Billing Game News: अगर आपने कभी रेस्टोरेंट में खाना खाने और उसी डिश को ऑनलाइन ऑर्डर करने की कीमत की तुलना की है, तो आपने जरूर महसूस किया होगा कि ऐप पर वही खाना काफी महंगा दिखता है। अब इस कीमत के अंतर को लेकर बेंगलुरु के होटल और रेस्टोरेंट मालिकों ने खुलकर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स के जटिल कमीशन और चार्ज स्ट्रक्चर के कारण न केवल ग्राहकों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है, बल्कि रेस्टोरेंट्स का मुनाफा भी लगातार घट रहा है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों?
बेंगलुरु के कई होटल और रेस्टोरेंट संचालकों ने ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स के बिजनेस मॉडल पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स ने शुरुआती दौर में ग्राहकों तक पहुंच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन अब बढ़ते कमीशन और अतिरिक्त शुल्क उनके लिए आर्थिक रूप से भारी पड़ रहे हैं।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, होटल उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि मौजूदा सिस्टम पारदर्शी नहीं है और कई तरह के शुल्क ऐसे हैं जिनकी जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं दी जाती।
₹30 की इडली ऑनलाइन ₹90 कैसे पहुंच जाती है?
बेंगलुरु की लोकप्रिय By2 Coffee चेन के संस्थापक राघवेंद्र पादुकोण ने इस मुद्दे को उदाहरण के साथ समझाया। उनका कहना है कि जो इडली किसी रेस्टोरेंट में 30 से 35 रुपये में मिलती है, वही ऑनलाइन ऑर्डर करने पर 80 से 90 रुपये तक पहुंच जाती है।
उनका मानना है कि खाने की मूल कीमत रेस्टोरेंट और ऐप दोनों जगह समान होनी चाहिए। यदि कोई अतिरिक्त राशि ली जाती है तो वह केवल डिलीवरी सेवा के लिए होनी चाहिए, न कि कई तरह के छिपे हुए शुल्क जोड़कर।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रेस्टोरेंट मालिक फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स के विरोध में नहीं हैं, बल्कि मौजूदा बिलिंग और कमीशन मॉडल में सुधार चाहते हैं।
रेस्टोरेंट मालिकों की कमाई कहां-कहां कटती है?
रेस्टोरेंट संचालकों के मुताबिक एक ऑर्डर पूरा होने के बाद कई स्तरों पर पैसे काटे जाते हैं। इनमें शामिल हैं—
- प्रति ऑर्डर कमीशन
- प्लेटफॉर्म शुल्क
- कलेक्शन चार्ज
- पेमेंट गेटवे शुल्क
- सर्विस चार्ज पर जीएसटी
- कैंसिलेशन चार्ज
- लंबी दूरी (Long Distance) शुल्क
- प्रमोशनल और डिस्काउंट कैंपेन का खर्च
- विज्ञापन शुल्क
उनका दावा है कि इन सभी कटौतियों के बाद कई मामलों में उन्हें वास्तविक बिक्री का आधा हिस्सा भी नहीं मिल पाता, जिससे प्रॉफिट मार्जिन काफी कम हो जाता है।
बिना अनुमति डिस्काउंट और विज्ञापन का आरोप
कर्नाटक स्टेट होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष जी.के. शेट्टी का आरोप है कि कई बार फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स रेस्टोरेंट की स्पष्ट सहमति के बिना डिस्काउंट ऑफर और विज्ञापन अभियान शुरू कर देते हैं।
रेस्टोरेंट मालिकों का कहना है कि इन प्रमोशनल ऑफर्स का पूरा खर्च अंततः उन्हीं से वसूला जाता है। उनका तर्क है कि केवल ईमेल भेज देना किसी भी तरह की व्यावसायिक सहमति नहीं माना जा सकता।
“20% कमीशन तय है तो उससे ज्यादा क्यों कटता है?”
बैंगलोर होटल्स एसोसिएशन के मानद अध्यक्ष पी.सी. राव ने कहा कि यदि किसी समझौते में 20% कमीशन तय हुआ है तो उसी सीमा तक कटौती होनी चाहिए।
उनका कहना है कि रेस्टोरेंट मालिकों को उम्मीद रहती है कि कुल कटौती के बाद उन्हें कम से कम 70% राशि मिलेगी, लेकिन कई मामलों में उनके हाथ में केवल 30% से 40% तक ही बचता है। उनका आरोप है कि तय कमीशन के अलावा कई अतिरिक्त और छिपे हुए शुल्क जोड़ दिए जाते हैं।
रेस्टोरेंट मालिकों की प्रमुख मांगें
होटल और रेस्टोरेंट संगठनों ने फूड डिलीवरी कंपनियों के सामने कई मांगें रखी हैं—
- कुल सर्विस चार्ज और सभी कटौतियों को मिलाकर अधिकतम 20% तक सीमित किया जाए।
- तय कमीशन के अलावा कोई छिपा हुआ शुल्क न लगाया जाए।
- किसी भी डिस्काउंट, विज्ञापन या प्रमोशनल अभियान से पहले रेस्टोरेंट की स्पष्ट अनुमति या OTP आधारित सहमति ली जाए।
- सभी कटौतियों का विस्तृत और पारदर्शी सेटलमेंट स्टेटमेंट उपलब्ध कराया जाए।
- शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी एस्केलेशन सिस्टम बनाया जाए।
- सर्विस चार्ज पर लगने वाले GST की समीक्षा की जाए।
- फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स केवल सेवा प्रदाता (Service Provider) की भूमिका तक सीमित रहें और निष्पक्ष बिलिंग मॉडल अपनाएं।
ग्राहकों पर भी पड़ रहा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का असर केवल रेस्टोरेंट मालिकों तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन ऑर्डर करने वाले ग्राहकों को भी कई तरह के शुल्क—जैसे डिलीवरी फीस, प्लेटफॉर्म फीस, पैकेजिंग चार्ज और टैक्स—के कारण वास्तविक कीमत से कहीं अधिक भुगतान करना पड़ता है। यही वजह है कि एक साधारण डिश, जो रेस्टोरेंट में सस्ती मिलती है, ऐप पर कई गुना महंगी दिखाई देती है।


