केयरएज रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर दोनों मार्ग बाधित हुए तो ब्रेंट क्रूड 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। जानिए भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और व्यापार पर इसका क्या असर होगा।
India Oil Imports: होर्मुज और लाल सागर संकट से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया बड़ा खतरा
नई दिल्ली: भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) एक बड़े भू-राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) और लाल सागर (Red Sea) में बढ़ते तनाव ने दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल भारत की चिंता बढ़ा दी है। रेटिंग एजेंसी केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यदि दोनों समुद्री मार्गों पर एक साथ व्यवधान पैदा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 130 से 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।
ऐसी स्थिति में भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा, महंगाई पर दबाव बढ़ेगा और रुपये की विनिमय दर पर भी असर देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का करीब 40% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए आता है। इसके अलावा एलएनजी (LNG) और एलपीजी (LPG) की बड़ी आपूर्ति भी इसी समुद्री मार्ग से होती है।
मई 2026 में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के दौरान होर्मुज क्षेत्र में जोखिम बढ़ने से ब्रेंट क्रूड की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हाल के दिनों में यह फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार करता देखा गया।
पश्चिम एशिया संकट से भारत को लगा ऊर्जा झटका
केयरएज की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 से जारी पश्चिम एशिया संकट ने भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बनाया है। हालांकि रूस सहित अन्य देशों से विविध स्रोतों के जरिए तेल खरीदने की रणनीति ने अब तक भारत को राहत दी है।
लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य में बढ़ते जोखिम के कारण युद्ध-जोखिम बीमा (War Risk Insurance) का प्रीमियम 1,000% तक बढ़ गया है, जिससे शिपिंग लागत में भारी इजाफा हुआ है।
हूती विद्रोहियों के हमलों से बढ़ी चिंता
यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में व्यापारिक जहाजों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है तथा ईरानी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई होती है, तो बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य भी प्रभावित हो सकता है।
यदि ऐसा हुआ तो एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग बाधित हो सकता है।
क्या हैं ये दोनों रणनीतिक समुद्री मार्ग?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
- फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है।
- दुनिया के लगभग 20% तेल व्यापार का आवागमन इसी रास्ते से होता है।
- वैश्विक LNG व्यापार का करीब एक-तिहाई हिस्सा भी यहीं से गुजरता है।
बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य
- हिंद महासागर को लाल सागर और स्वेज नहर से जोड़ता है।
- एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है।
- इस मार्ग में रुकावट आने पर जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।
भारत के व्यापार पर क्या होगा असर?
रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुल निर्यात का लगभग 50% और आयात का करीब 30% लाल सागर मार्ग से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग प्रभावित होता है तो भारतीय निर्यातकों और आयातकों दोनों की लागत बढ़ जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सप्लाई चेन प्रभावित होगी और कई उद्योगों में उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
महंगाई और रुपये पर बढ़ सकता है दबाव
यदि कच्चे तेल की कीमतें 130-135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं तो भारत की अर्थव्यवस्था पर कई मोर्चों पर दबाव बढ़ सकता है।
- कच्चे तेल का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा।
- चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है।
- महंगाई में तेजी आने की आशंका रहेगी।
- डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
- माल ढुलाई और शिपिंग लागत में भारी वृद्धि होगी।
- जहाजों की डिलीवरी में 2 से 3 सप्ताह तक की अतिरिक्त देरी हो सकती है।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
ऊर्जा और परिवहन लागत बढ़ने का असर कई उद्योगों पर दिखाई दे सकता है।
- कच्चा तेल एवं पेट्रोलियम
- एलपीजी और एलएनजी
- उर्वरक उद्योग
- विमानन क्षेत्र
- प्लास्टिक एवं पैकेजिंग उद्योग
- बासमती चावल निर्यात
- रसायन उद्योग
इन क्षेत्रों में लागत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है।
MSMEs के लिए बढ़ सकती हैं मुश्किलें
केयरएज रेटिंग्स की वरिष्ठ निदेशक प्रीति अग्रवाल के अनुसार दोनों समुद्री मार्गों में रुकावट आने से केवल ऊर्जा की कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी, बल्कि वैश्विक बंदरगाहों पर भी भीड़ और माल ढुलाई लागत में भी भारी इजाफा होगा।
वहीं निदेशक पुनीत कंसल का कहना है कि बड़ी कंपनियां इस झटके का कुछ हद तक सामना कर सकती हैं, लेकिन सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) के लिए लाभ मार्जिन बचाना और वर्किंग कैपिटल की व्यवस्था करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों मार्गों पर एक साथ व्यवधान पैदा होता है तो यह केवल ऊर्जा संकट नहीं होगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और महंगाई पर भी व्यापक असर डाल सकता है। ऐसे समय में भारत के लिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का बेहतर उपयोग और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होगी।


