नई दिल्ली: स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) से जुड़े मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला एक अहम फैसला सामने आया है। अहमदाबाद के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Consumer Court) ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को एक पॉलिसीधारक के कैंसर इलाज का क्लेम मंजूर करने का आदेश दिया है। आयोग ने कंपनी को 3 लाख रुपये का बीमा क्लेम 7% वार्षिक ब्याज के साथ चुकाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही मानसिक प्रताड़ना और मुकदमे के खर्च के लिए अलग से मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया है।
यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो हेल्थ इंश्योरेंस लेने के बावजूद क्लेम रिजेक्ट होने की समस्या का सामना करते हैं।
क्या था पूरा मामला?
मामला अहमदाबाद निवासी उपेंद्र ठक्कर से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार उनकी पत्नी का अक्टूबर से नवंबर 2018 के बीच बोन मैरो कैंसर का इलाज कराया गया। इलाज पर कुल 17.3 लाख रुपये खर्च हुए।
उपेंद्र ठक्कर ने अपनी मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत 3 लाख रुपये के रीइंबर्समेंट का दावा किया। लेकिन यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिया कि बीमारी आनुवंशिक (Genetic Disease) से संबंधित है और इसमें स्टेम-सेल इम्प्लांटेशन या सर्जरी शामिल है, जिसे पॉलिसी के तहत कवर नहीं किया जाता।
क्लेम रिजेक्ट होने के बाद पॉलिसीधारक ने कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (CERC) की मदद से जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या पाया?
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी अंतिम सुनवाई में उपस्थित नहीं हुई। इतना ही नहीं, कंपनी अदालत के सामने ऐसे दस्तावेज या पॉलिसी की शर्तें भी पेश नहीं कर सकी, जिनके आधार पर क्लेम अस्वीकार किया गया था।
आयोग ने कहा कि यदि कोई बीमा कंपनी पॉलिसी की किसी शर्त का हवाला देकर क्लेम खारिज करती है, तो उस शर्त को अदालत के सामने साबित करने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। बिना पर्याप्त सबूत के क्लेम को अस्वीकार करना उचित नहीं माना जा सकता।
लगातार रिन्यू हो रही थी पॉलिसी
आयोग ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता वर्ष 2008 से लगातार अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का नवीनीकरण (Renewal) करा रहे थे। यानी बीमा कंपनी और पॉलिसीधारक के बीच लंबे समय से बीमा संबंध बना हुआ था।
कोर्ट ने कहा कि जब कंपनी अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं दे सकी, तब क्लेम को अस्वीकार करने का फैसला मनमाना और अवैध माना जाएगा।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
जिला उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बीमा कंपनी को—
- पॉलिसीधारक को 3 लाख रुपये का बीमा क्लेम देना होगा।
- 4 फरवरी 2020 (शिकायत दर्ज होने की तारीख) से भुगतान होने तक 7% वार्षिक ब्याज देना होगा।
- मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना के लिए 2,000 रुपये का मुआवजा देना होगा।
- मुकदमे के खर्च के रूप में 2,000 रुपये अतिरिक्त चुकाने होंगे।
- पूरे आदेश का पालन एक महीने के भीतर करना होगा।
उपभोक्ताओं के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला स्पष्ट करता है कि बीमा कंपनियां केवल सामान्य आधार पर क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं। यदि किसी क्लेम को पॉलिसी की शर्तों के आधार पर अस्वीकार किया जाता है, तो उन शर्तों और उनके लागू होने का पर्याप्त प्रमाण भी कंपनी को देना होगा।
उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले से यह संदेश दिया है कि यदि पॉलिसीधारक के साथ अनुचित व्यवहार होता है, तो वह उपभोक्ता अदालत में जाकर न्याय प्राप्त कर सकता है।
हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने पर क्या करें?
यदि आपका हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम भी बिना उचित कारण के खारिज कर दिया गया है, तो इन कदमों पर विचार करें—
- सबसे पहले बीमा कंपनी से क्लेम रिजेक्शन का लिखित कारण मांगें।
- पॉलिसी की शर्तों और क्लेम से जुड़े सभी दस्तावेज सुरक्षित रखें।
- कंपनी के ग्रिवेंस सेल में शिकायत दर्ज करें।
- समाधान नहीं मिलने पर बीमा लोकपाल (Insurance Ombudsman) या उपभोक्ता आयोग का रुख करें।
- इलाज के सभी बिल, मेडिकल रिपोर्ट और अस्पताल के रिकॉर्ड संभालकर रखें, क्योंकि ये कानूनी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण साक्ष्य बनते हैं।
निष्कर्ष
अहमदाबाद उपभोक्ता आयोग का यह फैसला हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसीधारकों के अधिकारों को मजबूती देने वाला माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया कि बीमा कंपनियां बिना पर्याप्त सबूत और वैध आधार के क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं। यदि क्लेम अस्वीकार करने का निर्णय नियमों के अनुरूप साबित नहीं किया जाता, तो उपभोक्ता को न केवल बीमा राशि बल्कि ब्याज और मुआवजा भी मिल सकता है।


