Highlights
- चीन की GDP ग्रोथ दूसरी तिमाही में घटकर 4.3% रही
- 2022 की चौथी तिमाही के बाद सबसे धीमी आर्थिक वृद्धि
- प्रॉपर्टी निवेश में 18% की रिकॉर्ड गिरावट
- फिक्स्ड एसेट इन्वेस्टमेंट लगातार कमजोर पड़ रहा
- विशेषज्ञों ने जापान जैसी लंबी आर्थिक सुस्ती की आशंका जताई
- वैश्विक अर्थव्यवस्था और कमोडिटी बाजार पर पड़ सकता है असर
China Economy Slowdown: क्या चीन की आर्थिक रफ्तार अब थमने लगी है?
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन (China Economy) अब गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है। पिछले दो दशकों तक वैश्विक आर्थिक विकास (Global Economy) का सबसे बड़ा इंजन माने जाने वाले चीन की विकास दर लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चीन की GDP ग्रोथ घटकर 4.3% रह गई, जो 2022 की चौथी तिमाही के बाद सबसे धीमी वृद्धि दर है।
सरकार और बाजार विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि दूसरी तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था 4.5% से 5% के बीच बढ़ेगी, लेकिन वास्तविक आंकड़े अनुमान से कमजोर रहे। इससे साफ संकेत मिलता है कि चीन की आर्थिक रिकवरी अभी भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है।
पहली छमाही में भी कमजोर रही आर्थिक तस्वीर
इस साल की पहली तिमाही में चीन की GDP वृद्धि 5.0% रही थी, लेकिन दूसरी तिमाही की कमजोरी के कारण पहली छमाही की कुल आर्थिक वृद्धि घटकर 4.7% रह गई।
सिर्फ GDP ही नहीं, बल्कि निवेश से जुड़े आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। देश में फिक्स्ड एसेट इन्वेस्टमेंट में सालाना आधार पर 5.7% की गिरावट दर्ज की गई। इससे पहले जनवरी से मई के दौरान यह गिरावट 4.1% थी। यानी निवेश में गिरावट लगातार तेज होती जा रही है।
प्रॉपर्टी सेक्टर बना सबसे बड़ी चिंता
चीन की आर्थिक सुस्ती की सबसे बड़ी वजह उसका रियल एस्टेट सेक्टर माना जा रहा है। पहली छमाही में प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट में 18% की गिरावट दर्ज की गई, जो 1992 के बाद सबसे बड़ी गिरावट है।
रियल एस्टेट चीन की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा रहा है। इस सेक्टर की कमजोरी का असर स्टील, सीमेंट, निर्माण, बैंकिंग और स्थानीय सरकारों की आय पर भी पड़ रहा है। यही कारण है कि चीन की पूरी आर्थिक गतिविधि पर इसका व्यापक प्रभाव दिखाई दे रहा है।
उपभोक्ता खर्च भी नहीं दे रहा राहत
हालांकि जून महीने में रिटेल सेल्स में 1% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि मई में इसमें 0.6% की गिरावट आई थी। इसके बावजूद उपभोक्ता मांग अभी भी मजबूत नहीं मानी जा रही है।
सबसे बड़ी चिंता ऑटो सेक्टर से जुड़ी है, जहां वाहन खरीद में 16% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि लोग बड़े खर्च करने से बच रहे हैं और उपभोक्ता विश्वास अभी भी कमजोर बना हुआ है।
क्या चीन भी जापान जैसी लंबी सुस्ती में फंस सकता है?
आर्थिक विशेषज्ञों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं चीन भी जापान की तरह लंबे समय तक आर्थिक सुस्ती (Japanification) का शिकार तो नहीं हो जाएगा।
1990 के दशक में जापान दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था, लेकिन प्रॉपर्टी बबल फूटने के बाद वहां कई वर्षों तक धीमी ग्रोथ, कम महंगाई और कमजोर निवेश का दौर चला। अब चीन में भी रियल एस्टेट संकट, कमजोर मांग, गिरते निवेश और बढ़ते कर्ज जैसी चुनौतियां दिखाई दे रही हैं, जिससे ऐसी आशंकाएं मजबूत हो रही हैं।
दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?
चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और कमोडिटी की मांग का सबसे बड़ा केंद्र है। यदि चीन की आर्थिक रफ्तार लगातार कमजोर रहती है तो इसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
संभावित प्रभाव:
- वैश्विक व्यापार की रफ्तार धीमी हो सकती है।
- कच्चे तेल, स्टील और अन्य कमोडिटी की मांग प्रभावित हो सकती है।
- एशियाई बाजारों में निवेशकों की धारणा कमजोर हो सकती है।
- निर्यात आधारित देशों की आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ सकता है।
- वैश्विक शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
चीन की आर्थिक कमजोरी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है। हालांकि भारत की घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है, लेकिन यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी होती है तो आईटी, मेटल, केमिकल और निर्यात आधारित कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं कमोडिटी कीमतों में नरमी भारत जैसे आयातक देशों के लिए राहत भी साबित हो सकती है।
निष्कर्ष
चीन की दूसरी तिमाही के आर्थिक आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अभी भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। प्रॉपर्टी सेक्टर की कमजोरी, घटता निवेश और कमजोर उपभोक्ता मांग चीन की आर्थिक रिकवरी पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यदि आने वाली तिमाहियों में हालात नहीं सुधरे, तो चीन के सामने जापान जैसी लंबी आर्थिक सुस्ती का खतरा और गहरा सकता है। इसका असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर भी देखने को मिल सकता है।


