Dharmendra Pradhan Resigns: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की चर्चा देशभर में तेज है। NEET-UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक विवाद के बाद उनके पद छोड़ने को केंद्र सरकार की जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है। यदि इस घटनाक्रम को आधार माना जाए, तो वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद किसी बड़े सार्वजनिक विवाद के कारण इस्तीफा देने वाले धर्मेंद्र प्रधान दूसरे केंद्रीय मंत्री बन गए हैं। इससे पहले वर्ष 2018 में तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने #MeToo विवाद के बीच अपना पद छोड़ा था।
NEET-UG विवाद के बाद बढ़ा दबाव
देशभर में NEET-UG परीक्षा को लेकर छात्रों और अभिभावकों का विरोध लगातार बढ़ रहा था। दिल्ली के जंतर-मंतर समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए और परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए। इसी बीच धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को सरकार की ओर से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक कदम माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में छात्रों का भरोसा बहाल करना और सरकार की जवाबदेही का संदेश देना है।
2014 के बाद सार्वजनिक विवाद में इस्तीफा देने वाले दूसरे मंत्री
नरेंद्र मोदी सरकार के तीन कार्यकाल में कई बार मंत्रिमंडल का विस्तार और फेरबदल हुआ, लेकिन किसी बड़े सार्वजनिक विवाद के चलते मंत्री के इस्तीफे की घटनाएं बेहद कम रही हैं।
यदि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को इस श्रेणी में रखा जाए, तो वह 2014 के बाद ऐसे दूसरे केंद्रीय मंत्री हैं जिन्होंने बड़े सार्वजनिक विवाद के बीच पद छोड़ा है।
पहले मंत्री थे एम.जे. अकबर
इससे पहले 17 अक्टूबर 2018 को तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। उस समय #MeToo अभियान के दौरान कई महिला पत्रकारों ने उन पर आरोप लगाए थे।
विवाद बढ़ने के बाद एम.जे. अकबर ने कहा था कि वे व्यक्तिगत स्तर पर कानूनी लड़ाई लड़ना चाहते हैं और नहीं चाहते कि इससे सरकार के कामकाज पर असर पड़े। इसके बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया था।
हरसिमरत कौर बादल का मामला अलग क्यों था?
सितंबर 2020 में शिरोमणि अकाली दल (SAD) की नेता हरसिमरत कौर बादल ने भी मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दिया था, लेकिन उनका मामला अलग था।
उन्होंने तीन कृषि कानूनों के विरोध में मंत्री पद छोड़ा था। वे किसी व्यक्तिगत विवाद या सार्वजनिक आरोपों के केंद्र में नहीं थीं, इसलिए राजनीतिक विश्लेषक उनके इस्तीफे को धर्मेंद्र प्रधान और एम.जे. अकबर जैसे मामलों से अलग मानते हैं।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की चर्चा क्यों हो रही है?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, NEET-UG परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक को लेकर छात्रों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा था। ऐसे में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा सरकार की ओर से एक जवाबदेही वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के पीछे सरकार के दो प्रमुख उद्देश्य हो सकते हैं—
- छात्रों और अभिभावकों के बीच परीक्षा प्रणाली पर भरोसा बहाल करना।
- संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के बड़े हमलों को कम करते हुए विधायी कार्यों को सुचारु रूप से आगे बढ़ाना।
मोदी सरकार की कार्यशैली में जवाबदेही का संकेत
2014 के बाद केंद्र सरकार ने अधिकांश मामलों में तत्काल राजनीतिक इस्तीफे की बजाय विभागीय जांच, एजेंसियों की जांच या प्रशासनिक सुधारों को प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि सार्वजनिक विवादों के कारण मंत्रियों के इस्तीफे बेहद दुर्लभ रहे हैं।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सीधे तौर पर देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा से जुड़े विवाद और करोड़ों छात्रों की भावनाओं से जुड़ा मुद्दा था।
क्यों खास माना जा रहा है यह फैसला?
NEET-UG परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा विषय है। ऐसे में इस विवाद ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार ने इस फैसले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता सर्वोच्च प्राथमिकता है और छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जा रहा है।
निष्कर्ष
यदि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सार्वजनिक विवाद की श्रेणी में देखा जाए, तो वे वर्ष 2014 के बाद नरेंद्र मोदी सरकार में ऐसे दूसरे केंद्रीय मंत्री हैं जिन्होंने बड़े विवाद के बीच पद छोड़ा। इससे पहले वर्ष 2018 में एम.जे. अकबर ने #MeToo विवाद के दौरान इस्तीफा दिया था। वहीं हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा नीतिगत असहमति के कारण था, इसलिए दोनों मामलों की प्रकृति अलग मानी जाती है।


