भारतीय रुपया एक बार फिर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, विदेशी निवेश (FPI) की लगातार निकासी, डॉलर की मजबूत मांग और भारत के स्ट्रक्चरल करंट अकाउंट डेफिसिट जैसी वजहों ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। 20 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा था, जबकि शुक्रवार को यह करीब 96.30 प्रति डॉलर के आसपास कारोबार करता दिखा। यानी रुपया अपने रिकॉर्ड लो से महज 0.55% दूर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में दबाव बना रह सकता है, हालांकि अगस्त-सितंबर में विदेशी मुद्रा प्रवाह (FCNR-B) बढ़ने से रुपये को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
5 जून की रिकवरी पूरी तरह खत्म
रुपये में हालिया कमजोरी ने 5 जून के बाद आई पूरी रिकवरी को लगभग खत्म कर दिया है। इसके साथ ही जुलाई में भारतीय मुद्रा एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल हो गई है। इससे आयात लागत, विशेष रूप से कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।
कच्चे तेल की महंगाई ने बढ़ाई मुश्किल
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के कोर एनालिटिकल ग्रुप के डायरेक्टर सौम्यजीत नियोगी का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें रुपये की कमजोरी का ट्रिगर जरूर हैं, लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं हैं।
उनके अनुसार कई अन्य कारकों ने भी रुपये को कमजोर किया है, जिनमें शामिल हैं—
- अमेरिकी डॉलर की लगातार मजबूती
- वैश्विक व्यापार पर टैरिफ का असर
- भारत के निर्यात पर दबाव
- चीन की आक्रामक डंपिंग
- कमजोर वैश्विक आर्थिक माहौल
उन्होंने कहा कि पिछले लगभग एक दशक तक भारत को सस्ते कच्चे तेल का फायदा मिलता रहा, जिससे अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों का सामना कर पाई। लेकिन अब तेल की कीमतें बढ़ने से अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियां सामने आने लगी हैं।
करंट अकाउंट डेफिसिट भी बड़ी वजह
बंधन AMC के सीनियर इकोनॉमिस्ट श्रीजीत बालासुब्रमण्यन के मुताबिक भारत एक संरचनात्मक करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) वाला देश है।
उनका कहना है कि भारत आयात पर निर्यात की तुलना में अधिक खर्च करता है। ऐसे में जब तक पर्याप्त विदेशी पूंजी (Capital Inflows) नहीं आती, रुपये पर दबाव बना रहता है।
उन्होंने बताया कि पिछले 10 से 15 वर्षों में रुपया औसतन हर साल लगभग 3 से 4 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है, जो इसकी दीर्घकालिक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
RBI के उपायों से उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला फायदा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 5 जून को FCNR(B) डिपॉजिट को बढ़ावा देने सहित कई कदम उठाए थे। शुरुआती दौर में इससे बाजार का भरोसा बढ़ा, लेकिन डॉलर का वास्तविक इनफ्लो उम्मीद से काफी कम रहा।
बार्कलेज की रिपोर्ट के अनुसार FCNR(B) स्कीम के तहत अब तक केवल 5 से 6 अरब डॉलर का निवेश आया है, जबकि इससे कहीं अधिक राशि आने की उम्मीद थी। इससे रुपये को मिलने वाला शॉर्ट टर्म सपोर्ट कमजोर पड़ गया।
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली
आरित्या ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड के रिसर्च हेड गौरव अरोड़ा के अनुसार इस वर्ष विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से 36 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक निवेशक अब तेजी से अमेरिका, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे AI और सेमीकंडक्टर आधारित बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर भारतीय बाजार और रुपये दोनों पर पड़ा है।
इसके अलावा जून में भारत का व्यापार घाटा 30.43 अरब डॉलर रहा, जिसमें कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात का बड़ा योगदान रहा।
डॉलर की बढ़ती मांग से और बढ़ा दबाव
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स LLP के ट्रेजरी हेड एवं एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल कुमार भंसाली का कहना है कि डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है।
इसके पीछे कई कारण हैं—
- कच्चे तेल की ऊंची कीमतें
- रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी टैरिफ
- विदेशी निवेश की निकासी
- रक्षा भुगतान
- सरकारी कर्ज की अदायगी
- विदेशों में भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण
उन्होंने बताया कि एक्सपोर्टर डॉलर रोककर रख रहे हैं, जबकि इंपोर्टर तत्काल भुगतान के लिए डॉलर खरीद रहे हैं। इससे डॉलर की मांग और बढ़ रही है तथा रुपये पर दबाव बना हुआ है।
हेजिंग पैटर्न भी रुपये के खिलाफ
श्रीजीत बालासुब्रमण्यन के अनुसार बाजार की धारणा भी रुपये की कमजोरी को बढ़ा रही है।
जब बाजार को लगता है कि रुपया और कमजोर होगा, तब निर्यातक कम हेजिंग करते हैं ताकि कमजोर रुपये का फायदा उठा सकें। दूसरी ओर आयातक अधिक हेजिंग करते हैं ताकि भविष्य के जोखिम से बच सकें। इससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है और रुपया और कमजोर होता जाता है।
आगे रुपये की चाल कैसी रह सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में दबाव बना रह सकता है, लेकिन अगस्त और सितंबर में FCNR(B) के तहत आने वाले विदेशी फंड से कुछ राहत मिल सकती है।
सौम्यजीत नियोगी का कहना है कि यदि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव कम होते हैं और विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ता है तो साल के बाकी महीनों में रुपया औसतन 95 प्रति डॉलर से नीचे भी आ सकता है।
टेक्निकल एनालिसिस क्या कहता है?
द वेल्थ कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर और मार्केट स्ट्रैटेजी हेड अक्षय चिंचालकर के अनुसार रुपये में रिकॉर्ड निचले स्तर 96.96 से 94.14 तक आई रिकवरी ने बाजार की घबराहट जरूर कम की थी, लेकिन इससे मुख्य ट्रेंड नहीं बदला।
उनके मुताबिक—
- डेली, वीकली और मंथली चार्ट अभी भी डॉलर के पक्ष में हैं।
- डॉलर इंडेक्स का ब्रेकआउट डॉलर को मजबूत सपोर्ट दे रहा है।
- रुपया दोबारा 97 के आसपास अपने रिकॉर्ड निचले स्तर का परीक्षण कर सकता है।
- यदि 97 के आसपास मजबूत सपोर्ट नहीं मिलता तो अगला लक्ष्य 98 हो सकता है।
- रिकॉर्ड निचले स्तर टूटने पर रुपया 98.70 तक भी जा सकता है।
- ट्रेंड में सकारात्मक बदलाव तभी माना जाएगा जब रुपया 94.96 के ऊपर मजबूती से टिके।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
रुपये में कमजोरी का असर आयात आधारित कंपनियों, तेल मार्केटिंग कंपनियों और विदेशी कर्ज वाली कंपनियों पर पड़ सकता है। वहीं आईटी और निर्यात आधारित कंपनियों को कमजोर रुपये से कुछ फायदा मिल सकता है। निवेशकों को डॉलर-रुपया, कच्चे तेल की कीमतों, FPI फ्लो और RBI की नीतियों पर लगातार नजर रखनी चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। इसमें दिए गए विचार संबंधित विशेषज्ञों के निजी हैं। NewsJagran.in या इसका प्रबंधन किसी निवेश निर्णय के लिए जिम्मेदार नहीं होगा। निवेश से पहले किसी प्रमाणित वित्तीय सलाहकार की राय अवश्य लें।


