US Russia Sanctions: अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित टैरिफ ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती खड़ी हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति का विकल्प ढूंढना आसान नहीं है।
US Russia Sanctions: अमेरिकी प्रस्ताव से बढ़ी वैश्विक तेल बाजार की चिंता
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच अमेरिका लगातार रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसी कड़ी में अमेरिकी सीनेटरों ने एक संशोधित द्विदलीय (Bipartisan) प्रतिबंध विधेयक पेश किया है। इस प्रस्ताव में रूस के अधिकारियों पर नए प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है।
हालांकि, पहले जहां ऐसे देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, वहीं संशोधित बिल में इसे घटाकर 100 फीसदी कर दिया गया है। यह राहत खासतौर पर भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार देशों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत और चीन क्यों हैं सबसे ज्यादा चर्चा में?
रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में भारत और चीन प्रमुख हैं। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस ने एशियाई देशों को रियायती दरों पर तेल की आपूर्ति बढ़ाई, जिससे दोनों देशों के लिए आयात लागत कम हुई।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका का प्रस्तावित टैरिफ सख्ती से लागू होता है तो भारत और चीन की ऊर्जा रणनीति पर असर पड़ सकता है। हालांकि, दोनों देशों के लिए फिलहाल रूसी तेल का कोई आसान विकल्प मौजूद नहीं है।
भारत की आधे से ज्यादा जरूरत पूरी कर रहा रूसी तेल
एनर्जी एनालिटिक्स फर्म Kepler के विश्लेषक सुमित रितोलिया के अनुसार, जून 2026 में रूस ने भारत को करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन (2.6 मिलियन बैरल प्रति दिन) कच्चे तेल की आपूर्ति की।
यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा था। मार्च के बाद से रूस से आयात लगातार बढ़ रहा है और जुलाई में भी यह स्तर जून के बराबर या उससे अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से मिलने वाला रियायती कच्चा तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है।
रूसी सप्लाई को बदलना क्यों है मुश्किल?
रितोलिया के मुताबिक, यदि अमेरिकी सेकेंडरी टैरिफ के कारण रूसी तेल की खरीद में बड़ी कमी आती है तो सबसे बड़ा सवाल होगा कि उसकी भरपाई कौन करेगा।
इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं—
- वैश्विक स्तर पर अतिरिक्त उत्पादन क्षमता सीमित है।
- मध्य पूर्व में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है।
- वैकल्पिक सप्लायर सीमित मात्रा में ही अतिरिक्त तेल उपलब्ध करा सकते हैं।
- बड़े पैमाने पर रूसी निर्यात को बदलने से अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
क्या भारत के पास कोई दूसरा विकल्प है?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में सस्ती और स्थिर सप्लाई देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समान मात्रा, विश्वसनीयता और प्रतिस्पर्धी कीमत पर फिलहाल रूस जैसा दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं है। यदि भारत को दूसरे देशों से अधिक महंगा तेल खरीदना पड़ता है तो इसका असर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी बिल में क्या है राहत?
संशोधित अमेरिकी प्रस्ताव में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
- अधिकतम प्रस्तावित टैरिफ 500% से घटाकर 100% किया गया है।
- जो देश रूस की प्राकृतिक गैस का 15 प्रतिशत से कम आयात करते हैं और खरीद कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें राहत मिल सकती है।
- अंतिम फैसला अमेरिकी कानून बनने और उसके लागू होने की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
क्या वैश्विक तेल कीमतें बढ़ सकती हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूस के तेल निर्यात में बड़ी बाधा आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता कम हो सकती है। इससे ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
ऊर्जा बाजार पहले से ही मध्य पूर्व के तनाव, उत्पादन सीमाओं और वैश्विक मांग के कारण दबाव में है। ऐसे में किसी भी नई पाबंदी का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
यदि अमेरिकी प्रस्तावित टैरिफ लागू होता है और भारत को रूसी तेल आयात में कटौती करनी पड़ती है, तो देश के सामने ऊर्जा लागत बढ़ने की चुनौती आ सकती है। हालांकि, फिलहाल यह केवल प्रस्तावित विधेयक है और इसके अंतिम स्वरूप तथा लागू होने की प्रक्रिया पर नजर रहेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पर्याप्त वैकल्पिक सप्लाई उपलब्ध नहीं होती, तब तक रूस वैश्विक तेल बाजार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता रहेगा।
निष्कर्ष
अमेरिका के प्रस्तावित रूस प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों के लिए रूसी कच्चा तेल अभी भी सबसे व्यवहारिक विकल्प बना हुआ है। यदि भविष्य में रूसी सप्लाई बाधित होती है तो इसका असर केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की तेल कीमतों और ऊर्जा बाजार पर देखने को मिल सकता है।


