देश में महंगाई की मार लगातार आम लोगों की जेब पर पड़ रही है। अब खाने के तेल (Edible Oil) की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि आयात लागत बढ़ने, रुपये की कमजोरी, वैश्विक तनाव और कम बारिश की आशंका के चलते आने वाले महीनों में खाद्य तेल और महंगे हो सकते हैं। इसका सीधा असर हर घर के रसोई बजट पर पड़ेगा।
खाने के तेल की कीमतों में फिर उछाल
उपभोक्ता मामलों के विभाग के Price Monitoring Cell के ताजा आंकड़ों के अनुसार, प्रमुख खाद्य तेलों की औसत खुदरा कीमतें पिछले साल के मुकाबले 10-12% तक बढ़ चुकी हैं।
मौजूदा औसत खुदरा कीमतें:
- सरसों तेल: ₹193.54 प्रति किलोग्राम (10.74% बढ़ोतरी)
- सोयाबीन तेल: ₹163.10 प्रति किलोग्राम (11.53% बढ़ोतरी)
- पाम तेल: ₹147.37 प्रति किलोग्राम (12.87% बढ़ोतरी)
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयात लागत और मौसम की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो कीमतों में आगे भी तेजी बनी रह सकती है।
क्यों महंगा हो रहा है खाने का तेल?
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (SEA) के अनुसार खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे कई बड़े कारण हैं।
- आयातित तेल की लागत में लगातार वृद्धि
- माल ढुलाई (Freight) और बीमा (Insurance) का खर्च बढ़ना
- रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होना
- पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक आपूर्ति पर असर
- कई देशों द्वारा खाद्य तेल का इस्तेमाल जैव ईंधन (Biofuel) बनाने में बढ़ाना
- कम बारिश की आशंका से घरेलू तिलहन उत्पादन पर दबाव
इन सभी कारणों से भारत में खाद्य तेल आयात करना पहले की तुलना में काफी महंगा हो गया है।
एक साल में कितनी बढ़ी आयात लागत?
SEA के 3 जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक मुंबई बंदरगाह पर खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट में पिछले एक साल के दौरान अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई है।
| खाद्य तेल | मौजूदा लैंडेड कॉस्ट | एक साल में बढ़ोतरी |
|---|---|---|
| पाम तेल | 1,170 डॉलर/टन | 11% |
| सोयाबीन तेल | 1,267 डॉलर/टन | 6% |
| सूरजमुखी तेल | 1,455 डॉलर/टन | 20% |
सूरजमुखी तेल की आयात लागत में सबसे अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
भारत कितना करता है आयात?
भारत अपनी खाद्य तेल की कुल जरूरत का लगभग 57-58% हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, यूक्रेन, रूस और अर्जेंटीना से पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल खरीदता है।
भारत में इन तीनों तेलों की कुल खपत लगभग 25-26 मिलियन मीट्रिक टन के आसपास है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर असर डालता है।
आने वाले महीनों में क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून सामान्य नहीं रहा और वैश्विक बाजार में कच्चे खाद्य तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। ऐसे में रसोई का मासिक बजट पहले से ज्यादा प्रभावित होने की संभावना है।


