US Court Blocks Trump H-1B Visa Fee: अमेरिका में नौकरी का सपना देखने वाले हजारों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। अमेरिका की एक संघीय अपील अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को बड़ा कानूनी झटका देते हुए नए H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब ₹95 लाख) की भारी-भरकम फीस लागू करने की कोशिश पर रोक हटाने से इनकार कर दिया है। अदालत के इस फैसले का मतलब है कि फिलहाल H-1B वीजा के लिए पुरानी फीस व्यवस्था ही लागू रहेगी और कंपनियों को लाखों रुपये अतिरिक्त नहीं चुकाने होंगे।
हाईलाइट्स
- H-1B वीजा पर $100,000 (करीब ₹95 लाख) फीस लागू करने पर कोर्ट की रोक बरकरार।
- ट्रंप प्रशासन को अमेरिकी अपील अदालत से बड़ा झटका।
- भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और अमेरिकी टेक कंपनियों को राहत।
- कोर्ट ने कहा- कांग्रेस की मंजूरी के बिना इतनी बड़ी फीस नहीं लगाई जा सकती।
- अंतिम फैसला आने तक पुरानी फीस व्यवस्था जारी रहेगी।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिका के बोस्टन स्थित फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स की तीन जजों की पीठ ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें H-1B वीजा पर प्रस्तावित 1 लाख डॉलर की फीस को गैर-कानूनी बताया गया था।
दरअसल, ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन जारी कर नए H-1B वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का ऐलान किया था। इस फैसले के खिलाफ 20 डेमोक्रेटिक शासित राज्यों के अटॉर्नी जनरल अदालत पहुंचे और इसे चुनौती दी।
कोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
यूएस डिस्ट्रिक्ट जज लियो टी. सोरोकिन ने 8 जून 2026 के अपने फैसले में कहा था कि इतनी बड़ी फीस वास्तव में एक तरह का ‘अवैध टैक्स’ है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- अमेरिकी संविधान के अनुसार इतनी बड़ी फीस या टैक्स लगाने के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है।
- राष्ट्रपति केवल कार्यकारी आदेश के जरिए इतना बड़ा वित्तीय बोझ नहीं डाल सकते।
- ट्रंप प्रशासन यह साबित नहीं कर पाया कि उसके पास ऐसा करने का वैधानिक अधिकार था।
अपील अदालत ने भी इसी तर्क से सहमति जताते हुए निचली अदालत के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।
ट्रंप प्रशासन का क्या था तर्क?
ट्रंप प्रशासन का कहना था कि कई अमेरिकी कंपनियां H-1B वीजा कार्यक्रम का इस्तेमाल कम लागत पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए करती हैं, जिससे अमेरिकी नागरिकों के रोजगार पर असर पड़ता है।
सरकार का तर्क था कि:
- भारी फीस लगाने से कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को कम स्पॉन्सर करेंगी।
- इससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
- H-1B सिस्टम के कथित दुरुपयोग पर रोक लगेगी।
हालांकि अदालत ने कहा कि नीति बनाना अलग बात है, लेकिन इतनी बड़ी फीस लगाने के लिए कानूनी अधिकार होना भी जरूरी है।
भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को कैसे मिली राहत?
भारत दुनिया में H-1B वीजा पाने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल है। हर साल हजारों भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट, एआई विशेषज्ञ, क्लाउड इंजीनियर और अन्य तकनीकी विशेषज्ञ इसी वीजा के जरिए अमेरिका में नौकरी करते हैं।
अगर 1 लाख डॉलर की फीस लागू हो जाती तो:
- अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय कर्मचारियों को नियुक्त करना काफी महंगा हो जाता।
- नई भर्ती में कमी आ सकती थी।
- भारतीय आईटी सेक्टर के पेशेवरों के लिए अमेरिका में अवसर घट सकते थे।
अदालत के फैसले के बाद फिलहाल यह खतरा टल गया है।
H-1B वीजा क्या है?
H-1B वीजा अमेरिका का एक विशेष रोजगार वीजा है, जिसके जरिए अमेरिकी कंपनियां विदेशी कुशल पेशेवरों को नियुक्त करती हैं।
इस वीजा का सबसे ज्यादा उपयोग इन क्षेत्रों में होता है:
- सूचना प्रौद्योगिकी (IT)
- सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट
- इंजीनियरिंग
- विज्ञान एवं अनुसंधान
- हेल्थकेयर
- फाइनेंस और डेटा साइंस
अमेरिका हर साल:
- 65,000 रेगुलर H-1B वीजा
- 20,000 अतिरिक्त वीजा अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर डिग्री प्राप्त उम्मीदवारों के लिए
जारी करता है। इनका बड़ा हिस्सा भारतीय पेशेवरों को मिलता है।
पहले कितनी थी फीस?
इस प्रस्ताव से पहले किसी H-1B कर्मचारी को स्पॉन्सर करने के लिए अमेरिकी कंपनियों को कुल मिलाकर औसतन 2,000 से 5,000 डॉलर तक की फीस और अन्य सरकारी शुल्क चुकाने पड़ते थे।
यदि 1 लाख डॉलर की नई फीस लागू हो जाती, तो स्पॉन्सरशिप की लागत कई गुना बढ़ जाती और विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करना कंपनियों के लिए बेहद महंगा हो जाता।
अब आगे क्या होगा?
अपील अदालत के फैसले के बाद फिलहाल ट्रंप प्रशासन 1 लाख डॉलर की नई फीस लागू नहीं कर सकता। जब तक मामले की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक H-1B वीजा आवेदन पुरानी फीस व्यवस्था के तहत ही स्वीकार किए जाएंगे।
यदि भविष्य में अंतिम फैसला भी इसी दिशा में आता है, तो ट्रंप प्रशासन को इस तरह की भारी फीस लागू करने के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेनी पड़ सकती है।
निष्कर्ष
अमेरिकी अपील अदालत का यह फैसला भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, अमेरिकी टेक कंपनियों और H-1B वीजा आवेदकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। फिलहाल लाखों रुपये की अतिरिक्त फीस का खतरा टल गया है और कंपनियां पहले की तरह सामान्य शुल्क पर विदेशी कुशल कर्मचारियों को स्पॉन्सर कर सकेंगी। हालांकि इस मामले की अंतिम कानूनी सुनवाई अभी बाकी है, इसलिए आगे के फैसले पर भी सभी की नजर रहेगी।


