन्य फ्लोटिंग ब्याज दर वाले कर्जों की EMI में तत्काल कोई बदलाव नहीं होगा। वहीं, महंगाई पर नजर बनाए रखते हुए केंद्रीय बैंक भविष्य की आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर आगे का फैसला ले सकता है।
दूसरी ओर, GDP ग्रोथ का मजबूत अनुमान, बेहतर मानसून और विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं। हालांकि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतें और AI सेक्टर में बढ़ता निवेश आने वाले समय में प्रमुख जोखिम बने रह सकते हैं।


