नई दिल्ली: दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक भारत में चावल की निर्यात कीमतें लगातार तीसरे सप्ताह बढ़ी हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह सरकार द्वारा ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) के तहत चावल की बिक्री के लिए ऊंची कीमतें तय करना और देश में कमजोर मानसून के कारण धान की बुवाई में कमी मानी जा रही है। दूसरी ओर, वैश्विक बाजार में भारतीय चावल की मांग मजबूत बनी हुई है, जबकि थाईलैंड और वियतनाम में कीमतों में स्थिरता या हल्की गिरावट देखने को मिली है।
भारतीय चावल के दाम में आई यह तेजी घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर डाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य नहीं हुआ और उत्पादन प्रभावित हुआ, तो आने वाले महीनों में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
Highlights
- लगातार तीसरे सप्ताह बढ़ी भारतीय चावल की निर्यात कीमतें।
- OMSS के तहत सरकार ने रिजर्व चावल की ऊंची कीमतें बरकरार रखीं।
- कमजोर मानसून से धान की बुवाई पिछले साल की तुलना में घटी।
- वैश्विक बाजार में भारतीय चावल की मांग मजबूत बनी हुई है।
- थाईलैंड और वियतनाम में कीमतें स्थिर या मामूली कमजोर रहीं।
भारतीय चावल की निर्यात कीमतें कितनी हैं?
निर्यात बाजार में 5 प्रतिशत टूटे हुए भारतीय उबले (Parboiled) चावल का भाव इस सप्ताह 352 से 357 डॉलर प्रति टन रहा। पिछले सप्ताह इसकी कीमत 348 से 352 डॉलर प्रति टन थी। इसी तरह 5 प्रतिशत टूटे हुए भारतीय सफेद चावल का निर्यात मूल्य भी 353 से 357 डॉलर प्रति टन के बीच दर्ज किया गया।
यानी लगातार तीसरे सप्ताह भारतीय चावल के दाम में बढ़ोतरी देखने को मिली है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत मांग और घरेलू नीतिगत फैसलों का असर माना जा रहा है।
सरकार के फैसले से क्यों बढ़े दाम?
कोलकाता के चावल व्यापारियों के अनुसार बाजार को उम्मीद थी कि सरकार ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) के तहत रिजर्व चावल की बिक्री कीमतों में राहत दे सकती है, जिससे खुले बाजार में दाम नरम पड़ते। लेकिन सरकार ने कीमतें कम करने के बजाय ऊंचे स्तर पर बनाए रखीं।
इस फैसले के बाद खुले बाजार में चावल की उपलब्धता महंगी बनी रही, जिसका सीधा असर निर्यात कीमतों पर भी पड़ा। व्यापारियों का कहना है कि सरकारी स्टॉक की ऊंची कीमतों ने निजी कारोबारियों की लागत बढ़ा दी, जिससे निर्यात दरों में भी इजाफा हुआ।
कमजोर मानसून ने बढ़ाई चिंता
इस वर्ष मानसून की रफ्तार उम्मीद से कमजोर रही है। मौसम संबंधी परिस्थितियों और अल नीनो के प्रभाव के कारण कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। इसका असर धान की बुवाई पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 10 जुलाई तक करीब 11.5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 12.6 मिलियन हेक्टेयर था।
बुवाई क्षेत्र में यह गिरावट भविष्य में उत्पादन कम होने की आशंका पैदा करती है, जिससे बाजार में कीमतों पर और दबाव बन सकता है।
बांग्लादेश में बाढ़ से फसल को नुकसान
भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में आई बाढ़ ने भी क्षेत्रीय चावल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। शुरुआती आकलन के अनुसार 12 जिलों में लगभग 28,610 हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई है, जिसमें धान की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है।
कृषि अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ का पानी पूरी तरह उतरने के बाद ही वास्तविक नुकसान का सही आकलन किया जा सकेगा। यदि नुकसान अधिक हुआ तो बांग्लादेश को अतिरिक्त आयात करना पड़ सकता है, जिससे वैश्विक मांग और बढ़ सकती है।
थाईलैंड में क्या है स्थिति?
दुनिया के प्रमुख चावल निर्यातकों में शामिल थाईलैंड में 5 प्रतिशत टूटे चावल की कीमत 445 से 450 डॉलर प्रति टन रही, जबकि पिछले सप्ताह यह करीब 450 डॉलर प्रति टन थी।
व्यापारियों के अनुसार फिलहाल केवल जरूरी खरीदारी हो रही है। फिलीपींस द्वारा थाईलैंड से 5 प्रतिशत टूटे चावल के आयात पर अस्थायी रोक लगाए जाने से मांग कमजोर हुई है। हालांकि बाजार में नई आपूर्ति बढ़ रही है, लेकिन अल नीनो के कारण भविष्य के उत्पादन को लेकर चिंता बनी हुई है।
वियतनाम में कीमतें स्थिर
वियतनाम में 5 प्रतिशत टूटे चावल का निर्यात मूल्य 445 से 450 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पर स्थिर बना हुआ है।
हो ची मिन्ह सिटी के व्यापारियों के मुताबिक खरीदार फिलहाल नई फसल के बाजार में आने का इंतजार कर रहे हैं। इसी वजह से कारोबार की गति धीमी बनी हुई है और कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया।
क्या आगे और बढ़ सकते हैं चावल के दाम?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले सप्ताहों में मानसून में सुधार नहीं हुआ और धान की बुवाई का अंतर बना रहा, तो घरेलू उत्पादन पर असर पड़ सकता है। साथ ही यदि सरकार OMSS के तहत कीमतों में राहत नहीं देती है, तो निर्यात और घरेलू दोनों बाजारों में चावल महंगा रह सकता है।
हालांकि नई फसल की आवक, मानसून की स्थिति और सरकार की आगे की नीतियां आने वाले महीनों में कीमतों की दिशा तय करेंगी।


