Russian Oil Imports: भारत ने वैश्विक व्यापार में भारतीय रुपये के इस्तेमाल को नई रफ्तार दी है। मार्च से मई 2026 के बीच देश ने करीब 15 अरब डॉलर (लगभग ₹1.44 लाख करोड़) के आयात का भुगतान सीधे भारतीय रुपये में किया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़े बताते हैं कि यह अब तक का सबसे बड़ा रुपया-आधारित आयात भुगतान है। इसकी सबसे बड़ी वजह रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल की खरीदारी रही, जिसने डॉलर पर निर्भरता कम करने और रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित किया।
रूस से तेल खरीदने से क्यों बढ़ा रुपये में व्यापार?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव देखने को मिले। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच रूस ने एशियाई देशों, खासकर भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराया। भारत ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए रूस से तेल आयात में लगातार बढ़ोतरी की।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च से मई 2026 के दौरान भारत ने रूस से 17.13 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 30% अधिक है। इस बड़े आयात का बड़ा हिस्सा भारतीय रुपये में चुकाया गया।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रुपये में भुगतान
RBI के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च से मई 2026 के बीच भारत के कुल आयात का 7.1% भुगतान भारतीय रुपये में हुआ। इससे पहले दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच यह हिस्सा केवल 2.4% था।
यानी केवल तीन महीनों में रुपये में हुआ आयात भुगतान ₹1.44 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो वित्त वर्ष 2023-24 के पूरे साल के ₹99,680 करोड़ के रिकॉर्ड से भी काफी अधिक है।
यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी मुद्रा के उपयोग को बढ़ाने में सफल हो रहा है।
कैसे काम करता है रुपया व्यापार?
आमतौर पर जब भारत किसी दूसरे देश से सामान खरीदता है तो भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। लेकिन रुपया व्यापार प्रणाली में प्रक्रिया अलग होती है।
भारतीय आयातक कंपनियां विदेशी बैंक के भारत स्थित वोस्ट्रो (Vostro) अकाउंट में भारतीय रुपये जमा करती हैं। इसके बाद वही राशि संबंधित विदेशी कंपनी या देश के उपयोग के लिए उपलब्ध रहती है।
इस व्यवस्था के कई फायदे हैं—
- भारत को हर बार डॉलर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
- विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) पर दबाव कम होता है।
- डॉलर विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का असर सीमित रहता है।
- व्यापारिक लेन-देन तेज और अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है।
रूस इन रुपयों का क्या करता है?
रूस को तेल बेचने के बदले जो भारतीय रुपये मिलते हैं, उनका इस्तेमाल वह भारत से अन्य उत्पाद खरीदने में कर सकता है।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- दवाइयां (Pharmaceuticals)
- कृषि उत्पाद और अनाज
- मशीनरी
- इंजीनियरिंग सामान
- केमिकल्स और अन्य औद्योगिक उत्पाद
इससे दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलित करने में भी मदद मिलती है।
डॉलर पर निर्भरता कम होने का क्या फायदा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में यदि तेल खरीदने के लिए हर बार डॉलर की जरूरत पड़े तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है।
रुपये में व्यापार बढ़ने से कई लाभ मिलते हैं—
- डॉलर की मांग कम होती है।
- रुपये पर दबाव घटता है।
- विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहता है।
- वैश्विक आर्थिक संकट या डॉलर की मजबूती का असर सीमित होता है।
- भारत की मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता मिलने लगती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि भविष्य में अधिक देश भारतीय रुपये में व्यापार स्वीकार करते हैं तो यह भारत की आर्थिक ताकत को और मजबूत करेगा।
निर्यात में अभी भी लंबा सफर बाकी
हालांकि आयात में रुपये का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, लेकिन निर्यात के मोर्चे पर स्थिति अभी उतनी मजबूत नहीं है।
भारत जब दूसरे देशों को सामान बेचता है, तब केवल 1.8% से 3.5% भुगतान ही भारतीय रुपये में प्राप्त होता है। बाकी अधिकांश भुगतान अभी भी अमेरिकी डॉलर या अन्य विदेशी मुद्राओं में किया जाता है।
इसका मतलब है कि रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मुद्रा के रूप में पूरी तरह स्थापित होने में अभी समय लगेगा।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत रूस के अलावा UAE, सऊदी अरब, अफ्रीकी देशों और अन्य व्यापारिक साझेदारों के साथ भी रुपये में व्यापार का दायरा बढ़ाता है, तो डॉलर पर निर्भरता और कम हो सकती है।
RBI भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय रुपये के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार नई व्यवस्थाएं विकसित कर रहा है। आने वाले वर्षों में रुपया व्यापार भारत की आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है।
निष्कर्ष
रूस से बढ़ती कच्चे तेल की खरीदारी ने भारत में रुपये आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। केवल तीन महीनों में ₹1.44 लाख करोड़ का आयात रुपये में होना इस बात का संकेत है कि भारत धीरे-धीरे डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि निर्यात में अभी भी रुपये की हिस्सेदारी सीमित है, लेकिन यदि यह रुझान जारी रहता है तो भविष्य में भारतीय रुपया वैश्विक व्यापार में कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।


